प्रसिद्ध पत्रकार श्री सतीश एलिया ने भारत-विभाजन की विभीषिका पर 'मुकम्मल बंटवारा न हुआ सबसे बड़ा गुनाह' यह नाम से एक पुस्तक लिखी है।
विभाजन को याद करना इतिहास के घाव कुरेदना नहीं, स्मृति को जीवित रखना है।कुछ तिथियाँ कैलेंडर पर नहीं होतीं। वे मनुष्य की स्मृति में होती हैं। वे किसी सरकारी अधिसूचना से बड़ी और किसी राजनीतिक व्याख्या से अधिक पुरानी होती हैं। 14 अगस्त ऐसी ही एक तारीख है। एक ओर वह पाकिस्तान के स्वतंत्रता-दिवस की पूर्वसंध्या है, दूसरी ओर भारत के लिए वह उस विभाजन की स्मृति का दिन है जिसने एक भूगोल को दो राष्ट्रों में बाँटने के साथ-साथ असंख्य मनुष्यों के घर, परिवार, स्मृतियाँ, रिश्ते और जीवन-क्रम भी बाँट दिए।
2021 में भारत सरकार ने 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय किया। आधिकारिक घोषणा का उद्देश्य मृतकों और विस्थापितों को स्मरण करना तथा आने वाली पीढ़ियों को उस पीड़ा से परिचित कराना बताया गया था। उसी घोषणा में यह भी कहा गया कि ऐसी स्मृति सामाजिक विभाजन, वैमनस्य और घृणा को समाप्त करने तथा एकता और सामाजिक सद्भाव को मजबूत करने की प्रेरणा बने।
लेकिन इस स्मृति-दिवस के सामने आते ही दो प्रकार की आपत्तियाँ सुनाई देती हैं। पहली कहती है—विभाजन की विभीषिका को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरी कहती है—पुराने जख्मों को कुरेदने से क्या लाभ? अब आगे बढ़ना चाहिए।
पहली आपत्ति इतिहास को छोटा करती है; दूसरी स्मृति को।और दोनों, अनजाने या जान-बूझकर, एक ही परिणाम तक पहुँचती हैं—जो हुआ उसे पर्याप्त रूप से याद मत करो।
यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं है कि विभाजन की स्मृति किस पक्ष को लाभ पहुँचाती है। मूल प्रश्न इससे अधिक बुनियादी है—क्या किसी समाज को अपने अतीत के उन मनुष्यों को याद करने का अधिकार है जिनका जीवन इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक दुर्घटनाओं में से एक में नष्ट हो गया? इसका उत्तर यदि ‘नहीं’ है, तो फिर इतिहास आखिर किसके लिए है?
विभाजन के कारण कितने लोग मारे गए या प्रभावित हुए इसकी कोई सर्वमान्य संख्या नहीं है। पर इतिहासकारों में संख्या को लेकर मतभेद है; विभीषिका के अस्तित्व को लेकर नहीं। यह फर्क बहुत महत्वपूर्ण है।इतिहास में किसी संख्या को लेकर अनिश्चितता उस घटना को काल्पनिक नहीं बना देती। मृतकों की गिनती में विवाद हो सकता है; मृत्यु की वास्तविकता में नहीं।
यदि किसी त्रासदी में दस लाख लोग मरे या पाँच लाख—दोनों ही स्थितियाँ सभ्यता के लिए भयावह हैं। आँकड़े की सीमा बदलने से शोक का नैतिक अर्थ समाप्त नहीं होता।वास्तव में विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी केवल यह नहीं थी कि बहुत-से लोग मारे गए। उससे भी बड़ा तथ्य था कि इतने बड़े पैमाने पर मनुष्य अपने घरों से उखाड़े गए। सतीश ऐलिया इसे मानव इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक विस्थापनों में से एक के रूप में दर्ज करते हैं और बताते हैं कि पंजाब और बंगाल के साथ-साथ सिंध, उत्तर भारत और अन्य क्षेत्रों के परिवारों ने भी इस उथल-पुथल को झेला। लोग अपनी जमीनें, मकान, दुकानें, खेत, रिश्तेदारी और पीढ़ियों से संचित वस्तुएँ छोड़कर चले गए।
