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Thursday, May 7, 2026

मोदी जी ! ये नौकरशाह कभी सुधरेंगे नहीं


प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का यह भाषण भारतीय नौकरशाहों के सम्मुख सिविल सर्विस दिवस पर दिया गया। सकारात्मक रूप से प्रधानमंत्री जी ने बच्चों को जैसे समझाया जाता है वैसे ही मंत्रालयीन सचिव, जिलाधिकारी, लोकसेवा परीक्षा उत्तीर्ण किए हुए अधिकारियों को समझाया।

संपूर्ण भाषण यहां दिया गया है, इतना विस्तृत विषय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने रखा। पर मजाल है कि कोई नौकरशाह सच में इतना Agent of Change व्यवहार में बदलाव, Perform करें। ऐसे एक भी उदाहरण नहीं है। भ्रष्टाचार, सुख सुविधा विलास में आकंठ डूबी हुई यह प्रशासनिक व्यवस्था देश की जनता पर निरंकुशता से राज कर रही है service सेवा नहीं कर रही।

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी क्या इस बात से अवगत नहीं है? क्या उन्हें जमीनी सच्चाई नहीं पता है ? 


जब असली मालिक यह देश की जनता किसी सरकारी कार्यालय में जाती है, तो वह नौकर अधिकारी की दया, कृपा का इंतजार करती है। वह दया, करुणा लाखों करोड़ों में किसी एक को ही नसीब होती है। मोदी जी भले ही ऐसी व्यवस्था से अपेक्षा करते हो, परन्तु यथार्थ आप और हम सभी जानते है।


जनता सरकारी नौकर को नौकर ही समझे, अधिकारी नहीं । तब ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का यह भीष्म प्रयास सफल होगा, अन्यथा यह केवल औपचारिकता पूर्ण करने का नाटक ही माना जाएगा।

आप मेरे विचारों से सहमत नहीं होंगे परन्तु जिस दिन आप सरकारी कार्यालय के दरवाजे के बाहर इंतजार करेंगे उस दिन आप जान जायेंगे ये सरकारी नौकर इंसानियत के दुश्मन है। अहंकार, और दंभ में चूर है। निम्नलिखित भाषण मोदी जी ने दिया है अवश्य पढ़िए परन्तु उसे वर्तमान की सच्चाई के तराजू में आकलन किजिए।

मोदी जी के भाषण के बाद भी नौकरशाहों में रत्ती भर का बदलाव न आना यह विशेष रूप से इंगित करता है कि सरकारी नौकर व्यवहार में बदलाव लाने के लिए तैयार नहीं है। यह भाषण नया नहीं है। उस सकारात्मक भाव को नमन, परन्तु यथार्थ से इसका दूर दूर तक संबंध नहीं है।

- विश्वजीत सिंह (नागपुर)

9028266021

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 मंत्री परिषद के मेरे सहयोगी ... उपस्थित सभी महानुभाव और साथियों,

Civil Service Day देश के जीवन में भी और हम सबके जीवन में भी और विशेषकर आपके जीवन में, सार्थक कैसे बने? क्‍या ये ritual बनना चाहिए? हर साल एक दिवस आता है। इतिहास की धरोहर को याद करने का अवसर मिलता है। यह अवसर अपने-आप में इस बात के लिए हमें प्रेरणा दे सकता है क्‍या कि हम क्‍यों चले थे, कहां जाना था, कितना चले, कहां पहुंचे, कहीं ऐसा तो नहीं था कि जहां जाना था वहां से कहीं दूर चले गए? कहीं ऐसा तो नहीं था कि जहां जाना था अभी वहां पहुंचना बहुत दूर बाकी है? ये सारी बातें हैं जो व्‍यक्ति को विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। और ऐसे अवसर होते हैं जो हमें जरा पीछे मुड़ करके और उस कदमों को, उस कार्यकाल को एक critical नजर से देखने का अवसर भी देते हैं। और उसके साथ-साथ, ये अवसर ही होते हैं कि जो नए संकल्‍प के लिए कारण बनते हैं। और ये जीवन में हर किसी का अनुभव होता है। सिर्फ हम यहां बैठे हैं इसलिए ऐसा नहीं है।

एक विद्यार्थी भी जब exam दे करके घर लौटता है, एक तरफ रिजल्‍ट का इंतजार करता है, साथ-साथ ये भी सोचता है कि अगले साल तो प्रारंभ से ही पढ़ूंगा। निर्णय कर लेता है कि अगले साल exam के समय पढ़ना नहीं है मैं बिल्‍कुल प्रारंभ से पढ़ंगा, नियमित हो जाऊंगा, ये खुद ही कहता है किसी को कहना नहीं पड़ता। क्‍योंकि वो परीक्षा का माहौल ऐसा रहता है कि उसका मन करता है कि अगले साल के लिए कुछ बदलाव लाऊंगा हृदय में। और जब स्‍कूल-कॉलेज खुल जाती हैं तो याद तो आता है कि हां, फिर सोचता है ऐसा करें आज रात को पढ़ने के बजाय सुबह जल्‍दी उठ करके पढ़ेंगे। सुबह नींद आ जाती है सोचता है कि शायद सुबह जल्‍दी उठ करके पढ़ना हमारे बस का रोग नहीं है। ऐसा करें रात को ही पढ़ेंगे। फिर कभी मां को कहता है, मां जरा जल्‍दी उठा देना। कभी मां को कहता है रात को ज्‍यादा खाना मत खिलाओ कुछ ऐसा खिलाओ ताकि मैं पढ़ पाऊं। तरह-तरह की चीजें खोजता रहता है। लेकिन अनुभव आता है कि प्रयोग तो बहुत होते हैं लेकिन वो ही हाल हो जाता है, फिर exam आ जाती है फिर देर रात तक पढ़ता है, फिर note एक्‍सचेंज करता है, फिर सोचता है कल सुबह क्‍या होगा? ये जीवन का एक क्रम बन जाता है। क्‍या हम भी उसी ritual से अपने-आपको बांधना चाहते हैं? मैं समझता हूं कि फिर सिर्फ रुकावट आती है ऐसा नहीं है, थकावट भी आती है। और कभी-कभी रुकावट जितना संकट पैदा नहीं करती हैं उतनी थकावट पैदा करती हैं। और जिंदगी वो जी सकते हैं जो कभी थकावट महसूस नहीं करते, रुकावट को एक अवसर समझते हैं, रुकावट को चुनौती समझते हैं, वो जिंदगी को कहीं ओर ले जा सकते हैं। लेकिन जिनके जीवन में एक बार थकावट ने प्रवेश कर दिया वो किसी भी बीमारी से बड़ी भयंकर होती है, उससे कभी बाहर नहीं निकल सकता है और थकावट, थकावट कभी शरीर से नहीं होती है, थकावट मन की अवस्‍था होती है जो जीने की ताकत खो देती है, सपने भी देखने का सामर्थ्‍य छोड़ देती है और तब जा करके जीवन में कुछ भी न करना, और कभी व्‍यक्ति के जीवन में कुछ न होना उसके अपने तक सीमित नहीं रहता है, वो जितने बड़े पद पर बैठता है उतना ज्‍यादा प्रभाव पैदा करता है। कभी-कभार बहुत ऊंचे पद पर बैठा हुआ व्‍यक्ति कुछ कर करके जितना प्रभाव पैदा कर सकता है उससे ज्‍यादा प्रभाव कुछ न करके नकारात्‍मक पैदा कर देता है। और इसलिए मैं अच्‍छा कर सकूं अच्‍छी बात है, न कर पाऊं तो भी ये तो मैं संकल्‍प करुं कि मुझे जितना करना था, उसमें तो कहीं थकावट नहीं आ रही है, जिसके कारण एक ठहराव तो नहीं आ गया? जिसके कारण रुकावट तो नहीं आ गई और कहीं मैं पूरी व्‍यवस्‍था को ऊर्जाहीन, चेतनाहीन, प्राणहीन, संकल्‍प विहीन, गति विहीन नहीं बनाए देता हूं? अगर ये मन की अवस्‍था रही तो मैं समझता हूं संकट बहुत बड़ा गहरा जाता है। और इसलिए हम लोगों के जीवन में जैसे-जैसे दायित्‍व बढ़ता है, हमारे अंदर नया करने ऊर्जा भी बढ़नी चाहिए। और ये अवसर होते हैं जो हमें ताकत देते हैं।

कभी-कभार एक अच्‍छा विचार जितना सामर्थ्‍य देता है, उससे ज्‍यादा एक अच्‍छी सफलता, चाहे वो किसी और की क्‍यों न हो, वो हमारी हौसला बहुत बुलंद कर देती है। आज जो Award Winner हैं उनका कार्यक्षेत्र हिंदुस्‍तान की तुलना में बहुत छोटा होगा। इतने बड़े देश की समस्‍याओं के सामने एकाध चीज को उन्‍होंने हाथ लगाया होगा, हिसाब से लगाए तो वो बहुत छोटी होगी। लेकिन वो सफलता भी यहां बैठे हुए हर किसी को लगता होगा अच्‍छा, इसका ये भी परिणाम हो सकता है? अच्‍छा अनंतनाग में भी हो सकता है? आनंदपुर में भी हो सकता है? हर किसी के मन में विचार आंदोलित करने का काम एक सफल गाथा कर देती है।

