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Tuesday, September 22, 2026

आप जनरल कास्ट है!


एकेडमिक सुईसाईंड क्या होती है? मुझसे बेहतर कौन जान सकता है, बात २०१० की है इलाहाबाद उच्च न्यायालय का राम मंदिर मामले के ठीक कुछ महीनों पहले, मेरी रैगिंग ही एक महिला प्राध्यापक ने कराई थी, जो कि पुणे यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र विभाग में जेंडर स्टडीज पढ़ाती थी। मै उस समय पुणे यूनिवर्सिटी में हॉस्टल में रहकर समाजशास्त्र विभाग में पढ़ रहा था। फर्स्ट सेमिस्टर में टॉप करने के बाद द्वितीय सेमिस्टर से यह शुरुआत हुई थी। टॉपर रहने पर भी तीसरे सेमिस्टर में मुझे एडमिशन नहीं दिया गया था। उसके लिए कुलगुर के कार्यालय के चक्कर २ महीनों तक लगाने पड़े। उस समय समाजशास्त्र की विभाग प्रमुख स्वाती शिरवाडकर द्वारा मेरे पिताजी के नाम पत्र भेजा गया। जिसपर मेरे द्वारा किए जा रहे आंदोलन पर पिताजी द्वारा अंडरटेकिंग लिया जाना था। अन्याय के विरोध में किए गए मेरे द्वारा आंदोलन उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं आए जो व्यवस्था न्याय, समता बंधुता छात्रों को पाठ्यक्रम में सिखाती है। Institutional Injustice कहा जाता है जब संस्थान ही अन्याय करता है, बार बार अन्याय करता है। वह निरंकुश होता है। 

यह लिखने का प्रयोजन किसी की भूमिका का पक्षधर होना नहीं है। कोई सही हो सकता है तो कोई गलत भी हो सकता है। न मारनेवाले का पक्ष और न आत्महत्या करनेवाले का पक्ष मै ले सकता हूं । यह व्यवस्था में सुधार होगा ऐसी आशा की रत्ती भर गुंजाइश भी मुझे नहीं है। बताना भूल गया हूं मै जाति न मानने वाली जनरल कास्ट से हूं। भारतीय संविधान ने मुझे हिम्मत नहीं दे रखी है, कानून के पालनहारे भी इस पर मौन ही रहते है। इतना अपाहिज बना दिया है कि मै यहां अत्याचार पीड़ित की दास्ताँ लिखूं तो मुझपर वर्तमान में वंचित शोषित पीड़ित सशक्तिमान कोई व्यक्ति इस लिखने भर से आहत होकर मुझपर केस कर दे, कोई अन्य तो छोड़िए मेरे साथी जिन्हें मैं भारतमाता की संतान मानता हूं वे  भी पीछे न रहेंगे इतना मुझे उनपर विश्वास हो गया है। मेरे सहपाठी साथी जो कि उसी अनुसूचित जातियों से संबंधित है उस समय मुझपर हो रहे अन्यायपूर्ण अत्याचार की संवेदना भी उन्हे छू नहीं सकी।

रोहित वेमुला की आत्महत्या पर चिल्लाने वाली मीडिया से समझ सकते है कि वह केवल जातिगत आत्महत्याओं पर ही मुखर रही है। मेरिट की आत्महत्याएं मनोरंजन मात्र है। अब आईआईटी बॉम्बे में एक आत्महत्या हुई, प्रोफेसर पर एट्रोसिटी कानून अंतर्गत धाराएं लगाई गई, इसी डर से आईआईटी के निदेशक भी इस्तीफा दे रहे है। 

इस आत्महत्या की बात तो एक कॉपी (Cheating) करने से शुरू हुई थी, अब तो शिक्षा का स्तर खराब न हो इसके लिए ओपन बुक टेस्ट है। २१वी सदी में जन्मा हर एक व्यक्ति जो हस्ताक्षर करना जानता हो, सरकार की फाइलों में साक्षर है।