किसी घर का नष्ट होना केवल ईंटों का नष्ट होना नहीं होता।घर का सबसे बड़ा हिस्सा उसकी दीवारें नहीं, उसकी निरंतरता होती है।और विभाजन ने वही निरंतरता तोड़ी।किसी परिवार के लिए वह केवल ‘migration’ नहीं था। वह अपने अतीत से प्रशासनिक रूप से अलग कर दिया जाना था।एक व्यक्ति सुबह अपने गाँव में था और शाम तक ‘refugee’ हो चुका था। किसी सरकारी फाइल में यह एक श्रेणी थी।उस मनुष्य के लिए यह उसकी पूरी पहचान का विस्थापन था।
यहाँ एक भाषिक भ्रम भी पैदा किया जाता है।कहा जाता है कि ‘विभीषिका’ शब्द बहुत भावुक है, इतिहास को sensationalise करता है। लेकिन विभाजन के इतिहास में हिंसा, हत्या, लूट, आगजनी, अपहरण, बलात्कार, जबरन विस्थापन, परिवारों का विघटन और सामूहिक पलायन जैसी घटनाएँ दर्ज हैं। Partition Museum के अभिलेखीय विवरण में स्त्रियों के अपहरण और यौन हिंसा, बच्चों की हत्या तथा परिवारों द्वारा ‘इज्जत’ बचाने के नाम पर अपने ही सदस्यों की हत्या तक का उल्लेख मिलता है। तो ‘विभीषिका’ कोई अलंकारिक सजावट नहीं है।वह उस अनुभव का नैतिक नाम है।
जिस इतिहास में मनुष्य अपने घर से निकलते समय यह नहीं जानता कि अगली सुबह वह जीवित होगा या नहीं, उसे केवल ‘पुनर्वास’ कहना प्रशासनिक भाषा की विजय हो सकती है, इतिहास की नहीं। विभाजन के दौरान रेलगाड़ियाँ केवल यातायात का साधन नहीं रहीं। वे विस्थापन की चलती हुई सीमाएँ बन गईं। कुछ ट्रेनें लोगों को उनके नए देश तक लेकर गईं; कुछ स्वयं हिंसा की स्मृति बन गईं।इतिहास की विडंबना देखिए—रेलवे ने भारत को जोड़ने में जो भूमिका निभाई थी, उसी रेल व्यवस्था ने विभाजन के दिनों में मनुष्यों के सबसे बड़े विस्थापन को ढोया।एक ही रेल कभी आधुनिक भारत को जोड़ती है और कभी विभाजन के बाद बचे हुए भारत को गिनती है।
और यह केवल पंजाब की कहानी नहीं थी।
बंगाल का अनुभव अलग था। सिंध का अनुभव अलग था। दिल्ली का अनुभव अलग था। उत्तर भारत के अनेक कस्बों और शहरों ने विस्थापितों की नई बस्तियाँ देखीं। कहीं हिंसा तीव्र थी, कहीं भय अधिक बड़ा था; कहीं तत्काल पलायन हुआ, कहीं धीरे-धीरे सामाजिक और आर्थिक दबावों ने लोगों को जाने पर विवश किया। इसलिए विभाजन को केवल ‘एक तारीख की घटना’ मानना भी गलत है। विभाजन 15 अगस्त की सुबह समाप्त नहीं हुआ था; वह लाखों लोगों के जीवन में वर्षों तक चलता रहा।
इतिहास में आँकड़े आवश्यक हैं। वे भावुकता को अनुशासन देते हैं। लेकिन आँकड़े मनुष्य का विकल्प नहीं होते। मान लीजिए कि किसी अभिलेख में मृतकों की संख्या कम दर्ज है। क्या इसका अर्थ यह होगा कि जिनका नाम दर्ज नहीं हुआ, वे मरे ही नहीं? विभाजन की त्रासदी के सामने यह प्रश्न और कठिन हो जाता है, क्योंकि मृतकों और विस्थापितों की सटीक संख्या निर्धारित करना संभव नहीं है। युद्धों में सैनिकों की गिनती अपेक्षाकृत सरल होती है। लेकिन सामुदायिक हिंसा, पलायन, बीमारी, भूख, रास्ते की मृत्यु, लापता लोग और परिवारों के टूट जाने की घटनाओं में संख्या स्वयं इतिहास की एक समस्या बन जाती है। कितने लोग मरे? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है।लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है—कितने लोग लापता हुए? कितनी स्त्रियाँ अपने परिवारों से अलग हुईं? कितने बच्चे अपने माता-पिता से बिछड़े? कितने लोग कभी वापस नहीं लौटे? कितने घरों में आज भी किसी बुजुर्ग की स्मृति में एक गाँव बसता है जो अब दूसरे देश में है? कितने परिवारों के पास आज भी कोई चाबी है जिसकी ताला-चाबी वाली जगह किसी दूसरे देश में है?