और इसलिए Civil Service Day के साथ ये प्रधानमंत्री Award की जो परंपरा रही है उसको एक नया आयाम इस बार देने का प्रयास किया गया। कुछ Geographical कठिनाइयां हैं कुछ जनसंख्‍या की सीमाएं हैं। तो ऐसी विविधताओं से भरा हुआ देश है तो उसको तीन ग्रुप में कर करके कोशिश की लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इतनी भारी scrutiny भी हो सकती हैं सरकारी काम में। वरना तो पहले क्‍या था application लिख देते थे और कुछ लोगों को बहुत अच्‍छा रिपोर्ट बनाने का आता भी है तो jury को प्रभावित भी कर देते हैं। और इस बार प्रभावित करने वाला कोई दायरा ही नहीं था। क्‍योंकि call-center से सैंकड़ों फोन करके पूछा गया भई आपके यहां ये हुआ था क्‍या हुआ ? Jury ने physically वहां meeting की। Video Conferencing से यहीं से Viva किया गया। यानी अनेक प्रकार की कोशिश करने के बाद एक कुछ अच्‍छाइयों की ओर जाने का प्रयास हुआ है। लेकिन जो अच्‍छा होता है उसका आनंद होता है, इतनी बड़ी प्रक्रिया हुई जैसे।

लेकिन मेरे मन में एक विचार आया कि 600-650 से ज्‍यादा जिले हैं। हमारी चुनौती यहां शुरू होती है कि पहले से बहुत अच्‍छा हुआ, क्‍योंकि करीब 74 सफलता की गाथाएं short-list हुईं हैं। वो पहले से कई गुना ज्यादा है। और पहले से कई गुना ज्यादा होना, वो अपने आप में एक बहुत बड़ा समाधान का कारण है। लेकिन जिसके जीवन में थकावट नहीं है, रूकावट का वो सोच ही नहीं सकता है, वो दूसरे तरीके से सोचता है कि 650-700 जिलों में से 10% ही short-list हुए, 90% छूट गये! क्या ये 90% लोगों के लिए चुनौती बन सकती है? उस district के लिए चुनौती बन सकती है कि भले हम सफलता पाएं या न पाएं, पर short-list तक तो हम अपने जिलों को ला करके रहेंगे। अपनी पसंद की एक योजना पकड़ेंगे, इसी वर्ष से पकड़ लेंगे और उस स्तुइदेन्त की तरह नहीं करेंगे, आज इसी Civil Service Day को ही तय करेंगे की अगली बार इस मंच पर होंगे और हम award ले कर के जायेंगे। हिंदुस्तान के सभी 650 से भी अधिक districts के दिमाग में ये विश्वास पैदा होना चाहिए।

74 पहले की तुलना में बहुत बड़ा figure है, बहुत बड़ा प्रयास है, लेकि‍न अगर मैं उससे आगे जाने के लि‍ए सोचता हूं तो मतलब यह है कि‍ थकावट से मैं बंधन में बंधा हुआ नहीं हूं। मैं रूकावट को स्‍वीकार नहीं करता हूं, मैं कुछ और आगे करने के लि‍ए चाहता हूं। यह भाव, यह संकल्‍प भाव इस टीम में आता है और जो लोग वीडि‍यो कॉन्‍फ्रेन्‍स पर मुझे सुन रहे हैं अभी, कार्यक्रम में, उन सब अफसर साहब, उनके भी दि‍माग में भाव आएगा। वो राज्‍य में चर्चा करे कि‍ क्‍या कारण है कि‍ हमारा राज्‍य नजर नहीं आता है। उस district में भी बैठी हुई टीम भी सोचे कि‍ क्‍या कारण है कि‍ आज मेरे district का नाम नहीं चमका। एक healthy competition, क्‍योंकि‍ जब से सरकार में कुछ बातों को लेकर के मैं आग्रह कर रहा हूं। उसमें मैं एक बात कहता हूं, cooperative federalism लेकि‍न साथ-साथ मैं कहता हूं competitive cooperative federalism राज्‍यों के बीच वि‍कास की स्‍पर्धा हो, अच्‍छाई की स्‍पर्धा हो, good governance की स्‍पर्धा हो, best practices की स्‍पर्धा हो, values की स्‍पर्धा हो, integrity की स्‍पर्धा हो, accountability, responsibility की स्‍पर्धा बढ़े, minimum governance का सपना स्‍पर्धा के तहत आगे नि‍कल जाने का प्रयास हो। यह जो competitive की बात है वो district में भी feel होना चाहि‍ए। इस civil service day के लि‍ए हम संकल्‍प करें कि‍ हम भी दो कदम और जाएंगे।

दूसरी बात है, हम लोग जब civil service में आए होंगे। कुछ लोग तो परंपरागत रूप से आए होंगे, शायद family tradition रही होगी। तीन-चार पीढ़ी से इसी से गुजारा करते रहे होंगे, ऐसे कई लोग होंगे। कुछ लोगों को यह भी लगता होगा कि‍ बाकी छोड़ो साहब, यह है एक बार अंदर पाइपलाइन में जगह बना लो। फि‍र तो ऐसे ही चले जाएंगे। फि‍र तो वक्‍त ही ले जाता है, हमें कहीं जाना नहीं पड़ता है। 15 साल हुए तो यहां पहुंच गए, 20 साल हो गए तो यहां पहुंच गए, 22 साल हो गए तो यहां पहुंच गए और जब बाहर नि‍कलेंगे तो करीब-करीब तीन में से एक जगह पर तो होंगे ही होंगे। उसको नि‍श्‍चि‍त भवि‍ष्‍य लगता है। सत्‍ता है, रूतबा है तो आने का मन भी करता है और वो गलत है ऐसा मैं नहीं मानता हूं। मैं ऐसा मानने वालों में से नहीं हूं कि‍ गलत है, लेकि‍न सवा सौ करोड़ देशवासि‍यों में से कि‍तने है जि‍नको यह सौभाग्‍य मि‍लता है। अपने परि‍श्रम से मि‍ला है, अपने बलबूते पर मि‍ला है फि‍र भी, यह भी तो जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्‍य है कि‍ सवा सौ करोड़ में से हम एक-दो हजार, पाँच हजार, दस हजार, पंद्रह हजार लोग है जि‍नको यह सौभाग्‍य मि‍ला है। हम जो कुछ भी है। कोई एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जि‍सने मुझे इन सवा सौ करोड़ के भाग्‍य को बदलने के लि‍ए मौका दि‍या है। इतने बड़े जीवन के सौभाग्‍य के बाद अगर कुछ कर दि‍खाने का इरादा नहीं होता तो यहां पहुंचने के बाद भी कि‍स काम का है और इसलि‍ए तो कभी न कभी जीवन में.. मुझे बराबर याद है मैं आज से 35-40 साल पहले.. मैं तो राजनीति‍ में बहुत देर से आया। सामाजि‍क जीवन में मैंने अपने आपको खपाया हुआ था। तो मैं कभी यूनि‍वर्सि‍टी के दोस्‍तों से गप्‍पे-गोष्‍ठी करने चला जाता था, मि‍लता था, उनसे बात करता था और एक बार मैंने उनसे पूछा क्‍या सोचा, आगे क्‍या करोगे? तो हर कोई बता रहा था, पढ़ाई के बाद सोचेंगे। कुछ बता रहे थे कि‍ नहीं ये पि‍ताजी का व्‍यवसाय है वहीं करूंगा। एक बार मेरा अनुभव है, एक नौजवान था, हाथ ऊपर कि‍या, उसने कहा मैं आईएएस अफसर बनना चाहता हूं। मैंने कहा क्‍यों भई तेरे मन में ऐसे कैसे वि‍चार आया? इसलि‍ए मैंने कहा, क्‍योंकि‍ वहां उनका जरा रूतबा होता है। बोले – नहीं, मुझे लगता है कि‍ मैं आईएएस अफसर बनूंगा तो मैं कइयों की जि‍न्‍दगी में बदलाव ला सकता हूं, मैं कुछ अच्‍छा कर सकता हूं। मैंने कहा राजनीति‍ में क्‍यों नहीं जाते हो, वहां से भी तुम कुछ कर सकते हो। नहीं बोले, वो तो temporary होता है। उसकी इतनी clarity थी। यह व्‍यवस्‍था में अगर मैं गया तो मैं एक लंबे अर्से तक sustainably काम कर सकता हूं। 

आप उस ताकत के लोग है और इसलि‍ए आप क्‍या कुछ नहीं कर सकते हैं वो आप भली-भांति‍ जानते हैं। उसका अहसास कराने की आवश्‍यकता नहीं होती। एक समय होगा, हालात भी ऐसे रहे होंगे। व्‍यवस्‍थाएं बनानी होगी, एक सोच भी रही होगी और ज्‍यादातर हमारा role एक regulator का रहा है। काफी एक-दो पीढ़ी ऐसी हमारी इस परंपरा की रही होगी कि‍ जि‍नका पूरा समय, शक्‍ति‍regulator के रूप में गया होता है। उसके बाद से शायद एक समय आया होगा जि‍नमें थोड़ा सा दायरा बदला होगा। administrator का रूप रहा होगा। administrator के साथ-साथ कुछ-कुछ controller का भी थोड़ा भाव आया होगा। उसके बाद थोड़ा कालखंड बदला होगा तो लगा होगा कि‍ भई अब हमारी भूमि‍का regulator की तो रही नहीं। Administrator या controller से आगे अब एक managerial skill develop करना जरूरी हो गया है क्‍योंकि‍ एक साथ कई चीजें manage करनी पड़ रही है।

