20वीं सदी के महान विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव दर्शन’ का विचार हमारे सामने रखा। उनका जीवनकाल 1916 से 1968 तक रहा। वर्ष 1937 में अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक बने। 1951 में जनसंघ इस राजनैतिक दल के कार्यकर्ता बने। जीवन के अंतिम क्षण 1968 तक जनसंघ के समर्पित पदाधिकारी रहे। उनके कार्यकाल में ही जनसंघ ने अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त किया। 1980 में इसका रूपांतरण भारतीय जनता पक्ष में हुआ, जो आज केंद्र व कई राज्यों से सत्ता में है।
पार्टी में वे एक कुशल संगठक, मार्गदर्शक, दार्शनिक थे। वे कहते थे, “
भिन्न-भिन्न राजनीतिक पार्टियों का अपने लिए एक दर्शन, सिद्धांत या आदर्श या क्रमिक विकास करने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्हें कुछ स्वार्थों की पूर्ति के लिए एकत्र होने वाले लोगों का समुच्चय मात्र नहीं बनना चाहिए। उनका रूप किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या जॉइंट स्टॉक कंपनी से अलग होना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि पार्टी का दर्शन केवल पार्टी के घोषणा पत्र के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए। सदस्यों को उन्हें समझना चाहिए और उन्हें कार्यरूप में परिणाम करने के लिए निष्ठापूर्वक जुड़ जाना चाहिए।’’ (1)
अर्थात वे केवल सिद्धांत पर निर्भर न रहते हुए उसे धरातल पर उतारने वाले कर्मयोगी थे।
एकात्म मानवदर्शन क्यो'?
23-24 जनवरी 1965 में जनसंघ के विजयवाड़ा में आयोजित अखिल भारतीय अधिवेशन में सिद्धांत और नीति प्रलेख, जो उन्होंने तैयार किया था, उसे अंतिम रूप दिया गया। इसी प्रलेख ने एकात्म मानव दर्शन को जनसंघ दल का आधिकारिक विचार घोषित किया। इस दर्शन का दीनदयाल जी ने मुंबई में अपने चार-चार भाषणों में 22 से 25 अप्रैल 1965 पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया । एकात्म मानव दर्शन एक विचारधारा है, जिसमें मानव जाति के आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अंगों को दिशादर्शन करने की निश्चित रूप से क्षमता है।
भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात इस पर विवाद चला कि अपने देश ने पूंजीवाद स्वीकारना चाहिए या समाजवाद, जो दोनों विचार यूरोप की भूमि का उपजे थे। भारत का उनसे कोई नाता नहीं था । वहाँ की परिस्थिति अनुरूप इन विचारधाराओं का जन्म हुआ था। दीनदयाल इस विचार को नकारते हुए कहते थे, ये दोनों विचार भौतिकवादी हैं। दोनों ही आचार आध्यात्मिकता का निषेध करते हैं।(2) ये विचारधारा मानव को व्यक्ति और समाज में बांटती है। व्यक्ति जीवन का विचार खंडित रूप से नही हो सकता, क्योंकि वह परिवार, समाज, सृष्टि और परमेष्ठी का संकलीत रूप है। इस शृंखला को तोड़कर सर्वांगीं विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। अर्थात ये सभी इकाइयां परस्पर संबंधित और परस्परावलंबी हैं। इसलिए उन्होंने परस्पर पूरक रहना आवश्यक है।
भारतीय परंपरा के अनुसार मानव एकात्म है, एकात्म यानी, जिस को बांटा नहीं जा सकता। न बांटे जाने वाली को इकाई को एकात्म कहते हैं। समाज और व्यक्ति इस प्रकार जुड़े हुए हैं, उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। मानव व्यक्ति के रूप में समाज का अभिन्न अंग है।(3) अर्थात मानव विकास की कल्पना टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, अपितु समग्रता से करना चाहिए। यही आधार है एकात्म मानव दर्शन का। यह दर्शन हिंदू जीवन की वैश्विक दृष्टि को दर्शाता है। एकात्म मानव दर्शन के मूलभूत सूत्र निम्नानुसार हैं वैश्विक एकात्मता, वैयक्तिक आत्मीयता से वैश्विक आत्मीयता तक उन्नयन, त्रिगुणात्मक, चतुर्विध मानवी व्यक्तित्व, पुरुषार्थ चतुष्टय, आदि.