जब भी ऐसी विद्यार्थी की आत्महत्या होती है, मै यही सोच लेता हूं कि क्या मैं इसपर कुछ  कर सकता हूं, सिवाय राजनीति स्वार्थ के ? शिक्षा का व्यापारीकरण करवा कर उस महत्व को जीवन का सबसे बड़ा महत्व कॉर्पोरेट मार्केट फोर्सेज ने बना दिया है। उसके लिए लगने वाले श्रम, अर्थकारण और तरुण समय का अनन्य महत्व जनमानस के मस्तिष्क पर थोप दिया गया है और जनता ने इसे स्वीकार भी कर लिया है। 

शिक्षा का बोध होना आवश्यक है न कि रटकर, याद करके डिग्री धारी होना। 

खैर छोड़िए आदर्शों की बात, यह देखिए जो आत्महत्या हुई है उसमें क्या वास्तविक जातिगत प्रताड़ना हुई है ? 

रोहित वेमुला की आत्महत्या के उपरांत ऐसा स्वार्थ राजकरण हुआ, जिसमें अनेक संगठनो ने बहुजन समाज को दिग्भ्रमित किया।

जो भी हो सत्य देर सबेर ही सही जांच में सामने आएगा पर तब तक बहुसंख्य समाज का दिशाभूल किया जाएगा, इसमें ही वक्त गुजर जाएगा।

मृतक के साथ मेरी संवेदना है। परंतु इस विषय पर चिंतन आवश्यक है राजनीति नहीं।

मैने जनरल कास्ट होने का दुख सहा है, उस दुःख का सदा के लिए वरण भी किया है। संघर्ष किया परंतु आत्महत्या नहीं की। और न ही किसी के भरोसे से जिंदगी जिया है। किसी का उपकार कभी नहीं लिया। हां जब उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं हम, तो उसका त्याग करें, वे जातिवादी शक्तियां आपस में ही लड़कर मरेगी और मारेगी।

और इसप्रकार हमने शिक्षा के क्षेत्र से अपने आप को दूर कर लिया। अब वह शिक्षा का क्षेत्र कैंसर बन गया है, सड़ गया है, उसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है इसलिए इससे बचे और आनेवाली पीढ़ियों को बचाएं क्योंकि आप जनरल कास्ट है।

विश्वजीत सिंह

नागपुर

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आप जनरल कास्ट है!

5:46:00 PM Posted by Vishwajeet Singh


एकेडमिक सुईसाईंड क्या होती है? मुझसे बेहतर कौन जान सकता है, बात २०१० की है इलाहाबाद उच्च न्यायालय का राम मंदिर मामले के ठीक कुछ महीनों पहले, मेरी रैगिंग ही एक महिला प्राध्यापक ने कराई थी, जो कि पुणे यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र विभाग में जेंडर स्टडीज पढ़ाती थी। मै उस समय पुणे यूनिवर्सिटी में हॉस्टल में रहकर समाजशास्त्र विभाग में पढ़ रहा था। फर्स्ट सेमिस्टर में टॉप करने के बाद द्वितीय सेमिस्टर से यह शुरुआत हुई थी। टॉपर रहने पर भी तीसरे सेमिस्टर में मुझे एडमिशन नहीं दिया गया था। उसके लिए कुलगुर के कार्यालय के चक्कर २ महीनों तक लगाने पड़े। उस समय समाजशास्त्र की विभाग प्रमुख स्वाती शिरवाडकर द्वारा मेरे पिताजी के नाम पत्र भेजा गया। जिसपर मेरे द्वारा किए जा रहे आंदोलन पर पिताजी द्वारा अंडरटेकिंग लिया जाना था। अन्याय के विरोध में किए गए मेरे द्वारा आंदोलन उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं आए जो व्यवस्था न्याय, समता बंधुता छात्रों को पाठ्यक्रम में सिखाती है। Institutional Injustice कहा जाता है जब संस्थान ही अन्याय करता है, बार बार अन्याय करता है। वह निरंकुश होता है। 