इतिहास की कुछ चाबियाँ दरवाजे नहीं खोलतीं; वे स्मृति खोलती हैं।
दूसरी आपत्ति अधिक सभ्य सुनाई देती है।अब आगे बढ़िए।कितने साल पुरानी बात है।’पुराने जख्म कुरेदने से क्या फायदा?’यह सुनने में शांति की भाषा है। लेकिन हर शांति स्मृति-विहीन नहीं होती। बल्कि कभी-कभी स्मृति ही स्थायी शांति की पहली शर्त होती है।
दुनिया ने Holocaust के बाद स्मृति के संस्थान बनाए। अमेरिका में slavery और racial violence पर संग्रहालय और memorials बने। यूरोप ने अपने युद्धों और नरसंहारों को स्मारकों, संग्रहालयों और सार्वजनिक इतिहास में संरक्षित किया। दक्षिण अफ्रीका ने apartheid की स्मृति को institutionalise किया।क्या वे अपने पुराने जख्म कुरेदना चाहते थे? वे यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि अगली पीढ़ी यह न कह सके कि ऐसा कभी हुआ ही नहीं था। याद करना और बदला लेना दो अलग-अलग क्रियाएँ हैं। शोक और घृणा एक ही चीज नहीं हैं। स्मृति और प्रतिशोध समानार्थी शब्द नहीं हैं। स्मृति का अर्थ अतीत को वर्तमान पर थोपना नहीं; अतीत को वर्तमान के विवेक में उपस्थित रखना है।
यही वह बिंदु है जिसे विभाजन-स्मृति पर होने वाली बहस में बार-बार खो दिया जाता है।यदि 14 अगस्त को विभाजन की पीड़ा को याद करना किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा उत्पन्न करने के लिए किया जाए, तो वह स्मृति की गरिमा के विरुद्ध होगा।लेकिन यदि इसी भय से स्मृति को ही रोक दिया जाए कि कहीं कोई घृणा न पैदा हो, तो यह भी गलत है।क्योंकि फिर हम इतिहास को नहीं, अपनी असुविधा को सुरक्षित कर रहे होंगे।
स्मरण का अर्थ यह नहीं कि हम 1947 को 2026 में पुनः जीना चाहते हैं। स्मरण का अर्थ यह है कि हम 1947 को 2026 में समझना चाहते हैं।दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है।पहला अतीत को पुनर्जीवित करना है।दूसरा अतीत से विवेक प्राप्त करना है। सभ्य समाज अपने मृतकों को बदला लेने के लिए नहीं, भविष्य को चेतावनी देने के लिए याद करता है। 14 अगस्त का सबसे सार्थक अर्थ इसी में है। यह किसी वर्तमान समुदाय का अपराध-पत्र नहीं होना है। यह किसी वर्तमान नागरिक के विरुद्ध वंशानुगत अभियोग नहीं होना है। यह किसी समकालीन राजनीतिक संघर्ष का substitute नहीं होना चाहिए।यह तो उस मनुष्य की स्मृति है जो हिंसा के बीच मर गया।उस स्त्री की स्मृति है जो अपने घर से उखड़ी।उस बच्चे की स्मृति है जिसने अपने माता-पिता को खो दिया।उस बूढ़े की स्मृति है जिसने अपने जीवन का गाँव दूसरी ओर छोड़ दिया।उस परिवार की स्मृति है जिसने अपनी जमीन के बदले एक शरणार्थी शिविर पाया।और उस पूरे समाज की स्मृति है जिसने पहली बार इतनी विराट मात्रा में समझा कि राजनीतिक सीमाएँ कागज पर खिंचती हैं, लेकिन उनका दर्द मनुष्य के शरीर और मन पर खिंचता है।
विभाजन की पूरी स्मृति केवल ‘उन्होंने हमें मारा’ की स्मृति नहीं हो सकती।उसमें यह भी होना चाहिए—‘उन्होंने हमें बचाया।’किसी मुस्लिम परिवार ने किसी हिन्दू पड़ोसी को छिपाया होगा।किसी हिन्दू ने किसी मुस्लिम परिवार को सुरक्षित पहुँचाया होगा।किसी सिख ने किसी अनजान परिवार को अपने घर में शरण दी होगी।किसी अजनबी ने किसी बच्चे को सीमा के पार पहुँचाया होगा।
इन कथाओं को भूल जाना भी विभाजन को भूल जाना है। विभाजन क्रूरता का परिणाम था; लेकिन उसी विभाजन ने मनुष्य की करुणा को भी परखा था।स्मृति यदि केवल अपराधियों को याद रखती है और रक्षकों को भूल जाती है, तो वह प्रतिशोध की स्मृति बन जाती है। स्मृति यदि पीड़ितों और सहायकों दोनों को याद रखती है, तो वह सभ्यता की स्मृति बनती है।
विभाजन केवल constitutional rearrangement नहीं था।वह एक विशाल social rupture था। राज्य की सीमा बदली, लेकिन उसके साथ लोगों की सामाजिक दुनिया बदल गई। एक पड़ोसी अचानक ‘दूसरे देश’ का नागरिक हो गया। एक बाजार की आर्थिक संरचना बदल गई।एक भाषा का भूगोल बदल गया। परिवारों की वंशावली टूट गई। व्यापारिक नेटवर्क टूटे।धार्मिक स्थल दूसरी तरफ रह गए।कब्रें और श्मशान दूसरी तरफ रह गए। पुरखों के घर दूसरी तरफ रह गए।और सबसे विचित्र बात—मनुष्य स्वयं अपनी स्मृति के भीतर दो देशों में बँट गया।पासपोर्ट नया बन सकता है; बचपन का भूगोल नहीं। यही कारण है कि विभाजन की मौखिक इतिहास-परंपरा इतनी महत्वपूर्ण है।
सतीश ऐलिया ने उन अनुभवों को संजोने का प्रयास किया है।
विभाजन को ‘exaggeration’ कहने वालों से एक सरल प्रश्न पूछा जाना चाहिए—किसकी स्मृति को आप अतिशयोक्ति कह रहे हैं?उस व्यक्ति की जिसने अपने परिवार को खोया? उस स्त्री की जिसने अपना घर छोड़ा?उस बच्चे की जिसने अपने पिता को फिर कभी नहीं देखा? उस परिवार की जिसने पीढ़ियों की संपत्ति एक गठरी में बाँधकर यात्रा की?या उस इतिहासकार की जो उपलब्ध अभिलेखों से अनुमान लगाता है?