एकात्म मानव दर्शन के केंद्रभूत विचार इस तरह है।
(अ) यह दर्शन भारतीय चिंतन का युगानुकूल रूप है।
(ब) यह विचारव्यूह (Ideology) नहीं है बल्कि विचार प्रवाह है जो परिवर्तनीय है। क्रियान्वयन हेतु इसे पारिस्थितानुकूल ढाला जा सकता है। भारत में जन्मीं सभी विचारधाराएं इसका अंग हो सकती हैं।
(क) इस दर्शन को प्रत्यक्ष रूप देने के लिए चिंतक, परिष्कृत लोकमत, समाजमाध्यम, साहित्य परिचर्चा व विविध कलाएं साहाय्यभूत हो सकती हैं।
व्याप्ति : इस दर्शन का लक्ष्य क्या है? दीनदयाल कहते हैं— "
हमने किसी संप्रदाय या वर्ग की सेवा का नहीं बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की सेवा का व्रत लिया है। सभी देशवासी हमारे बांधव हैं। जब तक हम सभी बंधुओं को भारत माता के सपूत होने का सच्चा गौरव प्रदान नहीं करा देंगे, हम चुप नहीं बैठेंगे। हम भारत माता को सही अर्थों में सुजलाम्, सुफलाम् बनाकर रहेंगे। वह दश प्रहरण धारिणी दुर्गा बनकर असुरों का संहार करेगी, लक्ष्मी बनकर जन-जन को समृद्ध करेगी और सरस्वती बनकर अज्ञानांधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलायेगी.... जब तक देश में एकरसता, कर्मठता, समानता, संपन्नता, ज्ञानवता सुख और शांति की सप्तजाह्नवी का पुण्यप्रवाह नहीं ला पाते, हमारा भगीरथ तप पूरा नहीं होगा........ विजय का विश्वास है, तपस्या का निश्चय लेकर चलें!"(4)दीनदयाल जी इस दर्शन द्वारा मानवी जीवन से लेकर सृष्टि तक सभी विषयों को स्पर्श करते हैं और लक्ष्य प्राप्ती हेतु साधना का आग्रह करते हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश, राष्ट्रसुरक्षा, आर्थिक संपन्नता, शिक्षा ये इन सारे विषयों पर अपना मंतव्य देते हैं। उनका जीवन एक श्रेष्ठ, कर्मठ, त्यागी, राष्ट्रभक्त का जीवन था। उनके विचार केवल कल्पनाजगत में नहीं अपितु प्रत्यक्ष रूप देने के लिए थे।
एकात्म मानवदर्शन – क्रियान्वयन के प्रयास
दीनदयालजी के सहकारी स्व. भारतरत्न नानाजी देशमुख ने 1968 में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना कर एकात्म मानवदर्शन को कृतिरूप देने का प्रयास किया।
1972 में मध्य प्रदेश के सतना जिले में पवित्र चित्रकूट क्षेत्र को इस प्रयोगार्थ चुना गया और कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि विषयों पर जनसहभागिता की मदद से कार्य प्रारंभ किया।
उसी प्रकार उत्तर प्रदेश का गोंडा जिल्हा और महाराष्ट्र का बीड जिल्हा भी कार्य हेतु लिया गया।
(अ) कृषि विकास :- इस संदर्भ में डॉ. जितेन्द्र बजाज कहते हैं
– "दीनदयाल उपाध्याय केवल कृषि को प्रथम प्राथमिकता देने और कृषि की पैदावार बढ़ाने की बात नहीं करते; एकात्म अर्थनीति में वे इसके लिए उपयुक्त उपायों पर भी विचार करते हैं। उन्नत बीजों की आवश्यकता पर बल देते हैं, अच्छे औजारों की उपलब्धी की बात करते हैं, रासायनिक उर्वरक और जैविक खाद के सम्यक, संतुलित उपयोग की बात करते हैं... कृषि को अदेवमातृका बनाने की चर्चा करते हैं।"(5)
इन विचारों के क्रियान्वयन की दृष्टि से चित्रकूट इलाके में गनीवा और मझगवां में दो बड़े कृषि विज्ञान केन्द्र और मॉडल फार्म हैं, जहां किसानों को कम लागत में अधिक पैदावार और जलवायु के अनुसार खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।