हमारा दायि‍त्‍व बदलता गया है लेकि‍न क्‍या 21वीं सदी के इस कालखंड में यहीं हमारा रूप पर्याप्‍त है क्‍या? भले ही मैं regulator से बाहर नि‍कलकर के लोकतंत्र की spirit के अनुरूप बदलता-बदलता administrator से लेकर के managerial role पर पहुंचा हूँ। लेकि‍न मैं समझता हूं कि‍ 21वीं सदी जो पूरे वैश्‍वि‍क स्‍पर्धा का युग है और भारत अपेक्षाओं की एक बहुत बड़ी.. एक ऐसा माहौल बनाए जहां हर कि‍सी न कि‍सी को कुछ करना है, हर कि‍सी को कुछ न कुछ आगे बढ़ना है। हर कि‍सी को कुछ न कुछ पाना भी है। कुछ लोगों को इससे डर लगता होगा। मैं इसे अवसर मानता हूं। जब सवा सौ करोड़ देशवासि‍यों के अंदर एक जज़बा हो कि‍ कुछ करना है, कुछ पाना है, कुछ बनना है। वो अपने आप में देश को आगे बढ़ाने का कारण होता है। ठीक है यार, पि‍ताजी ऐसा छोड़ कर गए अब चलो भई, क्‍या करने की जरूरत है, शौचालय बनाने की क्‍या जरूरत है। अपने मॉ-बाप कहां शौचालय में, ऐसे ही गुजारा करके गए। अब वो सोच नहीं है, वो कहता है नहीं, जि‍न्‍दगी ऐसी नहीं, जि‍न्‍दगी ऐसी चाहि‍ए। देश को बढ़ने के लि‍ए यह अपने आप में एक बहुत बड़ा ऊर्जा तत्‍व है। और ऐसे समय हम administrator हो, हम controller हो, collector हो, यह sufficient नहीं है। अब समय की मांग है कि‍ व्‍यवस्‍था से जुड़ा हुआ हर पुर्जा, छोटी से छोटी इकाई से लेकर के बड़े से बड़े पद पर बैठा हुआ व्‍यक्‍ति‍ वो agent of change बनना समय की मांग है। उसने अपने आप को उस रूप से प्रस्तुत करना पड़ेगा, उस रूप से करना पड़ेगा ताकि‍ वो उसके होने मात्र से, सोचने मात्र से, करने मात्र से change का अहसास दि‍खाई दे और आज या तो कल दि‍खाई देगा, वो इंतजार होना नहीं है। हमें उस तेजी से change agent के रूप में काम करना पड़ेगा कि‍ हम परि‍स्‍थि‍ति‍यों को पलटे। चाहे नीति‍ में हो, चाहे रणनीति‍ में हो, हमें बदलाव लाने के लि‍ए काम करना पड़ेगा।

कभी-कभार एक ढांचे में जब बैठते हैं तब experiment करने से बहुत डरते हैं। कहीं फेल हो जाएंगे, कहीं गलत हो जाएगा। अगर हम experiment करना ही छोड़ देंगे, फि‍र तो व्‍यवस्‍था में बदलाव आ ही नहीं सकता है और experiment कोई circular नि‍काल करके नहीं होता है। एक भीतर से वो आवाज उठती है जो हमें कहीं ले जाती है और जि‍नको लगता है कि‍ भई कहीं कोई risk न हो, वो experiment तो ठीक है। बि‍ना risk के जो experiment होता है वो experiment नहीं होता है, वो तो plan होता है जी। Plan और experiment में बहुत बड़ा अंतर होता है। Plan का तो आपको पता है कि‍ ऐसा होना है, यहां जाना है, experiment का plan थोड़ी होता है और मैं हमेशा experiment को पुरस्‍कृत करता हूं। ज़रा हटके। ये करने का जो कुछ लोग करते हैं और उनको एक संतोष भी होता है कि‍ भई पहले ऐसा चलता था, मैंने ये कर दि‍या। उसकी एक ताकत होती है।

इतने बड़े देश को हम 20-25-30 साल या पि‍छली शताब्‍दी के सोच और नि‍यमों से नहीं चला सकते हैं। technology ने मनुष्‍य जीवन को कि‍तना बदल दि‍या है लेकि‍न technology से बदली हुई जीवन व्‍यवस्‍था, शासन व्‍यवस्‍था में अगर प्रति‍बिंबि‍‍त नहीं होती है तो दायरा कि‍तना बढ़ जाएगा। और हम सबने अनुभव कि‍या है कि‍ योजनाएं तो आती हैं, सरकार में योजनाएं कोई नई चीजें नहीं होती हैं, लेकि‍न सफलता तो सरकारी दायरे से बाहर नि‍कलकर के जन सामान्‍य से जोड़ने से ही मि‍लती हैं। यह हम सबका अनुभव है। जब भी जन भागीदारी बढ़ी है आपकी योजनाएं सफल होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि‍ हमारे लि‍ए अनि‍वार्य है कि‍ अगर मैं civil servant हूं तो civil society के साथ engagement, ये मेरे लि‍ए बहुत अनि‍वार्य है। मैं अपने दायरे में, अपने चैम्‍बर में, अपनी फाइलों के बीच देश और दुनि‍या को चलाना चाहता हूं, तो मुझे जन सहयोग कम मि‍लता है। जि‍नको जरूरत है वो तो इसका फायदा उठा लेंगे, आ जाएंगे लेकि‍न कुछ जागरूक लोगों की भलाई से देश बनता नहीं है। सामान्‍य मानवि‍की जो कि‍ जागरूक नहीं है तो भी उसके हि‍त की बात उस तक पहुंचती हैं और वो जब हि‍स्‍सेदार बन जाता है तो स्‍थि‍ति‍यां पलट जाती हैं।

और इसलि‍ए शौचायल बनाना कोई इसी सरकार ने थोड़ी कि‍या है। जि‍तनी सरकारें बनी होंगी सभी सरकारों ने सोचा होगा। लेकि‍न वो जन आंदोलन नहीं बना। हम लोगों का काम है और सरकारी दफ्तर में बैठे हुए व्‍यक्‍ति‍यों का भी काम है कि‍ हम इन चीजों में, हमारी कार्यशैली में जनसामान्‍य, civil society से engagement, हम यह कैसे बढ़ाएं, हम उन दायरों को कैसे पकड़े। आप देखि‍ए, उसमें से आपको एक बहुत सरलीकरण नई चीजें भी हाथ लगेगी। और नई चीजें चीजों को करने का कारण भी बन जाती हैं और वही कभी-कभी स्‍वीकृति‍ बन जाती है, नीति‍यों का हि‍स्‍सा बन जाती है और इसलि‍ए हमारे लि‍ए कोशि‍श रहनी चाहि‍ए।

अब यह जरूर याद रखे कि‍ हम.. हमारे साथ दो प्रकार के लोग हम जानते हैं भली-भांति‍। कुछ लोगों को पूछते हैं तो वो कहते हैं कि‍ मैं जॉब करता हूं। कुछ लोगों को पूछते हैं तो कहते हैं कि‍ service करता हूं। वो भी आठ घंटे यह भी आठ घंटे, वो भी तनख्‍वाह लेता है यह भी तनख्‍वाह लेता है। लेकि‍न वो जॉब कहता है यह service कहता है। यह फर्क जो है न, हमें कभी भूलना नहीं चाहि‍ए, हम जॉब नहीं कर रहे हैं, हम service कर रहे हैं। यह कभी नहीं भूलना चाहि‍ए और हम सि‍र्फ service शब्‍द से जुड़े हुए नहीं हैं, हम civil service से जुड़े हुए हैं और इसलि‍ए हम civil society के अभि‍न्‍न अंग है। मैं और civil society, मैं और civil society को कुछ देने वाला, मैं और civil society के लि‍ए कुछ करने वाला, जी नहीं! वक्‍त बदल चुका है। हम सब मैं और civil society, हम बनकर के चीजों को बदलेंगे। यह समय की मांग रहती है। और इसलि‍ए मैं एक service के भाव से और जीवन में संतोष एक बात का है कि‍ मैंने कुछ सेवा की है। देश की सेवा की है, department के द्वारा सेवा की है, उस project के द्वारा सेवा की है लेकि‍न सेवा ही। हमारे यहां तो कहा गया है - सेवा परमोधर्म:। जि‍सकी रग-रग में इस बात की घुट्टी पि‍लाई गई हो कि‍ जहां पर सेवा परमोधर्म है, आपको तो व्‍यवस्‍था के तहत सेवा का सौभाग्‍य मि‍ला है और वहीं मैं समझता हूं कि‍ एक अवसर प्रदान हुआ है।

मेरा अुनभव है। मुझे एक लंबे अरसे तक मुख्‍यमंत्री के नाते सेवा करने का मौका मि‍ला। पि‍छले दो साल से आप लोगों के बीच बहुत कुछ सीख रहा हूं। मैं अनुभव से कह सकता हूं, बड़े वि‍श्‍वास से कह सकता हूं। हमारे पास ये देव दुर्लभ टीम है, सामर्थ्‍यवान लोग है। एक-एक से बढ़कर के काम करने की ताकत रखने वाले लोग है। अगर उनके सामने कोई जि‍म्‍मेवारी आ जाती है तो मैंने देखा है कि‍ वो Saturday-Sunday भी भूल जाते हैं। बच्‍चे का जन्‍मदि‍न तक भूल जाते हैं। ऐसे मैंने अफसर देखे हैं और इसलि‍ए यह देश गर्व करता है कि‍ हमारे पास ऐसे-ऐसे लोग हैं जो पद का उपयोग देश को कहीं आगे ले जाने के लि‍ए कर रहे हैं।

