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Tuesday, April 14, 2026

बंदर के लिए शोकसभा : विश्वजीत सिंह

यह कल ही की घटना है, मुझे निंद नहीं आई, दुख जताए भी तो किसे, इतनी आत्मीयता जब प्राणियों में ही नहीं रही तो इंसानों में तो बहुत दूर है।

दोपहर में खिड़की से देखा एक बड़ा बंदर, वह तो बंदरिया थी, वानर जैसे उसके साथ कुछ बच्चे बंदर भी थे। वे हमारे कृष्णा हेरिटेज अपार्टमेंट में आए थे। इस तपती गर्मी की दुपहरी में जंगलों से प्राणियों का शहर की ओर आना यह अब आम बात हो गई है। हुप हुप की आवाज से इमली के बड़े पेड़ पर बंदर खेलकूद कर रहे थे। पेड़ के नीचे कुत्ते जमा होकर बंदरों पर भौंक रहे थे।

मैने देखा घर के बच्चे फ्लैट की बालकनी से यह दृश्य मजे लेकर देख रहे है । फिर कुछ ही देर में जोर की आवाज आई देखा ब्लास्ट हुआ है। बड़ी चिंगारी निकली है। मैं दौड़ा दौड़ा भागा भागा फ्लैट की बालकनी में आया, जोर से एक आवाज दी, 

कल्पेश !

कल्पेश !

कल्पेश यह गरीब बहुजन समाज से ताल्लुख रखता हुआ लड़का है जो ठेकेदारी में रेलवे में सैंडबॉय का काम करता है। मालगाड़ी के इंजिन में रेत डालने का काम करता है। 

वह दौड़ा दौड़ा रेल्वे ट्रैक पर आया। एक मालगाड़ी खड़ी थी। उसमें उसने रेत भर दिया था। उसने मेरे आवाज के जवाब में आवाज लगाई। भईया आया। 

भईया बोलिए।

मैने उससे बालकनी से ही पूछा यह ब्लास्ट जैसी आवाज ? उसने कहा एक बंदर करंट लगकर मर गया है।

मैं दौड़ा दौड़ा फ्लैट से नीचे की ओर भागा। सैंड पॉइंट पर पहुंचकर कल्पेश को बोला कहां हुआ है यह ब्लास्ट। उसे साथ चलकर वह जगह दिखाने के लिए कहा। 

वह रेलवे ट्रैक पर चलने लगा। बोला भैया छोड़ो ये बंदरों में कहां पड़ रहे हो। मैने कहां भाई ये गर्मी का समय है, शायद दाना पानी के लिए ये प्राणी यहां आए हो। उनके पीछे कुत्ते पड़ गए और यह बंदर कुत्तों से बचने के लिए इलेक्ट्रिक के हाय टेंशन पोल पर चढ़ गया। और इसी दौरान एक ही सेकंड में शायद उसे भी पता न हो इलेक्ट्रिक सर्किट के करंट लगने से उसका पूरा शरीर, उसमें का खून जलकर काला पड़ गया। और वहां से वह नीचे गिरा। अमूमन बंदर तारो पर चिपक जाया करते है। यह तो नीचे गिरा।



मैं वहां उस जगह पहुंचा तो देखा कि इतने कम समय में कुछ कुत्ते उस बंदर के शरीर को नोच रहे है। किसीने पैर के पास तो किसी ने पूछ को नोचना शुरू कर दिया है। मैने पत्थर उठाया और कुत्तों को भगाया। फिर वही उसके पास बैठ गया । इस विचार में की इसकी मौत कैसे हुई होगी। घटनाक्रम घूम रहा था। मैं वही बैठा रहा। मेरे घर से छोटे भाई की बच्ची भी वहां मुझे बड़े पापा कहती हुई आ गई। और देखकर रोने लगी। बच्चों को दुख ज्यादा होता है। कल्पेश कहने लगा भैया बच्चों को रात में नींद नहीं आएगी। बच्चे डर जाएंगे। 

मैने कहां सच्चाई उन्हें भी जानने दीजिए, शायद बड़े होकर वे इतने समझदार बन जाएं कि उन्हें यह घटना आम न लगे।

मैं करीब डेढ़ घंटे वही जगह पर फोन लगाता रहा की नगर पंचायत की गाड़ी आ जाएं जिससे उस बंदर की लाश का यथोचित सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो जाएं। अनेक लोगों को फोन लगाया। उन्हें घटना के फोटो व्हाट्सएप पर भेजे। पर कोई सहायता नहीं मिली। इसमें बहुत समय गुजर गया। संध्या होने लगी। अब इस स्थिति में समझ में आया कि प्राणियों की मौत इंसानों के लिए कोई महत्व नहीं रखती। 