महाराष्ट्र के बीड जिले में ग्रामीण विकास संस्था 1992 में प्रारंभ हुई। अंबाजोगाई में कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से आधुनिक खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा में 2,50,000 एकड़ खेती सिंचित हुई, 95,000 किसान लाभान्वित हुए और 2008 गांव को फायदा हुआ। 27000 ट्यूबवेल्स तैयार की गयीं केवल दो वर्षों में। बीड जिले में श्रम साधना शिविर आयोजित कर 4 लाख क्युबिक मीटर गाद (Silt) जलाशयों से निकाला गया। उसे खेतों में डाला गया, जिससे जमीन अधिक उपजाऊ बनी, जल स्तर बढ़ा।
(2) रोजगार और उद्यमिता :-
(अ) उद्यमिता विद्यापीठ : चित्रकूट में उद्यमिता विद्यापीठ की स्थापना की गयी, यहां ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। कुटीर उद्योग जैसे खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, अगरबत्ती निर्माण का प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है।
(ब) औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्र (ITI) :- युवकों को तकनीकी कौशल सिखाने के लिए संस्थान ITI केन्द्र भी संचालित करता है। गोंडा में जनशिक्षण संस्थान सन 2000 से सैकड़ों ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित कर रहा है।
(3) स्वास्थ्य और चिकित्सा :- यहां 53 एकड़ में फैला एक विशाल आयुर्वेदिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र है। दंत चिकित्सा की भी व्यवस्था है, इसे 'आरोग्यधाम' कहते हैं।
चित्रकूट रसशाला में शुद्ध और प्रामाणिक आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण किया जाता है।
एक ऑपरेशन थिएटर, प्रसुती एवं बालचिकित्सा केन्द्र, आयुर्वेद अनुसंधान पुस्तकालय, जड़ी-बूटी बगिया, ग्रामीण लोगों के लिए मौसमी बीमारियों के इलाज हेतु 'दादी मां का बटुआ' भी तैयार किया है।
शिक्षा व्यवस्था :- दीनदयाल उपाध्याय कहते थे
— "शिक्षा निःशुल्क होनी चाहिए। किसी को पैसे नहीं हैं इसलिए शिक्षा से वंचित नहीं रहना पड़ना चाहिए। शिक्षा का आर्थिक दायित्व केवल इंसान का नहीं होता है।" शिक्षा समाज का दायित्व है... शिक्षा की व्यवस्थात्मक अधिकार वास्तव में तो शिक्षक का ही होना चाहिए।"(6)इस दृष्टि से चित्रकूट में सुरेन्द्र पाल ग्रामोदय विद्यालय 1100 छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है, रामनाथ आश्रमशाला 325 आदिवासी बच्चों के लिए आवासीय सह शिक्षा विद्यालय चलाता है, परमानंद आश्रम पद्धति विद्यालय गनीवन में 125 अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए एक आवासीय सह शिक्षा विद्यालय चलाता है।
एक गुरुकुल है जिसमें 100 बच्चों को 10-10 बच्चों के समूह सेवानिवृत्त दम्पतियों के साथ रखकर बच्चों में मूल्यों का संचार किया जाता है।