अभी नीति‍ आयोग की तरफ से एक presentation हुआ। बहुत कम लोगों को मालूम होगा। इस स्‍तर के अधि‍कारि‍यों ने, जब उनको ये काम दि‍या गया और जैसा बताया गया, मैंने पहले दि‍न presentation दि‍या था और बाद में मैंने उनको समय दि‍या था और मैंने कहा था कि‍ मैं आपसे फि‍र.. इसके light में मुझे बताइए और कुछ नया भी बताइए। और मैं आज गर्व से कह सकता हूं। कोई circular था, उसके साथ कोई discipline के बंधन नहीं थे। अपनी स्‍वेच्‍छा से करने वाला काम था और शायद हि‍न्‍दुस्‍तान के लोगों को जानकर के अचंभा होगा कि‍ इन अफसरों ने 10 thousand man hour लगाए। यह छोटी घटना नहीं है और मेरी जानकारी है कि‍ कुछ group जो बने थे, 8, 10-10, 12-12 बजे तक काम करते थे। कुछ group बने थे जि‍न्‍होंने अपना Saturday-Sunday छोड़ दि‍या था और नि‍यम यह था कि‍ office में अगर शाम को छह बजे के बाद काम करना है। शाम को office hours के बाद ten thousand hours लगाकर के यह चिंतन कर-करके यह कार्य रचना तय की गई है। इससे बड़ी घटना क्‍या हो सकती है जी, इससे बड़ा गर्व क्‍या हो सकता है? मैंने उस दि‍न भी कहा था और आज भी नीति‍ आयोग की तरफ से कहा गया है कि‍ हमें एक बहुत बड़े वि‍द्वान, consultant जो जानकारि‍यां देते हैं। लेकि‍न जो 25-30 साल इसी धरती से काम करते-करते नि‍कले हुए लोग जब सोचते हैं तो कि‍तनी ताकतवर चीजें दे सकते हैं, उसका यह उत्‍तम उदाहरण है। अनुभव से नि‍कली हुई चीज है और उसको वहां छोड़ा नहीं। यह चिंतन की chain के रूप में उसको एक बार फि‍र से follow up के नाते reverse gear में ले जाया गया। वो बैठे गए, वो अलग बैठा गया और उस वक्‍त हमने अपने-अपने department ने अपना action plan बनाया। जि‍स action plan का बजट के अंदर भी reflection दि‍खाई दे रहा था। बजट की कई बातें ऐसी हैं जो इस चिंतन में से नि‍कली थी। Political thinking process से नहीं आई थी। यह बहुत छोटी बात नहीं है जी। इतना बड़ा involvement decision making में एक नया work culture है, नई कार्यशैली है।


मैं कभी अफसरों से नि‍राश नहीं हुआ। इतने बड़े लंबे तजुर्बे के बाद मैं वि‍श्‍वास से कहता हूं कि‍ मैं कभी अफसरों से नि‍राश नहीं हुआ। मेरे जीवन में कभी मुझे कि‍सी अफसर को डांटने की नौबत नहीं आई, ऊंची आवाज में बोलने की नौबत नहीं आई है। मैं zero experience के साथ शासन व्‍यवस्‍था में आया था। मुझे पंचायत का भी अनुभव नहीं था। पहले दि‍न से आज तक मुझे कभी कोई कटु अनुभव नहीं आया। मैंने यह सामर्थ्‍य देखा है। क्‍यों? मैंने अपनी सोच बनाई हुई है कि‍ हर व्‍यक्‍ति‍ के अंदर परमात्‍मा ने उत्‍तम से उत्‍तम ताकत दी है। हर व्‍यक्‍ति‍ में परमात्‍मा ने जहां है, वहां से ऊपर उठने का सामर्थ्‍य दि‍या है। हर व्‍यक्‍ति‍ के अंदर परमात्‍मा है। एक ऐसा इरादा दि‍या है कि‍ कुछ अच्‍छा करके जाना है। कि‍तना ही बुरा कोई व्‍यक्‍ति‍ क्‍यों न हो वो भी मन में कुछ अच्‍छा करके जाने के लि‍ए सोचता है। हमारा काम यही है कि‍ इस अच्‍छाई को पकड़ने का प्रयास करे और मुझे हमेशा अनुभव आया है कि‍ जब हरेक की शक्‍ति‍यों को मैं देखता हूं तो अपरमपार मुझे शक्‍ति‍यों का भंडार दि‍खाई देता है और तभी मैं आशावादी हूं कि‍ मेरे राष्‍ट्र का कल्‍याण सुनि‍श्‍चि‍त है, उसको कोई रोक नहीं सकता है। इस भाव को लेकर के मैं चल पाता।


जि‍सके पास इतनी बढ़ि‍या टीम हो, देश भर में फैले हुए, हर कोने में बैठे हुए लोग हो, उसे नि‍राश होने का कारण क्‍या हो सकता है। उसी आशा और वि‍श्‍वास के साथ, इसी टीम के भरोसे, जि‍न सपनों को लेकर के हम चले हैं। वक्‍त गया होगा, शायद गति‍ कम रही होगी। diversion भी आए होंगे, divisions भी आए होंगे। लेकि‍न उसके बावजूद भी हमारे पास जो अनुभव का सामर्थ्‍य है, उस अनुभव के सामर्थ्‍य से हम गति‍ भी बढ़ा सकते हैं, व्याप्ति भी बढ़ा सकते हैं, output-outlay की दुनि‍या से बाहर नि‍कलकर के हम outcome पर concentration भी कर सकते हैं। हम परि‍णाम को प्राप्‍त कर सकते हैं।


कभी-कभार हम senior बन जाते हैं। कभी-कभार क्‍या, बन ही जाते हैं, व्‍यवस्‍था ही ऐसी है। तो हमें लगता है और ये सहज प्रकृति‍ है। पि‍ता अपने बेटे को कि‍तना ही प्‍यार क्‍यों न करते हो, उनको मालूम है कि‍ उनका बेटा उनसे ज्‍यादा होनहार है, बहुत कुछ कर रहा है लेकि‍न पि‍ता की सोच तो यही रहती है कि‍ तेरे से मुझे ज्‍यादा मालूम है। हर पि‍ता यही सोचता है कि‍ तेरे से मैं ज्‍यादा जानता हूं और इसलि‍ए हम जो यहां बैठे हैं तो जूनि‍यर अफसर से हम ज्‍यादा जानते हैं, वि‍चार आना। वो हम जन्‍म से ही सीखते आए हैं। उसमें कोई आपका दोष नहीं है। मुझे भी यही होगा, आपको भी यही होगा। लेकि‍न जो सत्‍य है, अनुभव होने के बावजूद भी क्‍या बदलाव नहीं आ जाता। आज स्‍थि‍ति‍ ऐसी है कि‍ पीढ़ि‍यों का अंतर हमें अनुभव करना होगा। हम जब छोटे होंगे तब हमारी जानकारि‍यों का दायरा और समझ और आज के बच्‍चे में जमीन-आसमान का अंतर है। मतलब हमारे बाद जो पीढ़ी तैयार होकर के आज system में आई है। भले ही हमें इतना अनुभव नहीं होगा लेकि‍न हो सकता है वो ज्ञान में हमसे ज्‍यादा होगा। जानकारि‍यों में हमसे ज्‍यादा होगा। हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि‍ तेरे से मैं ज्‍यादा जानता हूं, हमारी सफलता इस बात में है कि‍ मेरा अनुभव और तेरा ज्ञान, मेरा अनुभव और तेरी ऊर्जा, आओ यार मि‍ला ले, देश का कुछ कल्‍याण हो जाएगा। यह रास्‍ता हम चुन सकते हैं। आप देखि‍ए ऊर्जा बदल जाएगी, दायरा बदल जाएगा। हमें एक नई ताकत मि‍लेगी।


मैं कभी-कभी कहता हूं कि‍ जब आप कंप्‍यूटर पर काम करना सीखते हैं और ऐसी दुनि‍या है कि‍ अंदर उतरते-उतरते चले ही जाते हैं। Communication world इतना बड़ा है। लेकि‍न अगर आपकी मॉं देखती है तो वो कहती है, अच्‍छा बेटा! तुझे इतना सारा आ गया, बहुत सीख लि‍या तूने। लेकि‍न अगर आपका भतीजा देखता है तो कहता है क्‍या अंकल आपको इतना भी नहीं आता। यह तो छोटे बच्‍चों को आता है, आपको नहीं आता है। इतना बड़ा फर्क है। एक ही घर में तीन पीढ़ी है तो ऊपर एक अनुभव आएगा और नीचे दूसरा अनुभव आएगा। क्‍या हम सीनि‍यर होने के नाते इस बदली हुई सच्‍चाई को स्‍वीकार कर सकते हैं क्‍या? हमारे पास वो नहीं है जो आज नई पीढ़ी के पास है, तो मानना पड़ेगा। उसके सोचने के तरीके बदल गए हैं। जानकारि‍यां पाने के उसके रास्‍ते अलग हैं। एक चीज को खोजने के लि‍ए आप घंटों तक ढूंढते रहते हैं यार क्‍या हुआ था। वो पल भर में यूं लेकर के आ जाता है कि‍ नहीं-नहीं साहब ऐसा था।



हमारे लि‍ए यह सबसे बड़ी आवश्‍यकता है कि‍ हम Civil Service Day पर यह संकल्‍प करे कि‍ नई पीढ़ी जो हमारी व्‍यवस्‍था में आई है, से एक दम जूनियर अफसर होंगे, उनके पास हमसे कुछ ज्‍यादा है। उसको अवसर देने के लिए मैं अपना मन बना सकता हूं। उसको मैं मेरे अंदर internalize करने के लिए कुछ व्‍यवस्‍था कर सकता हूं? आप देखिए आपके department की ताकत बहुत बदल जाएगी, बहुत बदल जाएगी। आपने जो निर्णय किए हैं उस निर्णयों को आप बड़ी, बहुत उत्‍सव के साथ, उमंग के साथ भरपूर कर पाएंगे।