दुख तो इस बात का था कि वह बंदर किसी के परिवार का हिस्सा था। कुछ दिनों पहले हमने रामनवमी, फिर हनुमान जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई। सुंदरकांड भी पढ़ा, और १३ अप्रैल को यह घटना हो गई।

मुझे लगा कि बाकी के बंदर कहां चले गए। एक बंदर मर गया उसके आसपास बंदर आने चाहिए। बंदरों ने गोला करना चाहिए। आसपास एक भी बंदर नहीं मिला। शायद डर से उस बंदर को छोड़कर भाग गए। प्रायः अपनो के बिछड़ने का दुख प्राणियों में ज्यादा देखा जाता है। पक्षी हो या प्राणी दुख तो होता ही है। कौओं को देखा है दुखी होकर सभा करते हुए। 

जब बंदर का परिवार उस बंदर को अपने बीच नहीं पाएगा तो क्या वे उसे ढूंढेंगे? बंदर की माताजी का दुख यह मै सोच कर ही दुखी हो जाता हूं। पता नहीं वह बंदर कितनों को अनाथ कर गया।

क्या इंसानों की तरह प्राणियों में भी आत्मीयता की कमी हो गईं है?

भाई की छोटी बच्ची ने कहा बड़े पापा अब तो हम बर्थडे भी नहीं मना सकते । उसके पिताजी का जन्मदिन था।

रेलवे की तारों से लगकर यह बंदर मरा है। ऐसे न जाने कितने प्राणी, पक्षी अपने परिवार को खो देते है। अब इसके समुचित अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कौन करेगा ? यह रेलवे का मामला है कोई इसमें पड़ना नहीं चाहता। न स्थानिक पुलिस और न नगर पंचायत और न ही वन विभाग के अधिकारी। 

इसी जद्दोजहद में बहुत देर हो गई। आखिर नमक, भगवा कपड़ा और पूजा सामग्री लेकर गड्ढा खोदा गया। उसी में एक बोतल पानी से बंदर के मुंह पर पानी डाला गया। भगवे कपड़े में लपेटकर उस बंदर को गड्ढे में रखा गया। उसपर मिट्टी डाली गई। 


मुझे रातभर नींद नहीं आई। बार बार उसी बंदर का ख्याल। दुख तो उसके परिवार को भी हुआ होगा। 

अब रातभर विचार करके यह निश्चय किया है कि इस दुख के लिए शोकसभा रखी जाएं उसमें वन विभाग, नगर प्रशासन, नागरिक प्रतिनिधि और रेलवे के अधिकारियों को भी बुलाया जाएं। 

क्या पता इस शोकसभा से खोई हुई आत्मीयता लौट आएं।


Tuesday, April 7, 2026

नागपूरचं भाऊ : सुनील किटकरू

 



नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी 

फिकी पडे वाळवंटी सफारी l 


 माणूस वऱ्हाडी काय त्याचा रुबाब 

रणरणत्या झळात बी चहाची वाफ 

 पुरणपोळी तूप त्याची न्याहारी 

 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


देतो ताणून थंड कुलरच्या हवेत 

 आग ओकणाऱ्याला नाही भाव देत 

 वाघासारखी फिरण्याची हौस न्यारी

 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


सपन सरता ताटात दिसे खिचडी 

 भाजी वांग्याची अन मिरची बेगडी 

दूध ताकांनी पळवतो उन्हाळी 

नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


फिकी पडे वाळवंटी सफारी

नागपूरच भाऊ ऊन लई भारी l

जसा कोकणाला हापूस तारी 

नागपूरची भाऊ संत्री लई भारी l

             - सुनील किटकरु


Wednesday, April 1, 2026

बालक केशव हेडगेवार का वंदेमातरम असहयोग आंदोलन

वंदे मातरम् आंदोलन

सन 1907 के मध्य में विद्यालय निरीक्षक प्रतिवर्ष की भांति स्कूल का निरीक्षण करने नील सिटी स्कूल आए थे। जैसे ही निरीक्षक केशव हेडगेवार की कक्षा में गए, सभी छात्रों ने उठकर एक साथ 'वंदे मातरम्' की जोरदार घोषणा से उनका स्वागत किया और प्रत्येक कक्षा में इसकी पुनरावृत्ति होती रही। केशव के सहपाठी गोविंद गणेश आवदे ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा- 'गुस्से से लाल-पीले होकर विद्यालय निरीक्षक प्रधानाध्यापक जनार्दन विनायक ओक के कमरे में आ गए और बिना बात किए सीधे चले गए। इसके तुरंत बाद उन्होंने विद्यालय प्रबंध समिति के चेयरमैन सर विपिन कृष्ण बोस को पत्र लिखकर दोषी छात्रों को 'अनुशासनहीनता' के लिए अविलंब सजा देने की मांग की।' स्कूल के अधिकारियों को इसका तनिक भी भान नहीं था कि छात्रों के बीच जबर्दस्त राजनीतिक ध्रुवीकरण हो चुका है। केशव ने आरंभ से अंत तक की योजना अत्यंत ही गोपनीय तरीके से बना रखी थी। विद्यालय प्रबंध समिति के निर्णय के विरुद्ध स्कूल के सभी दो हजार छात्र अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। हड़ताल दो महीने तक चलती रही। इस हड़ताल में नागपुर का मारिस कालेज भी शामिल हो गया। केशव के नेतृत्व में जुलूस, प्रभात फेरी इत्यादि आम बात बन गई। अंततः अच्युतराव कोल्हटकर की मध्यस्थता से स्कूल खुला। छात्रों ने समझाने-बुझाने तथा अपने माता-पिता एवं शिक्षकों के दबाव में माफी माग ली। परंतु अकेले केशव ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने भरी सभा में कहा: "अगर मातृभूमि की आराधना अपराध है तो मैं यह अपराध एक नहीं, अनगिनत बार करूंगा और इसके लिए मिलने वाली सजा को भी सहर्ष स्वीकार करूंगा।' फलतः सितंबर माह में केशव को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। केशव ने इसे देशभक्ति का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। नागपुर में वह लोकप्रिय युवा नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।



असहयोग आंदोलन 

इस आंदोलन में डॉ. हेडगेवार का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने गांव-गांव जाकर भाषण दिया और लोगों को जागृत किया। इस पर अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह (sedition) का अनुसार, आमतौर पर नेता लोग कोई बचाव नहीं मुकदमा चलाया। तब आंदोलन के नियम करते थे, सजा भुगतना ही अपना बयान होता था। लेकिन डॉक्टर हेडगेवार ने तय किया कि मैं कोर्ट में डिफेन्स दूंगा, क्योंकि वह भी मेरा एक भाषण ही होगा।" उस समय अदालत में जनता और पत्रकार मौजूद रहते थे, तो उन्हें अपना संदेश फैलाने का उन्होंने न्यायाधीश से सीधे पूछा था, "न्यायाधीश एक और अवसर मिलना था। अपने मुकदमे में महोदय, यह बताइए कि किस क़ानून के तहत अंग्रेज लोग यहां आकर भारत पर राज्य कर रहे हैं? स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है - यह सारी दुनिया मानती है। तो क्या कोई कानून है जिसके आधार पर अंग्रेज हम पर राज कर रहे हैं? नहीं है! इसलिए अंग्रेजों का राज्य ही गैर-क़ानूनी है। आपका कोर्ट भी गैर-कानूनी है। आप तो गैरकानूनी जज हैं-मैं आपके अधिकार को मानता ही नहीं!" उन्होंने कहा- "मैंने केवल देशवासियों को यही बताया कि स्वतंत्र होना हमारा अधिकार है। और स्वतंत्र कैसे होना है, यह भी समझाया। मैंने कोई अपराध नहीं किया। और अगर आपने इसे अपराध माना भी, तो आपमें मुझे सजा देने का अधिकार नहीं है क्योंकि मैं आपकी अदालत को मान्यता नहीं देता।" इस पर उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा हुई। सजा सुनाते हुए मैजिस्ट्रेट ने टिप्पणी लिखी - अंग्रेजी में जिसे Obiter Dicta कहते है कि "जिन भड़काऊ भाषणों के कारण इन पर अभियोग लगाया गया है, उनसे अधिक विद्रोहपूर्ण तो इनका बचाव में दिया गया जवाब है।"

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10:07:00 AM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

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दोपहर में खिड़की से देखा एक बड़ा बंदर, वह तो बंदरिया थी, वानर जैसे उसके साथ कुछ बच्चे बंदर भी थे। वे हमारे कृष्णा हेरिटेज अपार्टमेंट में आए थे। इस तपती गर्मी की दुपहरी में जंगलों से प्राणियों का शहर की ओर आना यह अब आम बात हो गई है। हुप हुप की आवाज से इमली के बड़े पेड़ पर बंदर खेलकूद कर रहे थे। पेड़ के नीचे कुत्ते जमा होकर बंदरों पर भौंक रहे थे।

मैने देखा घर के बच्चे फ्लैट की बालकनी से यह दृश्य मजे लेकर देख रहे है । फिर कुछ ही देर में जोर की आवाज आई देखा ब्लास्ट हुआ है। बड़ी चिंगारी निकली है। मैं दौड़ा दौड़ा भागा भागा फ्लैट की बालकनी में आया, जोर से एक आवाज दी, 

कल्पेश !