इतिहासकार को संख्या पर बहस करनी चाहिए। अवश्य करनी चाहिए।लेकिन पीड़ित की स्मृति को इसलिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह statistical precision में नहीं आती। जिसे इतिहासकार footnote में लिखता है, वह किसी परिवार की तीन पीढ़ियों तक चलने वाली चुप्पी हो सकती है।यहाँ scholarly rigour और human empathy को एक-दूसरे का विरोधी बनाना आवश्यक नहीं है।बल्कि अच्छा इतिहास दोनों को साथ रखता है। जहाँ प्रमाण है वहाँ प्रमाण।जहाँ अनिश्चितता है वहाँ अनिश्चितता।जहाँ स्मृति है वहाँ स्मृति।और जहाँ स्मृति और दस्तावेज़ में अंतर है वहाँ उस अंतर की ईमानदार पड़ताल।
विभाजन की विभीषिका को याद करने के लिए fabricated numbers की आवश्यकता नहीं है। सच्चे आँकड़े ही पर्याप्त भयावह हैं।
कहा जाता है कि विभाजन-विभीषिका स्मृति दिवस एक राजनीतिक परियोजना है।लेकिन इससे स्मरण का मूल नैतिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाता।मृतकों की स्मृति को चुनौती मत दीजिए। सरकारें बदलती हैं; मृतकों की स्मृति सरकारों की सम्पत्ति नहीं होती।इसीलिए विभाजन-स्मृति को किसी दल या सरकार से बड़ा बनाना आवश्यक है।वह नागरिक स्मृति हो। वह संग्रहालयों में हो।विश्वविद्यालयों में हो।परिवारों की oral histories में हो।
साहित्य में हो। सिनेमा में हो।स्थानीय इतिहास में हो। और सबसे बढ़कर—वह इतिहास की ईमानदार शिक्षा में हो।
एक ही स्मृति दो तरह से काम कर सकती है।
पहली स्मृति कहती है—‘देखो, उन्होंने हमारे साथ क्या किया था।’ दूसरी कहती है—
‘देखो, मनुष्य जब भय, घृणा और राजनीतिक उन्माद के हवाले हो जाता है तो क्या कर सकता है।’ पहली स्मृति शत्रु बनाती है।दूसरी चेतावनी बनाती है।पहली अतीत को वर्तमान में घसीटती है।दूसरी वर्तमान को अतीत से सावधान करती है।इतिहास की सबसे परिपक्व स्मृति वह है जो अपराध को याद रखती है, लेकिन अपराधी की तलाश में भविष्य की पूरी पीढ़ी को दोषी नहीं बनाती।इसलिए विभाजन को याद करना चाहिए—लेकिन विभाजनकारी ढंग से नहीं।हिंसा को याद करना चाहिए—लेकिन हिंसा की भाषा में नहीं।यही स्मृति की नैतिक परीक्षा है।
‘पुराने जख्म मत कुरेदो’ कहने वालों से एक और प्रश्न है—क्या किसी घाव को देखकर उसकी चिकित्सा रुक जाती है? चिकित्सक घाव को इसलिए देखता है कि वह जान सके कि भीतर संक्रमण है या नहीं।समाज को भी अपने घाव देखने पड़ते हैं।जो समाज अपने घाव देखने से डरता है, वह कभी-कभी उन्हें भरने के बजाय उनके साथ जीना सीख जाता है।और untreated wounds का अपना इतिहास होता है।वे स्मृति में लौटते हैं।परिवारों की कथाओं में लौटते हैं।लोकगीतों में लौटते हैं।नामों में लौटते हैं।मौन में लौटते हैं।कभी-कभी अगली पीढ़ी की धारणाओं में लौटते हैं।
इसलिए स्मृति का उद्देश्य घाव को ताजा रखना नहीं, घाव को समझना है।
यही कारण है कि विभाजन की स्मृति को केवल शोकसभा तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।उसे शोध का विषय बनना चाहिए।मनोविज्ञान का विषय बनना चाहिए।Migration studies का विषय बनना चाहिए।Gender history का विषय बनना चाहिए।Memory studies का विषय बनना चाहिए।Urban history का विषय बनना चाहिए।और साहित्य का तो वह स्वाभाविक विषय है ही।क्योंकि आँकड़े बता सकते हैं कि कितने लोग विस्थापित हुए।साहित्य पूछता है—वे रात को सोते समय किस घर को याद करते थे?इतिहास बता सकता है कि सीमा कहाँ खिंची।साहित्य पूछता है—सीमा खिंचने के बाद बचपन कहाँ गया?