यह लिखने का प्रयोजन किसी की भूमिका का पक्षधर होना नहीं है। कोई सही हो सकता है तो कोई गलत भी हो सकता है। न मारनेवाले का पक्ष और न आत्महत्या करनेवाले का पक्ष मै ले सकता हूं । यह व्यवस्था में सुधार होगा ऐसी आशा की रत्ती भर गुंजाइश भी मुझे नहीं है। बताना भूल गया हूं मै जाति न मानने वाली जनरल कास्ट से हूं। भारतीय संविधान ने मुझे हिम्मत नहीं दे रखी है, कानून के पालनहारे भी इस पर मौन ही रहते है। इतना अपाहिज बना दिया है कि मै यहां अत्याचार पीड़ित की दास्ताँ लिखूं तो मुझपर वर्तमान में वंचित शोषित पीड़ित सशक्तिमान कोई व्यक्ति इस लिखने भर से आहत होकर मुझपर केस कर दे, कोई अन्य तो छोड़िए मेरे साथी जिन्हें मैं भारतमाता की संतान मानता हूं वे  भी पीछे न रहेंगे इतना मुझे उनपर विश्वास हो गया है। मेरे सहपाठी साथी जो कि उसी अनुसूचित जातियों से संबंधित है उस समय मुझपर हो रहे अन्यायपूर्ण अत्याचार की संवेदना भी उन्हे छू नहीं सकी।

रोहित वेमुला की आत्महत्या पर चिल्लाने वाली मीडिया से समझ सकते है कि वह केवल जातिगत आत्महत्याओं पर ही मुखर रही है। मेरिट की आत्महत्याएं मनोरंजन मात्र है। अब आईआईटी बॉम्बे में एक आत्महत्या हुई, प्रोफेसर पर एट्रोसिटी कानून अंतर्गत धाराएं लगाई गई, इसी डर से आईआईटी के निदेशक भी इस्तीफा दे रहे है। 

इस आत्महत्या की बात तो एक कॉपी (Cheating) करने से शुरू हुई थी, अब तो शिक्षा का स्तर खराब न हो इसके लिए ओपन बुक टेस्ट है। २१वी सदी में जन्मा हर एक व्यक्ति जो हस्ताक्षर करना जानता हो, सरकार की फाइलों में साक्षर है।

जब भी ऐसी विद्यार्थी की आत्महत्या होती है, मै यही सोच लेता हूं कि क्या मैं इसपर कुछ  कर सकता हूं, सिवाय राजनीति स्वार्थ के ? शिक्षा का व्यापारीकरण करवा कर उस महत्व को जीवन का सबसे बड़ा महत्व कॉर्पोरेट मार्केट फोर्सेज ने बना दिया है। उसके लिए लगने वाले श्रम, अर्थकारण और तरुण समय का अनन्य महत्व जनमानस के मस्तिष्क पर थोप दिया गया है और जनता ने इसे स्वीकार भी कर लिया है। 

शिक्षा का बोध होना आवश्यक है न कि रटकर, याद करके डिग्री धारी होना। 

खैर छोड़िए आदर्शों की बात, यह देखिए जो आत्महत्या हुई है उसमें क्या वास्तविक जातिगत प्रताड़ना हुई है ? 

रोहित वेमुला की आत्महत्या के उपरांत ऐसा स्वार्थ राजकरण हुआ, जिसमें अनेक संगठनो ने बहुजन समाज को दिग्भ्रमित किया।

जो भी हो सत्य देर सबेर ही सही जांच में सामने आएगा पर तब तक बहुसंख्य समाज का दिशाभूल किया जाएगा, इसमें ही वक्त गुजर जाएगा।

मृतक के साथ मेरी संवेदना है। परंतु इस विषय पर चिंतन आवश्यक है राजनीति नहीं।

मैने जनरल कास्ट होने का दुख सहा है, उस दुःख का सदा के लिए वरण भी किया है। संघर्ष किया परंतु आत्महत्या नहीं की। और न ही किसी के भरोसे से जिंदगी जिया है। किसी का उपकार कभी नहीं लिया। हां जब उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं हम, तो उसका त्याग करें, वे जातिवादी शक्तियां आपस में ही लड़कर मरेगी और मारेगी।

और इसप्रकार हमने शिक्षा के क्षेत्र से अपने आप को दूर कर लिया। अब वह शिक्षा का क्षेत्र कैंसर बन गया है, सड़ गया है, उसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है इसलिए इससे बचे और आनेवाली पीढ़ियों को बचाएं क्योंकि आप जनरल कास्ट है।

विश्वजीत सिंह

नागपुर

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