और भी एक बात है, सारी समस्‍याओं की जड़ में है Contradiction and conflict, ये इरादतन नहीं आए हैं, कुल मिला करके हमारी कार्यशैली जो विकसित हुई है उसने हमें यहां ला करके छोड़ा है। Simple word में कोई कह देते हैं कि silo में काम करने का तरीका। कुछ लोगों के लिए silo में काम करना Performance के रूप में ठीक हो जाता है, कर लेता है। लेकिन इससे परिणाम नहीं मिलता है। अकेले जितना करे, उससे ज्‍यादा टीम से बहुत परिणाम मिलता है, बहुत परिणाम मिलता है। टीम की ताकत बहुत होती है। कंधे से कंधा मिला करके जैसे department की सफलताएं साथियों के साथ करना जरूरी है, वैसे राष्‍ट्र के निर्माण के लिए department to department कंधे से कंधे मिलना बहुत जरूरी है। अगर silo न होता तो अदालतों में हमारी सरकार के इतने cases न होते। एक department दूसरे department के साथ Supreme Court में लड़ रहा है, क्‍यों। इस department को लगता है मेरा सही है, दूसरे department को लगता है मेरा सही है, अब Supreme Court तय करेगी ये दोनों departments ठीक हैं कि नहीं हैं। ये इसलिए नहीं हुआ कि कोई किसी को परास्‍त करना चाहता था, वहां बैठा हुआ अफसर को किसी से झगड़ा था, क्‍योंकि ये केस चलता हो गया, चार अफसर उसके बाद तो बदल चुके होंगे। लेकिन क्‍योंकि silo में काम करने के कारण और को समझने का अवसर नहीं मिलता हैं। पिछले दिनों जो ये ग्रुप बना, इसका सबसे बड़ा फायदा ये हुआ है, उस department के अफसर उसमें नहीं थे, और जो अफसर मुझे मिले में उनसे पूछता था, मैं सिर्फ बातों को ऐसे official तरीके से काम करना मुझे आता भी नहीं है। भगवान बचाए, मुझे सीखना भी नहीं है। लेकिन मैं बातें भोजन के लिए सब अफसरों के साथ बैठता था, मैं उसमें बड़ा आग्रह रखता था कि मेरे टेबल पर कौन आए हैं। मैं सुझाव देता था और फिर मैं उनको पूछता था ये तो ठीक है आपने रिपोर्ट-विपोर्ट बनाया। लेकिन आप बैठते थे तो क्‍या लगता? अधिकतम लोगों ने ये कहा कि साहब हम एक batch mate रहे हैं लेकिन सालों से अलग-अलग काम करते पता ही नहीं था कि मेरे batch mate में इतना ताकत है इतना talent है। बोले तो ये बैठे तो पता चला। हमें पता भी नहीं था कि मेरे इस साथी में इस प्रकार की extra ordinary energy है। बोले साथ बैठे तो पता चला। हमें ये भी पता नहीं कि था कि उसको समोसा पंसद है कि पकौड़ा पंसद है। साथ बैठे तो पता चला कि उसको समोसा पसंद है तो हम अगली मीटिंग में कहते कि यार तुम उसके लिए समोसा ले आना। चीजें छोटी होती हैं, लेकिन टीम बनाने के लिए बहुत आवश्‍यक होती हैं।


ये दायरो को तोड़ करके, बंधनों को छोड़ करके, टीम के रूप में बैठते हैं तो ताकत बहुत बन जाती हैं। कभी-कभार department में एक से ज्‍यादा जोड़ दें तो दो हो जाते हैं लेकिन एक department एक के साथ एक मिल जाता है तो ग्‍यारह हो जाते हैं। टीम की अपनी ताकत है, आप अकेले खाने के लिए खाने बैठे हैं तो कोई आग्रह करेगा तो एकाध दो रोटी ज्‍यादा खाएंगे लेकिन छह दोस्‍त खाना खा रहे हैं तो पता तक नहीं चलता तीन-चार रोटी ऐसे ही पेट में चली जाती हैं, टीम का एक माहौल होता है। आवश्‍यकता है कि हमें टीम के रूप में silo से बाहर निकल करके समस्‍या हैं तो अपने साथी को सीधा फोन करके क्‍यों न पूछें। उसके चैम्‍बर में क्‍यों न चले जाएं। वो मेरे से जूनियर होगा तो भी चले जाओ अरे भाई क्‍या बात है फाइल तुम्‍हारे यहां सात दिन से आई है, तुम देखो जरा noting करते हो तो जरा ये चीजें ध्‍यान रखो ।


आप देखिए चीजें गति बन जाएगी। और इसलिए reform to transform, ये जो मैं मंत्र ले करके चल रहा हूं, लेकिन ये बात सही है कि reform से transform होता है, ऐसा नहीं है। Reform to perform to transform, perform वाली बात जब तक हमारे, और वो हमारे बस में है। और इसलिए हम लोगों के लिए, हम वो लोग हैं जिनके लिए Reform to perform to transform, ये perform करना हमारे लिए, मैं नहीं मानता हूं आज vision में कोई कमी है, दिशा में कोई कमी है। दो साल हुए इस सरकार की किसी नीति गलत होने का अभी तक कोई आरोप नहीं लगा है। किसी ने उस पर कोई ये चुनौती नहीं की है, ज्‍यादा से ज्‍यादा ये हुआ भई गति तेज नहीं है, कोई ये शिकायत करता है। कोई कहता है impact नहीं आ रहा है। कोई कहता है परिणाम नहीं दिखता है। कोई ये नहीं कहता है गलत कर रहे हो। मतलब ये हुआ कि जो आलोचना होती है उस आलोचना को गले लगा करके हमने perform को हम कैसे बढ़ोतरी बना सकें ताकि हमारा transform संकल्‍प है, वो पूरा हो सके।


Reform कोई कठिन काम नहीं है, कठिन अगर है तो perform है। और perform हो गया तो transform के लिए कोई नाप पट्टी ले करके बैठना नहीं पड़ता है, अपने-आप नजर आता है यहां transformation हो रहा है। और मैं देख रहा हूं कि बदलाव आ रहा है। आज समय-सीमा में सरकार काम करने की आदत बनी है। हर चीज मोबाइल फोन पर, app पर monitor होने लगी है। ये अपने-आप में अच्‍छी चीजें आपने स्‍वीकार की हैं, ये थोपी नहीं गई हैं। Department ने खुद ने तय किया है, इतने दिन में ये करेंगे, इतने दिन में करेंगे। हम इतनी solar energy करेंगे, हम इतना पानी पहुंचाएंगे, हम इतनी बिजली पहुंचाएंगे, हम इतने जन-धन एकाउंट खोलेंगे, आपने तय किया है, आप पर थोपा नहीं गया है।


और जो आपने तय किया है वो भी इतना ताकतवार है, इतना प्रेरक है कि मैं मानता हूं देश को कोई कमी नहीं रह सकती है, हम perform करके दिखा दें बस। और मुझे विश्‍वास है कि ऐसी टीम मिलना बहुत मुश्किल होता है। मैं बहुत भाग्‍यशाली हूं कि मुझे ऐसी अनुभवी ऐसी टीम मिली है। देश भर में फैले हुए ऊर्जावान नौजवान व्‍यवस्‍था में आ रहे हैं। वे भी पूरी ताकत से कर रहे हैं। हर किसी को लगता है गांव के जीवन को बदलना है।


पिछली बार मैंने आप सबों से कहा था कि बहुत साल हो गए होंगे तो एक बारी जहां पहले duty किया था वहां हो आइए न क्‍या हुआ। और सभी अफसर गए हैं और उनका जो अनुभव हैं बड़े प्रेरक हैं। कुछ नहीं कहना पड़ा, वो देख करके आया कि मैं आज से 30 साल पर जहां पहली job की थी, पहली बार मेरी duty लगी थी, आज 30 साल के बाद वहां गया, मैं तो बहुत बदल चुका, कहां से कहां पहुंच गया, लेकिन जिन्‍हें छोड़ करके आया था वहीं का वहीं रह गया। ये सोच अपने-आप में मुझे कुछ कर गुजरने की ताकत दे देती है। किसी के भाषण की जरूरत नहीं पड़ती है, किसी किताब से कोई सुवाक्‍यों की जरूरत नहीं पड़ती है, अपने-आप प्रेरणा मिलती है। ये ही तो जगह है, 30 साल पहले मैं इसी गांव में रहा था? इसी दफ्तर में रहा था? ये ही लोगों का हाल था? मैं वहां पहुंच गया, वो यहीं रह गए, मेरी तो यात्रा चल पड़ी उनकी नहीं चल पड़ी। ये सोच अगर मन में रहती है, उन लोगों को याद कीजिए जहां से आपने अपने carrier की शुरूआत की थी। उस इलाके को याद करिए, उन लोगों को याद कीजिए, आप देखिए आपको लगेगा कि अब तो निवृत्ति का समय भले ही दो, चार, पांच साल में आने वाला हो लेकिन कुछ करके जाना है। ये कुछ करके जाना है, वो ही तो सबसे बड़ी ताकत आती है और वो ही तो देश को एक नई शक्ति देती है। और मुझे विश्‍वास है इस टीम के द्वारा और वैश्विक परिवेश में काम करना है। अब हम न department silo में रह सकता है न देश silo में रह सकता है। Inter-dependent world बन चुका है। और इसलिए हम लोगों को उसमें अपने-आपको भी जोड़ना पड़ेगा। हर बदलती हुई परिस्थिति को चुनौती के रूप में स्‍वीकार करते हुए, अवसर में पलटते हुए काम करने का संकल्‍प करें।