साहित्य ने वह देखा जो प्रशासनिक फाइल नहीं देख सकती।विभाजन का साहित्य इसीलिए महत्वपूर्ण है कि वह राजनीतिक निर्णय को मनुष्य के अनुभव में बदल देता है।गुरुदत्त, भीष्म साहनी, कृष्णा सोबती, यशपाल, मंटो, अमृता प्रीतम, इंतज़ार हुसैन और अनेक भारतीय भाषाओं के लेखकों ने विभाजन के अनुभव को अलग-अलग कोणों से दर्ज किया।
मंटो के यहाँ विभाजन का पागलपन मनुष्य की पहचान पर प्रश्न बनकर आता है।भीष्म साहनी के यहाँ हिंसा सामाजिक ताने-बाने के विघटन का रूप लेती है।अमृता प्रीतम की स्मृति में पंजाब केवल भूगोल नहीं, रक्त और प्रेम से बनी हुई एक सांस्कृतिक देह है।कृष्णा सोबती के लेखन में विभाजन से पहले का साझा जीवन भी महत्वपूर्ण है—क्योंकि केवल टूटने को समझना पर्याप्त नहीं, यह भी समझना जरूरी है कि क्या टूट रहा था।यही साहित्य का सबसे बड़ा योगदान है।वह हमें बताता है कि विभाजन से पहले लोग केवल हिन्दू, मुसलमान और सिख नहीं थे।वे पड़ोसी थे।वे दोस्त थे।वे ग्राहक और दुकानदार थे।वे सहकर्मी थे।वे एक-दूसरे के विवाहों में जाते थे।वे एक-दूसरे की बीमारियों में साथ होते थे।उनकी बोलियों में दूसरे की आवाज़ मिली हुई थी।उनके खान-पान में दूसरे की स्मृति थी।उनके त्योहारों में साझा उपस्थिति थी। विभाजन ने केवल सीमाएँ नहीं बनाईं; उसने ‘हम’ की परिभाषा को भी झकझोर दिया।
विभाजन का स्मरण वास्तव में भारत की साझा सभ्यता का स्मरण भी है। यह एक गहरी विडंबना है कि विभाजन को याद करते हुए हम केवल विभाजन की कथा नहीं याद करते।हम उस भारत को भी याद करते हैं जो विभाजन से पहले था।लाहौर, अमृतसर, कराची, दिल्ली, ढाका, लखनऊ, पेशावर, मुल्तान, सिंध, बंगाल—इन सबके बीच जो सांस्कृतिक आवागमन था, वह किसी एक राजनीतिक नक्शे में कैद नहीं था।भाषाएँ सीमाएँ नहीं मानतीं।खान-पान सीमाएँ नहीं मानता।लोकस्मृति सीमाएँ नहीं मानती।संगीत सीमाएँ नहीं मानता।परिवारों की स्मृतियाँ तो बिल्कुल नहीं मानतीं।
इसलिए विभाजन का स्मरण एक अर्थ में उस साझा सभ्यता का भी स्मरण है जिसे राजनीतिक भूगोल ने काट दिया।नक्शे ने देश बाँटे; स्मृति ने अब तक नहीं।यही कारण है कि विभाजन की स्मृति को केवल राजनीतिक राष्ट्रवाद की स्मृति बना देना भी उसकी सीमा घटा देना होगा।यह उससे बहुत बड़ी मानवीय स्मृति है।
प्रश्न यह है कि स्मृति का अधिकार किसका है? इस प्रश्न का उत्तर होना चाहिए—सबका।भारत के नागरिक का ? पाकिस्तान के नागरिक का ? बांग्लादेश के नागरिक का ? उन परिवारों का जो भारत में रह गए ? उनका भी जो पाकिस्तान चले गए। उनका भी जो पूर्वी बंगाल से पश्चिम बंगाल आए। उनका भी जो सिंध से भारत आए। उनका भी जो पंजाब से पंजाब के दूसरे हिस्से में पहुँचे।विभाजन का शोक किसी सीमा-पार पासपोर्ट का मोहताज नहीं।
यही कारण है कि विभाजन की स्मृति को किसी समुदाय-विरोधी आख्यान में बदलना उसकी मूल मानवीयता को नष्ट करना है।जिस मुस्लिम परिवार ने अपना घर खोया, उसका दुःख उतना ही वास्तविक है।जिस हिन्दू परिवार ने अपना घर खोया, उसका दुःख उतना ही वास्तविक है।जिस सिख परिवार ने अपना घर खोया, उसका दुःख उतना ही वास्तविक है।और जहाँ किसी ने किसी को बचाया, वहाँ उस बचाने वाले की स्मृति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