नागपुर का बालजगत प्रकल्प :- नागपुर के लक्ष्मी नगर स्थित बालजगत प्रकल्प का उद्घाटन 11 फरवरी 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखरजी ने किया। यह नानाजी देशमुख के बाल विकास पर विचारों का मूर्त रूप है। यहाँ संगीत, ललित कला, व्यक्तित्व विकास, योग आदि क्षेत्रों में बच्चों की प्रतिभाओं को निखारने का एक अनौपचारिक केंद्र है। इस प्रकार, यह केंद्र उचित वातावरण और सुविधाएं प्रदान करके 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों की जन्मजात प्रतिभाओं को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चों में टीम भावना और भाईचारे को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जाता है। बच्चों की प्राकृतिक प्रतिभाओं को विकसित करने के लिए उपयुक्त वातावरण और आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित एक आधुनिक बाल उद्यान का निर्माण किया गया है। यह उद्यान सभी बच्चों के लिए खुला है, चाहे वे अमीर हों या गरीब, और अपनी अनूठी अवधारणा के कारण बच्चों के बीच बहुत लोकप्रिय है।(7)
चित्रकूट में समाज शिल्पी दम्पती का योगदान :-
शोध संस्थान द्वारा उच्चशिक्षित विवाहित दम्पतियों को समाज कार्य के लिए निमंत्रित किया जाता है। पति-पत्नी होने के कारण समाज के सभी घटकों तक उनकी पहुंच होती है। एक दंपती का 5 गांवों के समूह (cluster) का दायित्व कार्य के लिए सौंपा जाता है, उन्हें वहीं निवास करना पड़ता है, गांव के लोगों के पारस्परिक सहकारिता से वे अपना दायित्व पूरा करते हैं और लोगों को प्रेरित कर विकास कार्यों को आगे बढ़ाते हैं।
स्वावलंबन अभियान (Self Reliance Campaign) :-
चित्रकूट में 2002 से आत्मनिर्भरता अभियान चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत 500 गांवों को दत्तक लिया गया। 2005 में 80 गांवों को स्वयंनिर्भर घोषित किया गया। इन देहातों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए निम्नलिखित विषयों पर कार्य किया गया।
1)बेरोजगारी निर्मूलन
2)कृषि उत्पाद में वृद्धि
3)निरक्षरता निर्मूलन
4) साफ-सुथरा हरा-भरा पर्यावरण
5)मंगल स्वास्थ्य
6)सार्वजनिक सुविधाएं
7) बगैर न्यायालय बातों को सुलझाना
8)सामाजिक चेतना आदि।
दीनदयाल उपाध्याय जी कहते थे
"मानव केवल भौतिकवादी नहीं हो सकता, मानव की आध्यात्मिक आवश्यकताएं भी हैं तथा इन दोनों का विकास मानवता के लिए जरूरी है।"(8)
अर्थात मानव व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धी, आत्मा का संकलित रूप है। प्रत्येक अंग की जरूरत भिन्न होती है।
इस दृष्टि से चित्रकूट में 'रामदर्शन' स्थापित किया गया। भगवान श्रीराम के आदर्शों, मानवीय मूल्यों और रामायण के संदेशों को कला के माध्यम से समाज में फैलाना और लोगों को नैतिक आचरण के लिए प्रेरित करना इसका उद्देश्य है। चित्रकूट यह भगवान श्रीराम की तपोभूमि रही। गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि जी की यादें भी इसी क्षेत्र से जुड़ी हैं। यह स्थान पर्यटकों को तथा दर्शनार्थियों को अपनी समृद्ध संस्कृति से जोड़ता है।
इस प्रकार दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा एकात्म मानवदर्शन को यथा कृतिरूप देने के प्रयास किए गये हैं।
केंद्र शासन के प्रयास
भारतीय जनता पार्टी के संविधान के अनुच्छेद तीन अनुसार एकात्म मानववाद भाजपा का मूलदर्शन है।(9) इसके ही प्रकाश में बीजेपी प्रणीत सरकारें विविध योजनाएं बनाती हैं और दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन प्रणीत विचारों को धरातल पर उतारने का प्रयास करती हैं।