मनरेगा में इतना पैसा जाता है। मैं जानता हूं सूखे की स्थिति है, पानी की कमी है, लेकिन ये भी तो है कि अगला वर्ष अच्‍छी वर्षा का वर्ष आ रहा है, ऐसा अनुमान किया गया है तो मेरे पास अप्रैल, मई, जून जितना भी समय बचा है, क्‍या मैं मनरेगा के पैसों से जल संचय का एक सफल अभियान चला सकता हूं? अगर आज पानी संचय की मेरी इतनी व्‍यवस्‍था है तो desilting करके, नए तालाब खोद करके, नए canal साफ कर-करके, मैं पूरी व्‍यवस्‍था से इस शक्ति का उपयोग जल संचय में करूं, हो सकता है बारिश कम भी आ जाए तो भी गुजारा करने के लिए काम आ आती है। मैं मानता हूं कि बहुत बड़ी ताकत है और जन भागीदारी से सब संभव है, सब संभव है। इन चीजों को हम करने का संकल्‍प ले करके चलें।


जिन जिलों ने ये जो सफलता पाई उन जिलों की टीमों को मैं हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं और मैं देश भर के जिलों के अधिकारियों से आग्रह करुंगा कि अब जिले की हर टीम ने कहीं न कहीं participation करना चाहिए। कुछ ही लोग participation करें ऐसा नहीं, आप भी इस competition में आइए, आप भी अपने जिले में सपनों के अनुकूल कोई चीज कर करके जाने का संकल्‍प करें। इसी एक अपेक्षा के साथ आप सबको Civil Service Day पर हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं। आपने जो किया है देश उसके लिए गर्व करता है, आप बहुत कुछ कर पाएंगे, देश सीना तान करके आगे बढ़ेगा, इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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Saturday, May 2, 2026

एट्रोसिटी केस दाखल केल्याचे फायदे

 महाराष्ट्र राज्यात एट्रोसिटी दाखल केल्यावर मिळणारे फायदे 

  • सरकारी नोकरी
  • 3 महिन्याचे राशन
  • पेन्शन 
  • मुलांचे शिक्षणाचे खर्च
  • सरकारी नोकरी
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांनी महाड, रायगड येथे ‘अनुसूचित जाती व अनुसूचित जमाती (अत्याचार प्रतिबंध) अधिनियम 1989 (सुधारित अधिनियम 2015)' अंतर्गत बाधित कुटुंबांतील वारसांना शासकीय नोकरीत थेट नियुक्तीपत्रांचे वितरण केले.

शासकीय नोकरीतील लाभार्थी :-
  • अनुष्का शिंदे
  • सारिका बनसोडे
  • पूनम जाधव
  • पूजा म्हस्के
  • धीरज पवार
  • योगिता जाधव
  • समीर गांगुर्डे 
  • सीमा बेतालजी
  • मनोज साळवे

पालकमंत्री डॉ. पंकज भोयर यांच्याहस्ते नियुक्ती आदेश

वर्धा जिल्ह्यातील अनुसूचित जाती जमाती अत्याचार प्रतिबंधक कायद्यान्वये ॲट्रॉसिटी ॲक्ट अंतर्गत खुन प्रकरणाच्या पिडीत कुटुंबातील सदस्यांना शासकीय नोकरी देण्याचे धोरण महाराष्ट्र शासनाच्या सामाजिक न्याय व विशेष सहाय्य विभागाचे आहे. महाराष्ट्र शासनाने 20 नोव्हेंबर 2025 रोजी शासन निर्णय काढला.
त्यानंतर महाड जिल्हा रायगड येथे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाठ, केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्यमंत्री रामदास आठवले, सामाजिक न्याय व विशेष सहाय्य विभागाचे प्रधान सचिव हर्षदीप कांबळे, समाज कल्याणच्या आयुक्त दीपा मुधोळ मुंडे यांच्या हस्ते व उपस्थितीमध्ये 100 कुटुंबीयांना शासकीय नोकरीचे आदेश वितरित करण्यात आले होते व उर्वरित खून प्रकरणात उध्वस्त पिडीताना त्यांच्या जिल्ह्यामध्ये नोकरीच्या आदेश देण्यात येईल असे आश्वासित करण्यात आले होते. त्या अनुषंगाने वर्धा जिल्ह्यामध्ये पालकमंत्री यांच्या उपस्थितीमध्ये ३० कुटुंबीयांना शासकीय नोकरीच्या आदेश देण्यात आले. त्यानुसार रिक्त जागांची उपलब्धता आणि लाभार्थी उमेदवारांच्या पात्रतेनुसार जिल्ह्यातील अनुसूचित जाती कुटुंबातील 8 उमेदवारांना पालकमंत्री डॉ.पंकज भोयर यांच्याहस्ते शासकीय नोकरीचे नियुक्ती आदेश देण्यात आले. जिल्ह्यात पात्र 30 उमेदवारांपैकी काही नियुक्त्या इतर जिल्ह्यात देण्यात आल्या आहे.

जिल्हाधिकारी कार्यालयाच्या सभागृहात नियुक्ती आदेश वितरणाचा कार्यक्रम आयोजित करण्यात आला होता. यावेळी जिल्हाधिकारी वान्मथी सी, अतिरिक्त जिल्हाधिकारी संजय तेली, समाजकल्याणचे सहाय्यक आयुक्त अंकेश केदार, आदिवासी विकास विभागाच्या प्रकल्प अधिकारी गितांजली निकम, जिल्हा माहिती अधिकारी मंगेश वरकड, सालोडचे उपसरपंच आशिष कुचेवार आदी उपस्थित होते.

आधार हरवलेल्या कुटुंबाला धीर देण्याचा प्रयत्न - डॉ.पंकज भोयर
  • अनुसूचित जाती जमाती अत्याचार प्रतिबंधक कायद्यान्वये पिडीत व्यक्तीस 1 ते 8 लाख रुपयांपर्यंत प्रकरणपरत्वे मदत दिली जाते.
  • अनुसूचित जाती जमाती या घटकातील ज्या कुटुंबात खुनासारखा गंभीर प्रकार घडलेला असतो, अशा कुटुंबातील पात्र व्यक्तीस शासकीय नोकरी देण्यात येते. 
घरातील कर्ता पुरुष गेल्यानंतर कुटुंब वाऱ्यावर न सोडता त्या कुटुंबाला दिलासा देण्यासाठी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांनी हा महत्वपुर्ण निर्णय घेतला असल्याचे पालकमंत्री डॉ.पंकज भोयर यावेळी म्हणाले. जिल्ह्यात 30 कुटुंबातील उमेदवार नोकरी मिळविण्यास पात्र आहे. यापैकी 8 उमेदवारांना वर्धा जिल्ह्यात तर चंद्रपुर 2, गडचिरोली 7, भंडारा 1, नागपूर 1 याप्रमाणे नियुक्ती देण्यात आल्या आहे. 11 कुटुंब अनुसूचित जमातीतील असल्याने या उमेदवारांना आदिवासी विकास विभागाच्यावतीने नियुक्त्या देण्यात येणार असल्याचे पालकमंत्र्यांनी सांगितले.

नियुक्त्या देण्यात आलेल्या 8 उमेदवारांमध्ये 
  • पुजा आनंदराव रनधिर
  • राहुल ज्ञानेश्वर वाहने
  • निलेश वसंतराव हातमोडे
  • स्वप्नील सुरेश ओंकार
  • प्रगती गजानन देवतळे
  • विकास दौलतराव शंभरकर,
  • शुभम रमेश घोरपडे,
  • मन्टी अशोकराव तायवाडे या उमेदवारांचा समावेश आहे. समाजकल्याणच्या निवासी शाळा, वसतीगृहांमध्ये वेगवेगळ्या पदांवर हे उमेदवार कार्यरत राहणार आहे. कार्यक्रमाचे प्रास्ताविक सहाय्यक आयुक्त अंकेश केदार यांनी केले. संचलन समाजकल्याण निरिक्षक शरद निबुदे यांनी केले.

राजकीय पार्टियों के निशान की राजनीति


 आखिर क्यों ?


कांग्रेस के निशान पंजे में स्वस्तिक भी था । 


अली का पंजा आलीशान, इंदिरा जी का यही निशान यह नारा शायद भारत की होशियार जनता भूल चुकी है ! 


बैल जोड़ी, गाय बछड़ा यह भी कांग्रेस का चुनाव चिन्ह रह चुका है । फिर अल्पसंख्यकों को बुरा न लगे इसलिए बैल गाय बछड़े खूब कटते रहे। 


भारतीय चुनाव आयोग के जनप्रतिनिधि अधिनियम के नियमों के अनुसार शरीर का अंग कभी चुनाव चिन्ह नहीं हो सकता है।


भाजपा का चुनाव चिन्ह दीपक, हलधर किसान, फिर कमल ! 


पार्टियों को चुनाव चिन्ह निर्वाचन आयोग देता है। किसी सलाहकार ने हिंदुओं को बेवकूफ बनाने के लिए इंदिरा गांधी को यह थ्योरी बताई कि कह दीजिए देवरहा बाबा / कांची कामकोटि के शंकराचार्य से यह पंजा निशान आशीर्वाद में मिला है।


फॉरवर्ड ब्लॉक के रूईकर गुट का चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा रह चुका है। बाबासाहेब आंबेडकर जी की पार्टी शैडयूल्ड कास्ट फेडरेशन का चुनाव चिन्ह हाथी रह चुका है, निर्वाचन आयोग ने बाद में हाथी बसपा को दे दिया। 


विश्वजीत सिंह

चुनाव विश्लेषक, अभ्यासक

Tuesday, April 14, 2026

बंदर के लिए शोकसभा : विश्वजीत सिंह

यह कल ही की घटना है, मुझे निंद नहीं आई, दुख जताए भी तो किसे, इतनी आत्मीयता जब प्राणियों में ही नहीं रही तो इंसानों में तो बहुत दूर है।

दोपहर में खिड़की से देखा एक बड़ा बंदर, वह तो बंदरिया थी, वानर जैसे उसके साथ कुछ बच्चे बंदर भी थे। वे हमारे कृष्णा हेरिटेज अपार्टमेंट में आए थे। इस तपती गर्मी की दुपहरी में जंगलों से प्राणियों का शहर की ओर आना यह अब आम बात हो गई है। हुप हुप की आवाज से इमली के बड़े पेड़ पर बंदर खेलकूद कर रहे थे। पेड़ के नीचे कुत्ते जमा होकर बंदरों पर भौंक रहे थे।

मैने देखा घर के बच्चे फ्लैट की बालकनी से यह दृश्य मजे लेकर देख रहे है । फिर कुछ ही देर में जोर की आवाज आई देखा ब्लास्ट हुआ है। बड़ी चिंगारी निकली है। मैं दौड़ा दौड़ा भागा भागा फ्लैट की बालकनी में आया, जोर से एक आवाज दी, 

कल्पेश !