एक परिपक्व समाज इतिहास को अदालत की तरह इस्तेमाल नहीं करता जिसमें सदियों बाद वर्तमान पीढ़ियों को कटघरे में खड़ा किया जाए। लेकिन इतिहास को कब्रिस्तान की तरह भी नहीं बनाया जाना चाहिए जहाँ मृतकों के नाम तक न हों।इन दोनों के बीच एक तीसरा रास्ता है—इतिहास को विद्यालय बनाइए।जहाँ हम सीखें कि राजनीतिक ध्रुवीकरण कहाँ ले जा सकता है। जहाँ हम सीखें कि राज्य की क्षमता के टूटने का मूल्य कौन चुकाता है। जहाँ हम सीखें कि भीड़ में व्यक्ति अपनी नैतिक जिम्मेदारी कैसे खो देता है।जहाँ हम सीखें कि पड़ोसी को ‘दूसरा’ बनाने की प्रक्रिया कितनी खतरनाक है।
और जहाँ हम यह भी सीखें कि संकट की घड़ी में मनुष्य दूसरे मनुष्य के लिए खड़ा हो सकता है।विभाजन की सबसे बड़ी शिक्षा यह नहीं कि मनुष्य बुरा है; यह है कि मनुष्य को बुरा बनाने वाली परिस्थितियाँ कितनी जल्दी तैयार हो सकती हैं।
मान लीजिए हम विभाजन को भूल जाएँ। क्या सीमा मिट जाएगी?नहीं। क्या विस्थापितों के परिवारों की स्मृतियाँ मिट जाएँगी? क्या पुरानी पीढ़ी के पास अपने गाँवों की याद नहीं रहेगी? नहीं।
क्या इतिहास से हिंसा के दस्तावेज़ गायब हो जाएँगे?
तो भूलना करेगा क्या? केवल इतना कि अगली पीढ़ी उस घटना को बिना संदर्भ के पाएगी।और तब इतिहास की जगह मिथक लेगा। यह और खतरनाक है।क्योंकि तथ्य की जगह जब मिथक आता है तो वह अधिक भावुक, अधिक चयनात्मक और अधिक राजनीतिक हो सकता है। स्मृति को दबाने से इतिहास समाप्त नहीं होता; वह भूमिगत हो जाता है।और भूमिगत इतिहास कभी-कभी सार्वजनिक इतिहास से अधिक विषैला होकर लौटता है।इसलिए विभाजन को ईमानदारी से पढ़ाना, दस्तावेज़ित करना और याद करना आवश्यक है।
इस दिन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कितने पोस्ट लिखे गए।न यह कि कितने भाषण हुए। न यह कि किस दल ने क्या कहा।न यह कि किसने किसे दोष दिया। सबसे बड़ा प्रश्न होना चाहिए—क्या हमने उस दिन किसी मनुष्य को याद किया? क्या हमने अपने घर के किसी बुजुर्ग से पूछा कि उनके परिवार ने क्या झेला था? क्या हमने कोई oral history दर्ज की?क्या हमने कोई पुरानी तस्वीर सुरक्षित की? क्या हमने अपने बच्चों को बताया कि स्वतंत्रता का सूर्योदय सबके लिए एक जैसा नहीं था?क्या हमने उन्हें यह भी बताया कि उस अँधेरे में कुछ लोगों ने अपने पड़ोसियों को बचाया? क्या हमने उन्हें यह समझाया कि वर्तमान का कोई नागरिक 1947 के किसी अपराध के लिए जन्म से दोषी नहीं है? यदि हाँ, तभी स्मृति सार्थक है।
विभाजन को याद करने का सही तरीका
स्मरण का पहला नियम होना चाहिए—तथ्य।
दूसरा—करुणा।
तीसरा—संदर्भ।
चौथा—संतुलन।
पाँचवाँ—भविष्य की चेतावनी।
और सबसे अंत में—मानवता।
विभाजन की स्मृति में हिंसा को छिपाया न जाए। लेकिन हिंसा को pornography of violence भी न बनाया जाए। मृतकों को याद किया जाए। लेकिन मृतकों के नाम पर जीवितों से घृणा न की जाए।पीड़ितों की कथा कही जाए। दोषियों की भूमिका पर शोध हो।
विभाजन की स्मृति का अंतिम शब्द ‘घृणा’ नहीं, ‘फिर कभी नहीं’ होना चाहिए।
सभ्यताओं की स्मृति विचित्र होती है।नेताओं के नाम बच जाते हैं।संधियों के नाम बच जाते हैं। युद्धों के वर्ष बच जाते हैं। लेकिन जिन लोगों ने वे युद्ध झेले, उनके नाम अक्सर खो जाते हैं।विभाजन के मामले में यह और मार्मिक है। एक किसान का खेत इतिहास की किताब में नहीं आता। एक स्त्री की टूटी चूड़ी archival catalogue में शायद दर्ज न हो। एक बच्चे का खोया हुआ भाई किसी census table में नहीं मिलेगा। एक परिवार का आधा हिस्सा दूसरी ओर रह गया—यह किसी राजनीतिक भाषण में एक पंक्ति भी नहीं बनेगा। लेकिन मनुष्य का इतिहास इन्हीं छोटे-छोटे दुखों से बना है। राष्ट्र इतिहास में तारीखों से बनते हैं; मानव स्मृति में चेहरों से।इसलिए विभाजन-विभीषिका दिवस का सबसे सुंदर अर्थ शायद यही है कि हम इतिहास को फिर से चेहरा दें।एक चेहरा।फिर दूसरा।फिर तीसरा।और देखते-देखते आँकड़ा मनुष्य बन जाए।