उपाध्याय कहते थे कि
"अपनी सारी योजनाओं का लक्ष्य समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ती का विकास होना चाहिए। जो अंत्योदय कहलाता है। वह भूख और भय से मुक्त होना चाहिए।" इस दृष्टि से केंद्रशासन निम्नानुसार योजनाएं बनाईं
—
(1) अंत्योदय अन्न योजना :-
समाज के अति गरीब से गरीब परिवारों को पहचान कर उन्हें सस्ते और रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना तथा अंत्योदय कार्ड धारकों को हर माह 35 किलो राशन दिया जाता है। निर्धन परिवार, दिव्यांग, निराश्रित वृद्ध इसके लिए पात्र हैं।
(2) दीनदयाल अंत्योदय योजना (DAY) :-
यह योजना गरिबी कम करने और आजीविका के साधन बढ़ाने के लिए है। इसके दो हिस्से हैं—
(अ) राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन : यह शहरी गरीबों को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है।
(ब) राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन : यह ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाती है।
प्रधानमंत्री जनधन योजना द्वारा करोड़ों लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ दिया गया। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत पांच लाख तक आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त स्वास्थ्य बिमा देकर चिकित्सा सुरक्षा प्रदान की जाती है।
पीएम किसान सम्मान निधि योजना के तहत वर्ष मे छः हजार किसानों के खाते में निश्चित राशि जमा किया जाता है। पीएम आवास योजना द्वारा गरीबों को पक्के मकान कम कीमत में, जल जीवन मिशन द्वारा पाईप द्वारा शुद्ध पेयजल और पीएम स्वनिधि द्वारा छोटे व्यवसाय करनेवालों को वित्तीय सहायता दी जाती है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम, सुकन्या समृद्धी योजना है।(9)
इ.स. 2000 में पंतप्रधान अटल बिहारी वाजपेयी इनके कार्यकाल प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना बनाई गयी ताकि देहातों को जोड़ा जाय और उन्हें आर्थिक उन्नति के मार्ग खोल दिये जाय। शिक्षा विभाग की प्रगति के लिए सर्व शिक्षा अभियान प्रारंभ किया। 'सब का साथ सब का विकास' इस घोषणा के पीछे दीनदयाल उपाध्याय की प्रेरणा है।
समान नागरी कानून के लिए कई राज्य प्रयास कर रहे हैं। 'एक देश, एक जन, एक संस्कृति' इस विचार को यह पहल प्रकट करती। संविधान की धारा 370 को समाप्त कर कश्मीरियों की अलगाववादी प्रवृत्ति पर काबू पाया लद्दाख के विकास के रास्ते खुल गये हैं।
(2) आत्मनिर्भर भारत अभियान :- Vocal for local का नारा इसी स्वदेशी और स्वावलंबन के विचार से प्रेरित है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारतीयता का गौरव :-
इस दर्शन के अनुसार भारत का विकास पश्चिमी मॉडेल के अंधी नकल से नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जुड़कर ही हो सकता है। इसके तहत भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक परिसर का विकास, तीर्थ स्थलों को प्रधान रास्तों से जोड़ना, योग को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाना आदि कार्य सांस्कृतिक पुनरुत्थान और भारतीय पहचान को दर्शाते हैं।