कल्पेश !

कल्पेश यह गरीब बहुजन समाज से ताल्लुख रखता हुआ लड़का है जो ठेकेदारी में रेलवे में सैंडबॉय का काम करता है। मालगाड़ी के इंजिन में रेत डालने का काम करता है। 

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भईया बोलिए।

मैने उससे बालकनी से ही पूछा यह ब्लास्ट जैसी आवाज ? उसने कहा एक बंदर करंट लगकर मर गया है।

मैं दौड़ा दौड़ा फ्लैट से नीचे की ओर भागा। सैंड पॉइंट पर पहुंचकर कल्पेश को बोला कहां हुआ है यह ब्लास्ट। उसे साथ चलकर वह जगह दिखाने के लिए कहा। 

वह रेलवे ट्रैक पर चलने लगा। बोला भैया छोड़ो ये बंदरों में कहां पड़ रहे हो। मैने कहां भाई ये गर्मी का समय है, शायद दाना पानी के लिए ये प्राणी यहां आए हो। उनके पीछे कुत्ते पड़ गए और यह बंदर कुत्तों से बचने के लिए इलेक्ट्रिक के हाय टेंशन पोल पर चढ़ गया। और इसी दौरान एक ही सेकंड में शायद उसे भी पता न हो इलेक्ट्रिक सर्किट के करंट लगने से उसका पूरा शरीर, उसमें का खून जलकर काला पड़ गया। और वहां से वह नीचे गिरा। अमूमन बंदर तारो पर चिपक जाया करते है। यह तो नीचे गिरा।



मैं वहां उस जगह पहुंचा तो देखा कि इतने कम समय में कुछ कुत्ते उस बंदर के शरीर को नोच रहे है। किसीने पैर के पास तो किसी ने पूछ को नोचना शुरू कर दिया है। मैने पत्थर उठाया और कुत्तों को भगाया। फिर वही उसके पास बैठ गया । इस विचार में की इसकी मौत कैसे हुई होगी। घटनाक्रम घूम रहा था। मैं वही बैठा रहा। मेरे घर से छोटे भाई की बच्ची भी वहां मुझे बड़े पापा कहती हुई आ गई। और देखकर रोने लगी। बच्चों को दुख ज्यादा होता है। कल्पेश कहने लगा भैया बच्चों को रात में नींद नहीं आएगी। बच्चे डर जाएंगे। 

मैने कहां सच्चाई उन्हें भी जानने दीजिए, शायद बड़े होकर वे इतने समझदार बन जाएं कि उन्हें यह घटना आम न लगे।

मैं करीब डेढ़ घंटे वही जगह पर फोन लगाता रहा की नगर पंचायत की गाड़ी आ जाएं जिससे उस बंदर की लाश का यथोचित सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो जाएं। अनेक लोगों को फोन लगाया। उन्हें घटना के फोटो व्हाट्सएप पर भेजे। पर कोई सहायता नहीं मिली। इसमें बहुत समय गुजर गया। संध्या होने लगी। अब इस स्थिति में समझ में आया कि प्राणियों की मौत इंसानों के लिए कोई महत्व नहीं रखती। 

दुख तो इस बात का था कि वह बंदर किसी के परिवार का हिस्सा था। कुछ दिनों पहले हमने रामनवमी, फिर हनुमान जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई। सुंदरकांड भी पढ़ा, और १३ अप्रैल को यह घटना हो गई।

मुझे लगा कि बाकी के बंदर कहां चले गए। एक बंदर मर गया उसके आसपास बंदर आने चाहिए। बंदरों ने गोला करना चाहिए। आसपास एक भी बंदर नहीं मिला। शायद डर से उस बंदर को छोड़कर भाग गए। प्रायः अपनो के बिछड़ने का दुख प्राणियों में ज्यादा देखा जाता है। पक्षी हो या प्राणी दुख तो होता ही है। कौओं को देखा है दुखी होकर सभा करते हुए। 

जब बंदर का परिवार उस बंदर को अपने बीच नहीं पाएगा तो क्या वे उसे ढूंढेंगे? बंदर की माताजी का दुख यह मै सोच कर ही दुखी हो जाता हूं। पता नहीं वह बंदर कितनों को अनाथ कर गया।

क्या इंसानों की तरह प्राणियों में भी आत्मीयता की कमी हो गईं है?