आधुनिक समाज के सामने एक विचित्र संकट है। हमारे पास सूचना पहले से कहीं अधिक है और स्मृति शायद पहले से कहीं कम। हम सब कुछ search कर सकते हैं, लेकिन सब कुछ याद नहीं रखते।हमारे पास archives हैं, लेकिन attention span छोटा है।हमारे पास documents हैं, लेकिन context कम है।इसलिए विभाजन की स्मृति का संस्थानीकरण केवल ceremonial आवश्यकता नहीं है।यह democratic necessity भी है।क्योंकि लोकतंत्र केवल वर्तमान के मतदाताओं से नहीं बनता।वह मृतकों की स्मृतियों और आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारियों के बीच भी बनता है।लोकतंत्र की एक परीक्षा यह भी है कि वह अपने मृतकों को कितनी ईमानदारी से याद करता है।और शायद दूसरी यह कि वह मृतकों की स्मृति का इस्तेमाल जीवितों से घृणा कराने के लिए नहीं करता। यही संतुलन हमें चाहिए।
हर पुराना जख्म बेकार नहीं होता; कुछ जख्म शरीर की नहीं, सभ्यता की स्मृति होते हैं।और दोनों आपत्तियों के भीतर एक साझा समस्या है। एक कहती है—‘इतना नहीं हुआ।’ दूसरी कहती है—‘जो हुआ, उसे अब याद मत करो।’
पहली तथ्य को छोटा करती है।दूसरी स्मृति को।और दोनों मिलकर इतिहास को कमजोर करती हैं।
आगे बढ़ना भूलना नहीं होता। आगे बढ़ना यह है कि आप अतीत को पीछे छोड़ते हुए भी उससे सीख अपने साथ लेकर जाएँ। एक बच्चा आग से जलने के बाद आग को भूलता नहीं। वह आग से डरकर जीवन भी नहीं छोड़ देता। वह सीखता है कि आग को कैसे संभालना है।सभ्यता भी यही करती है। परिपक्व समाज अतीत से भागता नहीं; वह अतीत को अपने विवेक में बदल देता है। इसलिए विभाजन को याद करना भारत को पीछे ले जाना नहीं है। यदि सही ढंग से किया जाए तो यह भारत को अधिक आधुनिक, अधिक मानवीय और अधिक लोकतांत्रिक बना सकता है।क्योंकि आधुनिकता का अर्थ स्मृतिहीन होना नहीं।
आधुनिकता का अर्थ है—स्मृति के साथ विवेक रखना।
क्या हमने उस मनुष्य को इतिहास में उसकी जगह दी, जिसे इतिहास ने भूगोल में जगह नहीं दी? यदि विभाजन ने किसी को शरणार्थी बनाया था, तो स्मृति उसे फिर से मनुष्य बनाती है। यही स्मृति का सबसे बड़ा न्याय है।
विभाजन की स्मृति केवल आँसू नहीं है।वह विवेक है। वह चेतावनी है। वह आत्मपरीक्षण है। वह करुणा है। वह दस्तावेज़ है। वह साहित्य है। वह परिवारों की मौखिक परंपरा है। वह पुरानी तस्वीरों की धूल है। वह उन शहरों के नाम हैं जिन्हें दो देशों ने अलग-अलग उच्चारित करना शुरू कर दिया। वह वह घर है जिसकी खिड़की अब दूसरी तरफ खुलती है।वह वह नदी है जिसे सीमा ने नहीं बाँटा, लेकिन मनुष्य ने उसके किनारे बाँट दिए। और वह वह प्रश्न है जो आज भी इतिहास पूछता है—क्या राजनीतिक असहमति को इतना बढ़ाया जा सकता है कि पड़ोसी शत्रु बन जाए? यदि उत्तर हाँ है, तो विभाजन को याद करना आवश्यक है।यदि उत्तर नहीं है, तब भी विभाजन को याद करना आवश्यक है। क्योंकि इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियाँ इसी भ्रम से जन्म लेती हैं कि ‘ऐसा फिर कभी नहीं होगा।’ स्मृति उस भ्रम के विरुद्ध मनुष्य की छोटी-सी सुरक्षा है।इसलिए 14 अगस्त को विभाजन-विभीषिका स्मृति दिवस कहना किसी घृणा को पुनर्जीवित करना नहीं होना चाहिए। यह मृतकों के प्रति एक विनम्र प्रणाम होना चाहिए। उन विस्थापितों के प्रति कृतज्ञता होना चाहिए जिन्होंने शून्य से जीवन बनाया। उन लोगों के प्रति सम्मान होना चाहिए जिन्होंने संकट में मनुष्यता बचाई। और भविष्य के प्रति एक गंभीर प्रतिज्ञा—सीमाएँ फिर खिंच सकती हैं; मनुष्यता फिर नहीं टूटनी चाहिए। क्योंकि अंततः विभाजन की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं थी कि भारत का नक्शा बदल गया।सबसे बड़ी त्रासदी यह थी कि उस परिवर्तन की कीमत मनुष्यों ने अपने जीवन से चुकाई। और इसलिए उन्हें याद करना किसी राजनीति का उपकार नहीं। यह मनुष्य का मनुष्य पर ऋण है।