(4) समग्र विकास :-
एकात्म मानवदर्शन मनुष्य के केवल एकांगी विकास की बात नहीं करता, बल्कि शरीर, मन, बुद्धी और आत्मा के एकीकृत और संतुलित विकास पर वकालत करता है। सरकार की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 NEP इसी विचार पर आधारित है, जिसका उद्देश्य युवाओं को केवल पेशेवर विकास नहीं करना है बल्कि उन्हें नैतिक मूल्यों, अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़कर एक पूर्ण मानव बनाना है।
- सुरक्षा नीति पर प्रभाव :-
(अ) आत्मनिर्भरता :- भारत की वर्तमान सुरक्षा नीति आत्मनिर्भर भारत पर आधारित है। रक्षा उपकरणों का स्वदेशी उत्पादन एकात्म मानव दर्शन की आर्थिक और सामाजिक स्वायत्तता की सोच से मेल खाता है।
(ब) विश्वशांति के लिए प्रयास :-
हम ने सारी पृथ्वि को एक परिवार माना है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' का पक्षधर है भारत। इसलिए भारत की सुरक्षा नीति आक्रामक नहीं बल्कि रक्षार्थ है, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की है। संपूर्ण मानवता का हित सर्वोपरी यही एकात्म मानव दर्शन का संदेश है।
अन्य गैरशासकीय संगठन, व्यक्तियों के इस दर्शन के क्रियान्वयन हेतु प्रयास :-
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : सेवा विभाग द्वारा प्रेरित ग्राम विकास (10)
समग्र ग्राम विकास की योजनाएं, रा०स्व० संघ के स्वयंसेवकों द्वारा संचालित और क्रियान्वित की जाती हैं। ग्राम विकास के पांच आयाम हैं —
(क) शिक्षा :- कोई निरक्षर ना हो, साक्षर गांव- शिक्षीत गाव
(ख) स्वास्थ्य :- सभी ग्रामवासी स्वस्थ हों। प्राथमिक चिकित्सा सुविधा गांव में ही उपलब्ध हो।
(ग) समरसता :- छुआछूत, भेदभाव, कुरितियां ना हों, भाईचारा हो।
(घ) संपन्नता :- कोई भूखा ना हो, सबको रोजगार उपलब्ध हो।
(ङ) सुरक्षा :- गांव विवादमुक्त तंटामुक्त हो। अंदर से और बाहर से समाजविघातक शक्ति से मुक्त हो, स्वसंरक्षित हो।
यह अभियान लेकर देश के लगभग सभी प्रांतों में ग्राम विकास कार्य शुरू है। एक दृष्टि से यह कार्यक्रम द्वारा एकात्म मानवदर्शन का हेतु प्रकट होता है ।
सारांश में हम कह सकते हैं कि एकात्म मानव दर्शन की व्याप्ति व्यक्ति से लेकर विश्व तक है । सभी को सुखमय जीवन जीने का पथ प्रदर्शक है यह दर्शन । दीनदयाल कहते हैं
, "इस आधार पर हम चले तो भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के साथ राष्ट्रीयता, प्रजातंत्र, समता और विश्व एकता के आदर्शों को एक समन्वित रूप में रख सकेंगे ।"
इस दर्शन के क्रियान्वयन अभी तक अल्पमात्रा में प्रयास किये गये। शेष कार्य पूर्ण करना सभी का दायित्व है। दीनदयाल जी के विचार व्यवहार्य तथा प्रासंगिक हैं ।
संदर्भ :-
1) दीनदयाल उपाध्याय 'पोलिटिकल डायरी' पृष्ठ क्र - 188
2) एकात्म मानववाद - तत्वमिमांसा, सिद्धान्त, विवेचन - पृ. 64
3) तत्रैव - पृष्ठ 65
4) दीनदयाल उपाध्याय का भाषण कालीकट (केरल) दि. 25 सप्टें 1967
5) डॉ. जितेन्द्र बजाज 'कृषिसंबंधी चिंतन' (एकात्म मानव दर्शन विचार संग्रह पृ. 122)
6) डॉ. इंदुमती काटदरे - एकात्म मानव दर्शन और शिक्षा पृष्ठ-71
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें