वंदे मातरम् आंदोलन
सन 1907 के मध्य में विद्यालय निरीक्षक प्रतिवर्ष की भांति स्कूल का निरीक्षण करने नील सिटी स्कूल आए थे। जैसे ही निरीक्षक केशव हेडगेवार की कक्षा में गए, सभी छात्रों ने उठकर एक साथ 'वंदे मातरम्' की जोरदार घोषणा से उनका स्वागत किया और प्रत्येक कक्षा में इसकी पुनरावृत्ति होती रही। केशव के सहपाठी गोविंद गणेश आवदे ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा- 'गुस्से से लाल-पीले होकर विद्यालय निरीक्षक प्रधानाध्यापक जनार्दन विनायक ओक के कमरे में आ गए और बिना बात किए सीधे चले गए। इसके तुरंत बाद उन्होंने विद्यालय प्रबंध समिति के चेयरमैन सर विपिन कृष्ण बोस को पत्र लिखकर दोषी छात्रों को 'अनुशासनहीनता' के लिए अविलंब सजा देने की मांग की।' स्कूल के अधिकारियों को इसका तनिक भी भान नहीं था कि छात्रों के बीच जबर्दस्त राजनीतिक ध्रुवीकरण हो चुका है। केशव ने आरंभ से अंत तक की योजना अत्यंत ही गोपनीय तरीके से बना रखी थी। विद्यालय प्रबंध समिति के निर्णय के विरुद्ध स्कूल के सभी दो हजार छात्र अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। हड़ताल दो महीने तक चलती रही। इस हड़ताल में नागपुर का मारिस कालेज भी शामिल हो गया। केशव के नेतृत्व में जुलूस, प्रभात फेरी इत्यादि आम बात बन गई। अंततः अच्युतराव कोल्हटकर की मध्यस्थता से स्कूल खुला। छात्रों ने समझाने-बुझाने तथा अपने माता-पिता एवं शिक्षकों के दबाव में माफी माग ली। परंतु अकेले केशव ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने भरी सभा में कहा: "अगर मातृभूमि की आराधना अपराध है तो मैं यह अपराध एक नहीं, अनगिनत बार करूंगा और इसके लिए मिलने वाली सजा को भी सहर्ष स्वीकार करूंगा।' फलतः सितंबर माह में केशव को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। केशव ने इसे देशभक्ति का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। नागपुर में वह लोकप्रिय युवा नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
असहयोग आंदोलन
इस आंदोलन में डॉ. हेडगेवार का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने गांव-गांव जाकर भाषण दिया और लोगों को जागृत किया। इस पर अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह (sedition) का अनुसार, आमतौर पर नेता लोग कोई बचाव नहीं मुकदमा चलाया। तब आंदोलन के नियम करते थे, सजा भुगतना ही अपना बयान होता था। लेकिन डॉक्टर हेडगेवार ने तय किया कि मैं कोर्ट में डिफेन्स दूंगा, क्योंकि वह भी मेरा एक भाषण ही होगा।" उस समय अदालत में जनता और पत्रकार मौजूद रहते थे, तो उन्हें अपना संदेश फैलाने का उन्होंने न्यायाधीश से सीधे पूछा था, "न्यायाधीश एक और अवसर मिलना था। अपने मुकदमे में महोदय, यह बताइए कि किस क़ानून के तहत अंग्रेज लोग यहां आकर भारत पर राज्य कर रहे हैं? स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है - यह सारी दुनिया मानती है। तो क्या कोई कानून है जिसके आधार पर अंग्रेज हम पर राज कर रहे हैं? नहीं है! इसलिए अंग्रेजों का राज्य ही गैर-क़ानूनी है। आपका कोर्ट भी गैर-कानूनी है। आप तो गैरकानूनी जज हैं-मैं आपके अधिकार को मानता ही नहीं!" उन्होंने कहा- "मैंने केवल देशवासियों को यही बताया कि स्वतंत्र होना हमारा अधिकार है। और स्वतंत्र कैसे होना है, यह भी समझाया। मैंने कोई अपराध नहीं किया। और अगर आपने इसे अपराध माना भी, तो आपमें मुझे सजा देने का अधिकार नहीं है क्योंकि मैं आपकी अदालत को मान्यता नहीं देता।" इस पर उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा हुई। सजा सुनाते हुए मैजिस्ट्रेट ने टिप्पणी लिखी - अंग्रेजी में जिसे Obiter Dicta कहते है कि "जिन भड़काऊ भाषणों के कारण इन पर अभियोग लगाया गया है, उनसे अधिक विद्रोहपूर्ण तो इनका बचाव में दिया गया जवाब है।"