कल्पेश !

कल्पेश यह गरीब बहुजन समाज से ताल्लुख रखता हुआ लड़का है जो ठेकेदारी में रेलवे में सैंडबॉय का काम करता है। मालगाड़ी के इंजिन में रेत डालने का काम करता है। 

वह दौड़ा दौड़ा रेल्वे ट्रैक पर आया। एक मालगाड़ी खड़ी थी। उसमें उसने रेत भर दिया था। उसने मेरे आवाज के जवाब में आवाज लगाई। भईया आया। 

भईया बोलिए।

मैने उससे बालकनी से ही पूछा यह ब्लास्ट जैसी आवाज ? उसने कहा एक बंदर करंट लगकर मर गया है।

मैं दौड़ा दौड़ा फ्लैट से नीचे की ओर भागा। सैंड पॉइंट पर पहुंचकर कल्पेश को बोला कहां हुआ है यह ब्लास्ट। उसे साथ चलकर वह जगह दिखाने के लिए कहा। 

वह रेलवे ट्रैक पर चलने लगा। बोला भैया छोड़ो ये बंदरों में कहां पड़ रहे हो। मैने कहां भाई ये गर्मी का समय है, शायद दाना पानी के लिए ये प्राणी यहां आए हो। उनके पीछे कुत्ते पड़ गए और यह बंदर कुत्तों से बचने के लिए इलेक्ट्रिक के हाय टेंशन पोल पर चढ़ गया। और इसी दौरान एक ही सेकंड में शायद उसे भी पता न हो इलेक्ट्रिक सर्किट के करंट लगने से उसका पूरा शरीर, उसमें का खून जलकर काला पड़ गया। और वहां से वह नीचे गिरा। अमूमन बंदर तारो पर चिपक जाया करते है। यह तो नीचे गिरा।



मैं वहां उस जगह पहुंचा तो देखा कि इतने कम समय में कुछ कुत्ते उस बंदर के शरीर को नोच रहे है। किसीने पैर के पास तो किसी ने पूछ को नोचना शुरू कर दिया है। मैने पत्थर उठाया और कुत्तों को भगाया। फिर वही उसके पास बैठ गया । इस विचार में की इसकी मौत कैसे हुई होगी। घटनाक्रम घूम रहा था। मैं वही बैठा रहा। मेरे घर से छोटे भाई की बच्ची भी वहां मुझे बड़े पापा कहती हुई आ गई। और देखकर रोने लगी। बच्चों को दुख ज्यादा होता है। कल्पेश कहने लगा भैया बच्चों को रात में नींद नहीं आएगी। बच्चे डर जाएंगे। 

मैने कहां सच्चाई उन्हें भी जानने दीजिए, शायद बड़े होकर वे इतने समझदार बन जाएं कि उन्हें यह घटना आम न लगे।

मैं करीब डेढ़ घंटे वही जगह पर फोन लगाता रहा की नगर पंचायत की गाड़ी आ जाएं जिससे उस बंदर की लाश का यथोचित सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो जाएं। अनेक लोगों को फोन लगाया। उन्हें घटना के फोटो व्हाट्सएप पर भेजे। पर कोई सहायता नहीं मिली। इसमें बहुत समय गुजर गया। संध्या होने लगी। अब इस स्थिति में समझ में आया कि प्राणियों की मौत इंसानों के लिए कोई महत्व नहीं रखती। 

दुख तो इस बात का था कि वह बंदर किसी के परिवार का हिस्सा था। कुछ दिनों पहले हमने रामनवमी, फिर हनुमान जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई। सुंदरकांड भी पढ़ा, और १३ अप्रैल को यह घटना हो गई।

मुझे लगा कि बाकी के बंदर कहां चले गए। एक बंदर मर गया उसके आसपास बंदर आने चाहिए। बंदरों ने गोला करना चाहिए। आसपास एक भी बंदर नहीं मिला। शायद डर से उस बंदर को छोड़कर भाग गए। प्रायः अपनो के बिछड़ने का दुख प्राणियों में ज्यादा देखा जाता है। पक्षी हो या प्राणी दुख तो होता ही है। कौओं को देखा है दुखी होकर सभा करते हुए। 

जब बंदर का परिवार उस बंदर को अपने बीच नहीं पाएगा तो क्या वे उसे ढूंढेंगे? बंदर की माताजी का दुख यह मै सोच कर ही दुखी हो जाता हूं। पता नहीं वह बंदर कितनों को अनाथ कर गया।

क्या इंसानों की तरह प्राणियों में भी आत्मीयता की कमी हो गईं है?

भाई की छोटी बच्ची ने कहा बड़े पापा अब तो हम बर्थडे भी नहीं मना सकते । उसके पिताजी का जन्मदिन था।

रेलवे की तारों से लगकर यह बंदर मरा है। ऐसे न जाने कितने प्राणी, पक्षी अपने परिवार को खो देते है। अब इसके समुचित अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कौन करेगा ? यह रेलवे का मामला है कोई इसमें पड़ना नहीं चाहता। न स्थानिक पुलिस और न नगर पंचायत और न ही वन विभाग के अधिकारी। 

इसी जद्दोजहद में बहुत देर हो गई। आखिर नमक, भगवा कपड़ा और पूजा सामग्री लेकर गड्ढा खोदा गया। उसी में एक बोतल पानी से बंदर के मुंह पर पानी डाला गया। भगवे कपड़े में लपेटकर उस बंदर को गड्ढे में रखा गया। उसपर मिट्टी डाली गई। 


मुझे रातभर नींद नहीं आई। बार बार उसी बंदर का ख्याल। दुख तो उसके परिवार को भी हुआ होगा। 

अब रातभर विचार करके यह निश्चय किया है कि इस दुख के लिए शोकसभा रखी जाएं उसमें वन विभाग, नगर प्रशासन, नागरिक प्रतिनिधि और रेलवे के अधिकारियों को भी बुलाया जाएं। 

क्या पता इस शोकसभा से खोई हुई आत्मीयता लौट आएं।


Tuesday, April 7, 2026

नागपूरचं भाऊ : सुनील किटकरू

 



नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी 

फिकी पडे वाळवंटी सफारी l 


 माणूस वऱ्हाडी काय त्याचा रुबाब 

रणरणत्या झळात बी चहाची वाफ 

 पुरणपोळी तूप त्याची न्याहारी 

 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


देतो ताणून थंड कुलरच्या हवेत 

 आग ओकणाऱ्याला नाही भाव देत 

 वाघासारखी फिरण्याची हौस न्यारी

 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


सपन सरता ताटात दिसे खिचडी 

 भाजी वांग्याची अन मिरची बेगडी 

दूध ताकांनी पळवतो उन्हाळी 

नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


फिकी पडे वाळवंटी सफारी

नागपूरच भाऊ ऊन लई भारी l

जसा कोकणाला हापूस तारी 

नागपूरची भाऊ संत्री लई भारी l

             - सुनील किटकरु


Wednesday, April 1, 2026

बालक केशव हेडगेवार का वंदेमातरम असहयोग आंदोलन

वंदे मातरम् आंदोलन

सन 1907 के मध्य में विद्यालय निरीक्षक प्रतिवर्ष की भांति स्कूल का निरीक्षण करने नील सिटी स्कूल आए थे। जैसे ही निरीक्षक केशव हेडगेवार की कक्षा में गए, सभी छात्रों ने उठकर एक साथ 'वंदे मातरम्' की जोरदार घोषणा से उनका स्वागत किया और प्रत्येक कक्षा में इसकी पुनरावृत्ति होती रही। केशव के सहपाठी गोविंद गणेश आवदे ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा- 'गुस्से से लाल-पीले होकर विद्यालय निरीक्षक प्रधानाध्यापक जनार्दन विनायक ओक के कमरे में आ गए और बिना बात किए सीधे चले गए। इसके तुरंत बाद उन्होंने विद्यालय प्रबंध समिति के चेयरमैन सर विपिन कृष्ण बोस को पत्र लिखकर दोषी छात्रों को 'अनुशासनहीनता' के लिए अविलंब सजा देने की मांग की।' स्कूल के अधिकारियों को इसका तनिक भी भान नहीं था कि छात्रों के बीच जबर्दस्त राजनीतिक ध्रुवीकरण हो चुका है। केशव ने आरंभ से अंत तक की योजना अत्यंत ही गोपनीय तरीके से बना रखी थी। विद्यालय प्रबंध समिति के निर्णय के विरुद्ध स्कूल के सभी दो हजार छात्र अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। हड़ताल दो महीने तक चलती रही। इस हड़ताल में नागपुर का मारिस कालेज भी शामिल हो गया। केशव के नेतृत्व में जुलूस, प्रभात फेरी इत्यादि आम बात बन गई। अंततः अच्युतराव कोल्हटकर की मध्यस्थता से स्कूल खुला। छात्रों ने समझाने-बुझाने तथा अपने माता-पिता एवं शिक्षकों के दबाव में माफी माग ली। परंतु अकेले केशव ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने भरी सभा में कहा: "अगर मातृभूमि की आराधना अपराध है तो मैं यह अपराध एक नहीं, अनगिनत बार करूंगा और इसके लिए मिलने वाली सजा को भी सहर्ष स्वीकार करूंगा।' फलतः सितंबर माह में केशव को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। केशव ने इसे देशभक्ति का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। नागपुर में वह लोकप्रिय युवा नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।



