यह कल ही की घटना है, मुझे निंद नहीं आई, दुख जताए भी तो किसे, इतनी आत्मीयता जब प्राणियों में ही नहीं रही तो इंसानों में तो बहुत दूर है।
दोपहर में खिड़की से देखा एक बड़ा बंदर, वह तो बंदरिया थी, वानर जैसे उसके साथ कुछ बच्चे बंदर भी थे। वे हमारे कृष्णा हेरिटेज अपार्टमेंट में आए थे। इस तपती गर्मी की दुपहरी में जंगलों से प्राणियों का शहर की ओर आना यह अब आम बात हो गई है। हुप हुप की आवाज से इमली के बड़े पेड़ पर बंदर खेलकूद कर रहे थे। पेड़ के नीचे कुत्ते जमा होकर बंदरों पर भौंक रहे थे।
मैने देखा घर के बच्चे फ्लैट की बालकनी से यह दृश्य मजे लेकर देख रहे है । फिर कुछ ही देर में जोर की आवाज आई देखा ब्लास्ट हुआ है। बड़ी चिंगारी निकली है। मैं दौड़ा दौड़ा भागा भागा फ्लैट की बालकनी में आया, जोर से एक आवाज दी,
कल्पेश !
कल्पेश !
कल्पेश यह गरीब बहुजन समाज से ताल्लुख रखता हुआ लड़का है जो ठेकेदारी में रेलवे में सैंडबॉय का काम करता है। मालगाड़ी के इंजिन में रेत डालने का काम करता है।
वह दौड़ा दौड़ा रेल्वे ट्रैक पर आया। एक मालगाड़ी खड़ी थी। उसमें उसने रेत भर दिया था। उसने मेरे आवाज के जवाब में आवाज लगाई। भईया आया।
भईया बोलिए।
मैने उससे बालकनी से ही पूछा यह ब्लास्ट जैसी आवाज ? उसने कहा एक बंदर करंट लगकर मर गया है।
मैं दौड़ा दौड़ा फ्लैट से नीचे की ओर भागा। सैंड पॉइंट पर पहुंचकर कल्पेश को बोला कहां हुआ है यह ब्लास्ट। उसे साथ चलकर वह जगह दिखाने के लिए कहा।
वह रेलवे ट्रैक पर चलने लगा। बोला भैया छोड़ो ये बंदरों में कहां पड़ रहे हो। मैने कहां भाई ये गर्मी का समय है, शायद दाना पानी के लिए ये प्राणी यहां आए हो। उनके पीछे कुत्ते पड़ गए और यह बंदर कुत्तों से बचने के लिए इलेक्ट्रिक के हाय टेंशन पोल पर चढ़ गया। और इसी दौरान एक ही सेकंड में शायद उसे भी पता न हो इलेक्ट्रिक सर्किट के करंट लगने से उसका पूरा शरीर, उसमें का खून जलकर काला पड़ गया। और वहां से वह नीचे गिरा। अमूमन बंदर तारो पर चिपक जाया करते है। यह तो नीचे गिरा।
मैं वहां उस जगह पहुंचा तो देखा कि इतने कम समय में कुछ कुत्ते उस बंदर के शरीर को नोच रहे है। किसीने पैर के पास तो किसी ने पूछ को नोचना शुरू कर दिया है। मैने पत्थर उठाया और कुत्तों को भगाया। फिर वही उसके पास बैठ गया । इस विचार में की इसकी मौत कैसे हुई होगी। घटनाक्रम घूम रहा था। मैं वही बैठा रहा। मेरे घर से छोटे भाई की बच्ची भी वहां मुझे बड़े पापा कहती हुई आ गई। और देखकर रोने लगी। बच्चों को दुख ज्यादा होता है। कल्पेश कहने लगा भैया बच्चों को रात में नींद नहीं आएगी। बच्चे डर जाएंगे।
मैने कहां सच्चाई उन्हें भी जानने दीजिए, शायद बड़े होकर वे इतने समझदार बन जाएं कि उन्हें यह घटना आम न लगे।
मैं करीब डेढ़ घंटे वही जगह पर फोन लगाता रहा की नगर पंचायत की गाड़ी आ जाएं जिससे उस बंदर की लाश का यथोचित सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो जाएं। अनेक लोगों को फोन लगाया। उन्हें घटना के फोटो व्हाट्सएप पर भेजे। पर कोई सहायता नहीं मिली। इसमें बहुत समय गुजर गया। संध्या होने लगी। अब इस स्थिति में समझ में आया कि प्राणियों की मौत इंसानों के लिए कोई महत्व नहीं रखती।
दुख तो इस बात का था कि वह बंदर किसी के परिवार का हिस्सा था। कुछ दिनों पहले हमने रामनवमी, फिर हनुमान जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई। सुंदरकांड भी पढ़ा, और १३ अप्रैल को यह घटना हो गई।
मुझे लगा कि बाकी के बंदर कहां चले गए। एक बंदर मर गया उसके आसपास बंदर आने चाहिए। बंदरों ने गोला करना चाहिए। आसपास एक भी बंदर नहीं मिला। शायद डर से उस बंदर को छोड़कर भाग गए। प्रायः अपनो के बिछड़ने का दुख प्राणियों में ज्यादा देखा जाता है। पक्षी हो या प्राणी दुख तो होता ही है। कौओं को देखा है दुखी होकर सभा करते हुए।
जब बंदर का परिवार उस बंदर को अपने बीच नहीं पाएगा तो क्या वे उसे ढूंढेंगे? बंदर की माताजी का दुख यह मै सोच कर ही दुखी हो जाता हूं। पता नहीं वह बंदर कितनों को अनाथ कर गया।
क्या इंसानों की तरह प्राणियों में भी आत्मीयता की कमी हो गईं है?
भाई की छोटी बच्ची ने कहा बड़े पापा अब तो हम बर्थडे भी नहीं मना सकते । उसके पिताजी का जन्मदिन था।
रेलवे की तारों से लगकर यह बंदर मरा है। ऐसे न जाने कितने प्राणी, पक्षी अपने परिवार को खो देते है। अब इसके समुचित अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कौन करेगा ? यह रेलवे का मामला है कोई इसमें पड़ना नहीं चाहता। न स्थानिक पुलिस और न नगर पंचायत और न ही वन विभाग के अधिकारी।
इसी जद्दोजहद में बहुत देर हो गई। आखिर नमक, भगवा कपड़ा और पूजा सामग्री लेकर गड्ढा खोदा गया। उसी में एक बोतल पानी से बंदर के मुंह पर पानी डाला गया। भगवे कपड़े में लपेटकर उस बंदर को गड्ढे में रखा गया। उसपर मिट्टी डाली गई।
मुझे रातभर नींद नहीं आई। बार बार उसी बंदर का ख्याल। दुख तो उसके परिवार को भी हुआ होगा।
अब रातभर विचार करके यह निश्चय किया है कि इस दुख के लिए शोकसभा रखी जाएं उसमें वन विभाग, नगर प्रशासन, नागरिक प्रतिनिधि और रेलवे के अधिकारियों को भी बुलाया जाएं।
क्या पता इस शोकसभा से खोई हुई आत्मीयता लौट आएं।



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