भाई की छोटी बच्ची ने कहा बड़े पापा अब तो हम बर्थडे भी नहीं मना सकते । उसके पिताजी का जन्मदिन था।

रेलवे की तारों से लगकर यह बंदर मरा है। ऐसे न जाने कितने प्राणी, पक्षी अपने परिवार को खो देते है। अब इसके समुचित अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कौन करेगा ? यह रेलवे का मामला है कोई इसमें पड़ना नहीं चाहता। न स्थानिक पुलिस और न नगर पंचायत और न ही वन विभाग के अधिकारी। 

इसी जद्दोजहद में बहुत देर हो गई। आखिर नमक, भगवा कपड़ा और पूजा सामग्री लेकर गड्ढा खोदा गया। उसी में एक बोतल पानी से बंदर के मुंह पर पानी डाला गया। भगवे कपड़े में लपेटकर उस बंदर को गड्ढे में रखा गया। उसपर मिट्टी डाली गई। 


मुझे रातभर नींद नहीं आई। बार बार उसी बंदर का ख्याल। दुख तो उसके परिवार को भी हुआ होगा। 

अब रातभर विचार करके यह निश्चय किया है कि इस दुख के लिए शोकसभा रखी जाएं उसमें वन विभाग, नगर प्रशासन, नागरिक प्रतिनिधि और रेलवे के अधिकारियों को भी बुलाया जाएं। 

क्या पता इस शोकसभा से खोई हुई आत्मीयता लौट आएं।



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12:51:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

 



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फिकी पडे वाळवंटी सफारी l 


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रणरणत्या झळात बी चहाची वाफ 

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 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


देतो ताणून थंड कुलरच्या हवेत 

 आग ओकणाऱ्याला नाही भाव देत 

 वाघासारखी फिरण्याची हौस न्यारी

 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


सपन सरता ताटात दिसे खिचडी 

 भाजी वांग्याची अन मिरची बेगडी 

दूध ताकांनी पळवतो उन्हाळी 

नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


फिकी पडे वाळवंटी सफारी

नागपूरच भाऊ ऊन लई भारी l

जसा कोकणाला हापूस तारी 

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             - सुनील किटकरु



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2:50:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

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सन 1907 के मध्य में विद्यालय निरीक्षक प्रतिवर्ष की भांति स्कूल का निरीक्षण करने नील सिटी स्कूल आए थे। जैसे ही निरीक्षक केशव हेडगेवार की कक्षा में गए, सभी छात्रों ने उठकर एक साथ 'वंदे मातरम्' की जोरदार घोषणा से उनका स्वागत किया और प्रत्येक कक्षा में इसकी पुनरावृत्ति होती रही। केशव के सहपाठी गोविंद गणेश आवदे ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा- 'गुस्से से लाल-पीले होकर विद्यालय निरीक्षक प्रधानाध्यापक जनार्दन विनायक ओक के कमरे में आ गए और बिना बात किए सीधे चले गए। इसके तुरंत बाद उन्होंने विद्यालय प्रबंध समिति के चेयरमैन सर विपिन कृष्ण बोस को पत्र लिखकर दोषी छात्रों को 'अनुशासनहीनता' के लिए अविलंब सजा देने की मांग की।' स्कूल के अधिकारियों को इसका तनिक भी भान नहीं था कि छात्रों के बीच जबर्दस्त राजनीतिक ध्रुवीकरण हो चुका है। केशव ने आरंभ से अंत तक की योजना अत्यंत ही गोपनीय तरीके से बना रखी थी। विद्यालय प्रबंध समिति के निर्णय के विरुद्ध स्कूल के सभी दो हजार छात्र अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। हड़ताल दो महीने तक चलती रही। इस हड़ताल में नागपुर का मारिस कालेज भी शामिल हो गया। केशव के नेतृत्व में जुलूस, प्रभात फेरी इत्यादि आम बात बन गई। अंततः अच्युतराव कोल्हटकर की मध्यस्थता से स्कूल खुला। छात्रों ने समझाने-बुझाने तथा अपने माता-पिता एवं शिक्षकों के दबाव में माफी माग ली। परंतु अकेले केशव ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने भरी सभा में कहा: "अगर मातृभूमि की आराधना अपराध है तो मैं यह अपराध एक नहीं, अनगिनत बार करूंगा और इसके लिए मिलने वाली सजा को भी सहर्ष स्वीकार करूंगा।' फलतः सितंबर माह में केशव को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। केशव ने इसे देशभक्ति का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। नागपुर में वह लोकप्रिय युवा नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।



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