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Friday, September 4, 2026

माँ को मरने से पहले ना मारें

यह कोई पहली बार नहीं है माँ जैसे जीवनदायिनी व्यक्तित्व पर किसी ने कुछ शब्द लिखे हो । 

माँ क्या होती है यह उस बच्चे से पूछें जिसने मां को खो दिया है। दुनिया की वास्तविक सच्चाई यह है कि बिना मतलब के लोग भगवान के मंदिर भी नहीं जाते, केवल एक मां ही है जो बिना मतलब के, निस्वार्थ भाव से अपने बच्चे को वात्सल्य, मातृत्व प्रेम देती है, बच्चे की देखरेख करती है। 

वर्तमान में हम हर उस मां को देखते है। इसी पर एक छोटा सा चिंतन शब्दों के माध्यम से आपके सामने रख रहा हूं।

डीआईजी नवनीत सिकेरा ने एक बेहद मार्मिक स्टोरी अपने वाल पर पोस्ट किया, एक जज अपनी पत्नी को क्यों दे रहे हैं तलाक। रोंगटे खड़े कर देने वाली स्टोरी को जरूर पढ़े।

कल रात एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के कई पहलुओं को छू लिया।

करीब 7 बजे होंगे, 

शाम को मोबाइल बजा ।

उठाया तो उधर से रोने की आवाज़....

मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?

उधर से आवाज़ आई..

आप कहाँ हैं और कितनी देर में आ सकते हैं ?

मैंने कहा:-"आप परेशानी बताइये..!"

और "भाई साहब कहाँ हैं...?माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"

लेकिन उधर से केवल एक रट कि आप आ जाइए, मैंने आश्वाशन दिया कि कम से कम एक घंटा लगेगा। जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा।

देखा तो भाई साहब (हमारे मित्र जो जज हैं) सामने बैठे हुए हैं।

भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं,13 साल का बेटा भी परेशान है। 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।

मैंने भाई साहब से पूछा 

कि आखिर क्या बात है?

भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे।

फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार कराके लाये हैं, मुझे तलाक देना चाहते हैं ।

मैंने पूछा - ये कैसे हो सकता है. इतनी अच्छी फैमिली है। 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है। प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है।

लेकिन मैंने बच्चों से पूछा दादी किधर हैं ?

बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है।

मैंने घर के नौकर से कहा 

मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ,

कुछ देर में चाय आई ।भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं पिलाने की । लेकिन उन्होंने नहीं पिया । और कुछ ही देर में वो एक मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे। बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है। मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ।

पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली। कि मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती । ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे। रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी। नौकर तक भी अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे।

माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट कर दे। 

मैंने बहुत कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की।

जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी। दूसरों के घरों में काम करके मुझे पढ़ाया। मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ। लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं।

उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ। पिछले 3 दिनों से मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ, जो उसने केवल मेरे लिए उठाये।

मुझे आज भी याद है जब.. 

मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था। माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती।

एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था। उसका शरीर गर्म था, तप रहा था। मैंने कहा माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है।

लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया। मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए। कहते-कहते रोने लगे..

और बोले-- जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे। हम जिनके शरीर के टुकड़े हैं, आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते,

जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ।

आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ।

जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे। इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ,

सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले करके उस ओल्ड ऐज होम में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।

और अगर इतना सबकुछ कर के माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है, तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा। माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी। माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी।

जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे। बातें करते करते रात के 12:30 हो गए। मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा।

उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे। मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।

भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे।

बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला। भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ,

चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब,

भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ,

उस चौकीदार ने कहा:-

"जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये,

औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब।

इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया।

अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी।

उसने बड़े कातर शब्दों में कहा:-

"2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..?"

मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये। ये लोग बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं।

अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं। कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ।

केवल एक फ़ोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है।

मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए 

लेकिन जब मैंने कहा हमलोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी।

आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए।

उनकी भी आँखें नम थीं।

कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई। पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये। किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये।

सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे .......

लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की भावनाओं कोअपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे। घर आते-आते करीब 3:45 हो गया।

भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है ये समझ गई थीं।

मैं भी चल दिया। लेकिन रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे। 

माँ केवल माँ है । उसको मरने से पहले ना मारें।

विदेश का समाज सड़ चुका है, इस भोगवादी कलयुग में एक खबर कुछ दिनों पहले अखबार में छपी थी। इस खबर में कलयुग की बेटियों ने ऐसा योगदान दिया कि भारतीय समाज भी सड़ने जा रहा है यह अब प्रतीत होने लगा है।

इस वर्ष १५ अगस्त २०२६ की खबर है, सोनीपत के वृद्धाश्रम में रह रहे मुंबई के प्रसिद्ध कपड़ा व्यापारी शिवचरण रामरतन गुप्ता की तेरहवीं की रस्में गीता मंदिर में पूरी की गईं। हवन-यज्ञ हुआ, लोगों ने उनकी तस्वीर पर पुष्प अर्पित किए और शामिल होने वालों को प्रसाद बांटा गया। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम में एक बार फिर परिवार की बेटियां नजर नहीं आईं। दाह संस्कार के वक्त बेटियों ने वीडियो कॉल के जरिए बातचीत की थी, जबकि अस्थि विसर्जन के दौरान भी WhatsApp पर बातचीत हुई थी। अब तेरहवीं के कार्यक्रम में भी वे शामिल नहीं हुईं।

पहले बेटियों ने वृद्धाश्रम संचालकों से कहा था कि पिता की अस्थियां संभालकर रख दी जाएं, लेकिन कुछ देर बाद दोबारा फोन कर कहा, हमारे पास समय नहीं है... आप ही गंगा में अस्थियां प्रवाहित कर दो। इतना ही नहीं, उन्होंने अंतिम संस्कार की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भी अपने पास भेजने को कहा ।

जब यह साफ हो गया कि कोई भी बेटी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाएगी तो वृद्धाश्रम प्रबंधन ने वीडियो कॉल के जरिए अंतिम दर्शन कराने का फैसला किया। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि मोबाइल स्क्रीन पर पिता की अंतिम यात्रा देखकर तीनों बेटियां भावुक भी हो गईं। उन्होंने पूरे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया वीडियो कॉल के माध्यम से देखी।

वृद्धाश्रम संचालक के अनुसार, बड़ी बेटी अनीता ने ऑनलाइन 5100 रुपये भेजे। उन्होंने कहा कि पिता का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और रीति-रिवाज के साथ किया जाए। इसके बाद बेटियों ने एक और अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग उन्हें भेज दी जाए ताकि वे बाद में भी देख सकें। वृद्धाश्रम संचालक श्री आनंद बताते हैं कि शुरुआती बातचीत में बेटियों ने कहा था कि पिता की अस्थियां सुरक्षित रख ली जाएं। उन्हें उम्मीद थी कि बाद में आकर वे स्वयं गंगा में विसर्जन करेंगी। लेकिन कुछ समय बाद दोबारा फोन आया। इस बार उन्होंने कहा, हमारे पास समय नहीं है। आप ही अस्थियां गंगा में प्रवाहित कर दीजिए। वृद्धाश्रम प्रबंधन ने उनकी इच्छा के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी भी स्वीकार कर ली। शिवचरण गुप्ता ने जीवन रहते नेत्रदान का संकल्प लिया था। निधन के बाद परिवार की सहमति से उनकी आंखें दान कर दी गईं । अब उनकी आंखें किसी जरूरतमंद व्यक्ति के लिए नई रोशनी बनेंगी ।

उन्हें उम्मीद थी कि किसी दिन उनकी बेटियां उनसे मिलने जरूर आएगी।

ऐसी ३ बेटियाँ जिन्हें पिता ने उच्च शिक्षा दिलाई, सभी जरूरतों को पूरा किया, उनकी शादी करवाई। वे तीन अलग अलग बड़े शहरों में रहती है। सोचिये क्या संस्कार, परवरिश में कमी रह गई ? 

माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें, अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की रीढ़ कमज़ोर हो जाएगी, बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं है। क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है क्योंकि वो माँ ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्मे होते हैं।

मां विधाता से कहीं कम भी नहीं है। क्योंकि मां ने ही बच्चे की दुनिया को सिरजा और पाला-पोशा है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा किसी को नजर आये न आए मां हर किसी को हर जगह नजर आती है। हर शिशु की पहली किलकारी से लेकर आखिरी सांस तक मां अपनी संतान का साथ नहीं छोड़ती। मां पास रहे या न रहे मां का प्यार दुलार, मां के दिये संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं। इस लिए मां को प्रथम गुरु माना गया है।

मां का अस्तित्व हर एक के लिए बहुत मायने रखता है क्योंकि कोई भी बच्चा अपनी सांस, पहला भोजन और अपने अस्तित्व के लिए जो भी जरूरी क्रिया होती है वह अपनी मां की कोख में ही करता है इसलिए हम सब का यह शरीर हमारी मां की देन है। गर्भ से ही बच्चे का मन के साथ भावनात्मक जुड़ा होता है एक तरफ से बच्चों के लिए उसकी मां ही भगवान होती है।

कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने मां बनाई। 

महर्षि वेदव्यास जी ने “संकद पुराण” में कहा है 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'

“माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।”

 वेदों ने मां महिमा कही है,

माँ ममतामयी। माँ करुणामयी है।

(नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।

नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।)

अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, बात को प्रभावी ढंग से समझायें, कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें, अगर माँ की आँख से आँसू गिर गए तो ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा, यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर सुकून नहीं होगा, सुकून सिर्फ माँ के आँचल में होता है उस आँचल को बिखरने मत देना।

जब मां का साथ छूट जाता है तब ही समाज, और राष्ट्र भारतमाता के रूप में याद आता है। माँ गौमाता हो सकती है, भारतमाता भी हो सकती है।

इस मार्मिक दास्तान को खुद भी पढ़िये और अपने बच्चों को भी पढ़ाइये ताकि पश्चाताप न करना पड़े।

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यह कोई पहली बार नहीं है माँ जैसे जीवनदायिनी व्यक्तित्व पर किसी ने कुछ शब्द लिखे हो । 

माँ क्या होती है यह उस बच्चे से पूछें जिसने मां को खो दिया है। दुनिया की वास्तविक सच्चाई यह है कि बिना मतलब के लोग भगवान के मंदिर भी नहीं जाते, केवल एक मां ही है जो बिना मतलब के, निस्वार्थ भाव से अपने बच्चे को वात्सल्य, मातृत्व प्रेम देती है, बच्चे की देखरेख करती है। 

वर्तमान में हम हर उस मां को देखते है। इसी पर एक छोटा सा चिंतन शब्दों के माध्यम से आपके सामने रख रहा हूं।

डीआईजी नवनीत सिकेरा ने एक बेहद मार्मिक स्टोरी अपने वाल पर पोस्ट किया, एक जज अपनी पत्नी को क्यों दे रहे हैं तलाक। रोंगटे खड़े कर देने वाली स्टोरी को जरूर पढ़े।

कल रात एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के कई पहलुओं को छू लिया।

करीब 7 बजे होंगे, 

शाम को मोबाइल बजा ।

उठाया तो उधर से रोने की आवाज़....

मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?

उधर से आवाज़ आई..

आप कहाँ हैं और कितनी देर में आ सकते हैं ?

मैंने कहा:-"आप परेशानी बताइये..!"

और "भाई साहब कहाँ हैं...?माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"

लेकिन उधर से केवल एक रट कि आप आ जाइए, मैंने आश्वाशन दिया कि कम से कम एक घंटा लगेगा। जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा।

देखा तो भाई साहब (हमारे मित्र जो जज हैं) सामने बैठे हुए हैं।

भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं,13 साल का बेटा भी परेशान है। 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।

मैंने भाई साहब से पूछा 

कि आखिर क्या बात है?

भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे।

फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार कराके लाये हैं, मुझे तलाक देना चाहते हैं ।

मैंने पूछा - ये कैसे हो सकता है. इतनी अच्छी फैमिली है। 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है। प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है।

लेकिन मैंने बच्चों से पूछा दादी किधर हैं ?

बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है।

मैंने घर के नौकर से कहा 

मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ,

कुछ देर में चाय आई ।भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं पिलाने की । लेकिन उन्होंने नहीं पिया । और कुछ ही देर में वो एक मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे। बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है। मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ।

पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली। कि मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती । ना तो ये उनसे बात करती थी और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे। रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी। नौकर तक भी अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे।

माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट कर दे। 

मैंने बहुत कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की।

जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी। दूसरों के घरों में काम करके मुझे पढ़ाया। मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ। लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं।

उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ। पिछले 3 दिनों से मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ, जो उसने केवल मेरे लिए उठाये।

मुझे आज भी याद है जब.. 

मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था। माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती।

एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था। उसका शरीर गर्म था, तप रहा था। मैंने कहा माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है।

लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया। मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए। कहते-कहते रोने लगे..

और बोले-- जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे। हम जिनके शरीर के टुकड़े हैं, आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते,

जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ।

आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ।

जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे। इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ,

सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले करके उस ओल्ड ऐज होम में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।

और अगर इतना सबकुछ कर के माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है, तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा। माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी। माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी।

जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे। बातें करते करते रात के 12:30 हो गए। मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा।

उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे। मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।

भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे।

बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला। भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ,

चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब,

भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ,

उस चौकीदार ने कहा:-

"जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये,

औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब।

इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया।

अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी।

उसने बड़े कातर शब्दों में कहा:-

"2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..?"

मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये। ये लोग बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं।

अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं। कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ।

केवल एक फ़ोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है।

मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए 

लेकिन जब मैंने कहा हमलोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी।

आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए।

उनकी भी आँखें नम थीं।

कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई। पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये। किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये।

सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे .......

लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की भावनाओं कोअपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे। घर आते-आते करीब 3:45 हो गया।

भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है ये समझ गई थीं।

मैं भी चल दिया। लेकिन रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे। 

माँ केवल माँ है । उसको मरने से पहले ना मारें।

विदेश का समाज सड़ चुका है, इस भोगवादी कलयुग में एक खबर कुछ दिनों पहले अखबार में छपी थी। इस खबर में कलयुग की बेटियों ने ऐसा योगदान दिया कि भारतीय समाज भी सड़ने जा रहा है यह अब प्रतीत होने लगा है।

इस वर्ष १५ अगस्त २०२६ की खबर है, सोनीपत के वृद्धाश्रम में रह रहे मुंबई के प्रसिद्ध कपड़ा व्यापारी शिवचरण रामरतन गुप्ता की तेरहवीं की रस्में गीता मंदिर में पूरी की गईं। हवन-यज्ञ हुआ, लोगों ने उनकी तस्वीर पर पुष्प अर्पित किए और शामिल होने वालों को प्रसाद बांटा गया। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम में एक बार फिर परिवार की बेटियां नजर नहीं आईं। दाह संस्कार के वक्त बेटियों ने वीडियो कॉल के जरिए बातचीत की थी, जबकि अस्थि विसर्जन के दौरान भी WhatsApp पर बातचीत हुई थी। अब तेरहवीं के कार्यक्रम में भी वे शामिल नहीं हुईं।

पहले बेटियों ने वृद्धाश्रम संचालकों से कहा था कि पिता की अस्थियां संभालकर रख दी जाएं, लेकिन कुछ देर बाद दोबारा फोन कर कहा, हमारे पास समय नहीं है... आप ही गंगा में अस्थियां प्रवाहित कर दो। इतना ही नहीं, उन्होंने अंतिम संस्कार की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग भी अपने पास भेजने को कहा ।

जब यह साफ हो गया कि कोई भी बेटी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो पाएगी तो वृद्धाश्रम प्रबंधन ने वीडियो कॉल के जरिए अंतिम दर्शन कराने का फैसला किया। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि मोबाइल स्क्रीन पर पिता की अंतिम यात्रा देखकर तीनों बेटियां भावुक भी हो गईं। उन्होंने पूरे अंतिम संस्कार की प्रक्रिया वीडियो कॉल के माध्यम से देखी।

वृद्धाश्रम संचालक के अनुसार, बड़ी बेटी अनीता ने ऑनलाइन 5100 रुपये भेजे। उन्होंने कहा कि पिता का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान और रीति-रिवाज के साथ किया जाए। इसके बाद बेटियों ने एक और अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार की पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग उन्हें भेज दी जाए ताकि वे बाद में भी देख सकें। वृद्धाश्रम संचालक श्री आनंद बताते हैं कि शुरुआती बातचीत में बेटियों ने कहा था कि पिता की अस्थियां सुरक्षित रख ली जाएं। उन्हें उम्मीद थी कि बाद में आकर वे स्वयं गंगा में विसर्जन करेंगी। लेकिन कुछ समय बाद दोबारा फोन आया। इस बार उन्होंने कहा, हमारे पास समय नहीं है। आप ही अस्थियां गंगा में प्रवाहित कर दीजिए। वृद्धाश्रम प्रबंधन ने उनकी इच्छा के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी करने की जिम्मेदारी भी स्वीकार कर ली। शिवचरण गुप्ता ने जीवन रहते नेत्रदान का संकल्प लिया था। निधन के बाद परिवार की सहमति से उनकी आंखें दान कर दी गईं । अब उनकी आंखें किसी जरूरतमंद व्यक्ति के लिए नई रोशनी बनेंगी ।

उन्हें उम्मीद थी कि किसी दिन उनकी बेटियां उनसे मिलने जरूर आएगी।

ऐसी ३ बेटियाँ जिन्हें पिता ने उच्च शिक्षा दिलाई, सभी जरूरतों को पूरा किया, उनकी शादी करवाई। वे तीन अलग अलग बड़े शहरों में रहती है। सोचिये क्या संस्कार, परवरिश में कमी रह गई ? 

माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें, अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की रीढ़ कमज़ोर हो जाएगी, बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं है। क्या कभी आपने सोचा है कि ठोकर लगने पर या मुसीबत की घड़ी में माँ ही क्यों याद आती है क्योंकि वो माँ ही होती है जो हमें तब से जानती है जब हम अजन्मे होते हैं।

मां विधाता से कहीं कम भी नहीं है। क्योंकि मां ने ही बच्चे की दुनिया को सिरजा और पाला-पोशा है। कण-कण में व्याप्त परमात्मा किसी को नजर आये न आए मां हर किसी को हर जगह नजर आती है। हर शिशु की पहली किलकारी से लेकर आखिरी सांस तक मां अपनी संतान का साथ नहीं छोड़ती। मां पास रहे या न रहे मां का प्यार दुलार, मां के दिये संस्कार जीवन भर साथ रहते हैं। इस लिए मां को प्रथम गुरु माना गया है।

मां का अस्तित्व हर एक के लिए बहुत मायने रखता है क्योंकि कोई भी बच्चा अपनी सांस, पहला भोजन और अपने अस्तित्व के लिए जो भी जरूरी क्रिया होती है वह अपनी मां की कोख में ही करता है इसलिए हम सब का यह शरीर हमारी मां की देन है। गर्भ से ही बच्चे का मन के साथ भावनात्मक जुड़ा होता है एक तरफ से बच्चों के लिए उसकी मां ही भगवान होती है।

कहते हैं कि भगवान हर जगह नहीं हो सकते इसलिए उन्होंने मां बनाई। 

महर्षि वेदव्यास जी ने “संकद पुराण” में कहा है 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी'

“माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।”

 वेदों ने मां महिमा कही है,

माँ ममतामयी। माँ करुणामयी है।

(नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।

नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।)

अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, बात को प्रभावी ढंग से समझायें, कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें, अगर माँ की आँख से आँसू गिर गए तो ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा, यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर सुकून नहीं होगा, सुकून सिर्फ माँ के आँचल में होता है उस आँचल को बिखरने मत देना।

जब मां का साथ छूट जाता है तब ही समाज, और राष्ट्र भारतमाता के रूप में याद आता है। माँ गौमाता हो सकती है, भारतमाता भी हो सकती है।

इस मार्मिक दास्तान को खुद भी पढ़िये और अपने बच्चों को भी पढ़ाइये ताकि पश्चाताप न करना पड़े।

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