मृतकों को याद करना अतीत से चिपके रहना नहीं; यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य उनके अनुभव से वंचित न हो। घाव को देखना घाव कुरेदना नहीं होता। कभी-कभी घाव को देखना ही यह सुनिश्चित करता है कि अगली पीढ़ी उसी जगह फिर घायल न हो।विभाजन की स्मृति किसी के विरुद्ध आरोप-पत्र नहीं; मनुष्य की सामूहिक विवेक-परंपरा में दर्ज एक चेतावनी है।
यही स्मृति को प्रतिशोध से अलग करता है। यही इतिहास को प्रचार से अलग करता है। और यही एक राष्ट्र को अपने अतीत का उत्तराधिकारी बनाता है—उसका बंदी नहीं। हम विभाजन को इसलिए याद नहीं करते कि अतीत के प्रति क्रोध जीवित रहे; हम उसे इसलिए याद करते हैं कि भविष्य में कोई विभाजनकारी परियोजना सफल न हो। यदि इतिहास केवल पुराने जख्म हैं, तो उसे पढ़ना बंद कर दीजिए; यदि इतिहास भविष्य की चेतावनी है, तो उसे भूलना शुरू मत कीजिए।
किसी समाज को अतीत इसलिए नहीं पढ़ाया जाता कि वह हमेशा अतीत में रहे। उसे इसलिए पढ़ाया जाता है कि वह भविष्य में वही भूल दोबारा न करे। 1947 की स्मृति का भविष्योन्मुखी पाठ यह हो सकता है कि कोई भी बहुल समाज अपने भीतर की विविधताओं को ऐसी राजनीतिक रेखाओं में बदलने न दे जिन्हें अंततः भूगोल की रेखाएँ बना दिया जाए। विभाजन की स्मृति का अंतिम प्रश्न ‘किसने किसे मारा?’ नहीं, ‘ऐसी स्थिति फिर कभी बनने क्यों दी जाए?’ होना चाहिए।
कि इसे याद कर पहचान को नागरिकता के ऊपर, समुदाय को राष्ट्र के ऊपर, और राजनीतिक असहमति को territorial separation के ऊपर रखकर देखने की प्रक्रिया शुरू हो। और उससे भी अधिक जब बाहरी शक्तियाँ ऐसी दरारों को रणनीतिक leverage में बदलने लगें तो विभाजन-स्मृति का mature national-security lesson conspiracy theory नहीं, strategic vigilance होना चाहिए।
इतिहास का बड़ा सबक यह है कि किसी बहु-जातीय, बहु-धार्मिक भूभाग का विखंडन केवल तब नहीं होता जब कोई बाहर से नक्शा खींच देता है। अक्सर उससे पहले एक दीर्घ प्रक्रिया चलती है—पहले पहचानें कठोर होती हैं। फिर साझा नागरिकता के ऊपर सामुदायिक पहचान रखी जाती है। फिर दूसरे समुदाय की उपस्थिति को अस्तित्वगत खतरे के रूप में चित्रित किया जाता है। फिर राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अस्तित्व की लड़ाई बनाया जाता है।फिर हिंसा वैधता प्राप्त करती है। और अंततः जो कल तक पड़ोसी थे, वे ‘territorial claims’ के पात्र बन जाते हैं। इसलिए सबसे बड़ी सुरक्षा सीमा पर सैनिकों की संख्या नहीं है। किसी राष्ट्र की सबसे पहली सीमा उसके नागरिकों के मन में होती है। यदि वहाँ ‘हम’ का अर्थ सिकुड़ता गया, तो नक्शे की सीमाएँ बहुत देर तक सुरक्षित नहीं रहतीं।
14 अगस्त केवल यह याद करने का दिन नहीं कि भारत एक बार विभाजित हुआ था; यह स्वयं को याद दिलाने का दिन है कि भारत को फिर कभी विभाजित होने की परिस्थितियाँ पैदा नहीं होने देनी हैं। विभाजन की स्मृति अतीत की राख कुरेदना नहीं; भविष्य की आग पहचानना है।
यह ध्यान रखते हुए सतीश एलिया की यह पुस्तक पढ़िये।
श्रीवास्तव जी की कलम से लिखित यह समीक्षा है।