असहयोग आंदोलन 

इस आंदोलन में डॉ. हेडगेवार का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने गांव-गांव जाकर भाषण दिया और लोगों को जागृत किया। इस पर अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह (sedition) का अनुसार, आमतौर पर नेता लोग कोई बचाव नहीं मुकदमा चलाया। तब आंदोलन के नियम करते थे, सजा भुगतना ही अपना बयान होता था। लेकिन डॉक्टर हेडगेवार ने तय किया कि मैं कोर्ट में डिफेन्स दूंगा, क्योंकि वह भी मेरा एक भाषण ही होगा।" उस समय अदालत में जनता और पत्रकार मौजूद रहते थे, तो उन्हें अपना संदेश फैलाने का उन्होंने न्यायाधीश से सीधे पूछा था, "न्यायाधीश एक और अवसर मिलना था। अपने मुकदमे में महोदय, यह बताइए कि किस क़ानून के तहत अंग्रेज लोग यहां आकर भारत पर राज्य कर रहे हैं? स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है - यह सारी दुनिया मानती है। तो क्या कोई कानून है जिसके आधार पर अंग्रेज हम पर राज कर रहे हैं? नहीं है! इसलिए अंग्रेजों का राज्य ही गैर-क़ानूनी है। आपका कोर्ट भी गैर-कानूनी है। आप तो गैरकानूनी जज हैं-मैं आपके अधिकार को मानता ही नहीं!" उन्होंने कहा- "मैंने केवल देशवासियों को यही बताया कि स्वतंत्र होना हमारा अधिकार है। और स्वतंत्र कैसे होना है, यह भी समझाया। मैंने कोई अपराध नहीं किया। और अगर आपने इसे अपराध माना भी, तो आपमें मुझे सजा देने का अधिकार नहीं है क्योंकि मैं आपकी अदालत को मान्यता नहीं देता।" इस पर उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा हुई। सजा सुनाते हुए मैजिस्ट्रेट ने टिप्पणी लिखी - अंग्रेजी में जिसे Obiter Dicta कहते है कि "जिन भड़काऊ भाषणों के कारण इन पर अभियोग लगाया गया है, उनसे अधिक विद्रोहपूर्ण तो इनका बचाव में दिया गया जवाब है।"

Tuesday, March 19, 2024

नागपुर ने अनेक दुर्घटनाएँ देखी है, क्या इसमें मृत नागरिकों का दोष है ?

संध्या के समय ठाकुर साहब ने हेलमेट पहनकर सभी कागज पत्र ओके वाली दोपहिया गाड़ी नागपुर की सड़क पर चलाईकिसी अज्ञात ने ठाकुर साहब के वाहन को टक्कर मार दीठाकुर साहब जगह पर ही मर गए ! इसमें क्या ठाकुर साहब की गलती है ?



नागपुर शहर में पिछले २ महीने से हो रही 212 से भी ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं में 73 लोगो ने जीवन गंवाया है। इसमें कुछ ही मामलों में दोषियों पर पुलिस द्वारा कार्यवाही की गईबाकी अन्य में अज्ञात व्यक्ति के नाम पर दुर्घटनाओं के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। दुर्घटना में लिप्त व्यक्तियों की जांच कर अब तक अपराधियों पर कार्यवाही न करना पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही शंका उत्पन्न करता है। नागपुर शहर के सर्वाधिक सुरक्षित शासकीय कार्यालयों से युक्त क्षेत्र जिला न्यायालयजिलाधिकारी कार्यालयआकाशवाणी के मार्ग पर दिनांक 18 फरवरी 2024 को संध्या के समय समाजसेवी श्री शिवबहादुर सिंह ठाकुर की दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनका भरा पूरा शोकाकुल  परिवार अब भी सदमे में है। महीना बीत जाने के उपरांत भी उनके वाहन को टक्कर मारनेवाली कार एवम दोपहिया वाहन बाइक की अब तक पहचान न होनापुलिस की जांच प्रणालीलेटलतीफी पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करता है। सात वर्ष पहले वर्ष 2016 में नागपुर शहर को केंद्र सरकार द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यकाल में कुल 3,303 करोड़ रुपए की लागत से स्मार्ट सिटी शहरी विकास योजना के अंतर्गत शहर में 3700 सीसीटीवी कैमरे 524 करोड़ रुपए खर्च कर लगाए गए थेजिनकी देखरेख L&T कंपनी करती हैपरंतु दुर्घटना का एक भी CCTV फुटेज प्राप्त न होना यह भी नागरिक सुरक्षा को लेकर व्यवस्था पर प्रश्न उपस्थित करता है। नागपुर शहर को 2020 में सेफ एवं स्मार्ट सिटी पुरस्कार मिला थापरंतु नागरिकों के लिए नागपुर शहर सुरक्षित नही है यह दुर्घटनाओं की संख्या को देखकर स्पष्ट होता है। दुर्घटना के कारणों की जांच करना एवं दोषियों पर कार्यवाही कर न्याय दिलाना पुलिस प्रशासन का कर्तव्य होता हैपरंतु सामान्य नागरिकों के संबंध में पुलिस प्रशासन गंभीर नहीं है। वही गडकरी जी के बेटे या फडणवीस जी की बेटी की बात होतीया उनके माता-पिता की दुर्घटना की बात होती तो शायद दिन में ही जांच होकरअपराधियों की धरपकड़ कर कार्यवाही हो जाती।  प्रशासन नागरिकों के लिए गंभीर नहीं है। समाजसेवी श्री शिवबहादुर सिंह ठाकुर जी की दुर्घटना में मृत्यु होने के कारणों का एक माह पश्चात भी पता नही चलनापुलिस की जांच पर ही सवालिया निशान लगाता है। शहर में विभिन्न जगहों पर नागपुर महानगर पालिका द्वारा ठेकेदारों के माध्यम से सीमेंट रोड के निर्माण कार्य शुरू हैउनमें से एक कार्य जिलाधिकारी कार्यालय के सामने से आकाशवाणी चौक होते हुए महाराजबाग तक शुरू हैइसके ठेकेदार ACEPL लिमिटेड कंपनी के श्री अभिषेक विजयवर्गीय हैइनकी जिम्मेदारी थी की रोड निर्माण के कार्यों में सुरक्षा नियमों का पालन कर बैरिकेड लगाकर समुचित व्यवस्था करें परंतु ठेकेदार की दोषपूर्ण निर्माण प्रणाली एवं कार्य के कारण दुर्घटना में जीवन गंवाने वाले शिवबहादुर सिंह ठाकुर जी के परिवार ने ठेकेदार कंपनी ACEPL लिमिटेड के संचालक अभिषेक विजयवर्गीय पर सदोष मनुष्यवध की कलम अंतर्गत कार्यवाही करने का निवेदन किया है। नागरिकों की सुरक्षा की दृष्टि से नागपुर शहर में पिछले महिनों में सड़क दुर्घटनाओं पर जान गंवाने वालों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए सभी केसेस की जांच के लिए SIT विशेष जांच दल गठित करने का सरकार से पत्रकार परिषद में निवेदन किया है। बड़े बड़े विकसित शहरों में जीवन को सबसे ज्यादा महत्व प्राप्त हैजब नागरिकों का जीवन ही सुरक्षित नही होगा तो जीवन के स्तर को सुधारने के लिए निर्मित सुख सुविधासंसाधन जैसे बड़े बड़े रास्तेब्रिजमेट्रो का औचित्य ही क्या रह जायेगाकरोड़ों रुपए खर्च कर बहुत बड़ी प्लानिंग नियोजन से सीमेंट रास्ते बनाएं जाते हैवे बनाते समय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च रखते हुए पूर्ण किए जाएजिससे नागरिकों को तकलीफ न हो। और हां दुर्घटना के उपरांत पुलिस वाले दोषी को बचाने के लिए अज्ञात न लिखे। दुर्घटना में मृतक के परिवार को यह भी स्पष्ट बता दीजिए की सड़क दुर्घटनाओं के लिए जांच पुलिस नही कर सकती हैपुलिस आयुक्त के पास भी अनेकों कार्य होते है जैसे पुलिस क्रीड़ा में शामिल होनाबड़े बड़े कार्यक्रमों में भाषण देनाकिताब लिखनाशहर में किसी प्रमुख व्यक्ति के आने पर स्वागत के लिए Line Up में हाथ जोड़कर खड़े रहना और कहना स्मार्ट शहर नागपुर में स्वागत हैबंदोबस्त में कोई कमी हो तो आदेश करें। 

 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित रस्ता सुरक्षा समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अभय सप्रे (सेवानिवृत्त) जी को भी निवेदन करते है की जनता को जनजागृति का बहाना बनाकर दोषियों को बचाने का प्रयास न करेंदुर्घटना हुई है तो कारण है, जिम्मेदार है । प्रशासन को अनुशासन की आवश्यकता हैजब भी प्रशासन ढीला रवैया अपनाता हैदुर्घटना होती है। दुर्घटना का आरोप किसी अज्ञात पर मढ़ना गैरजिम्मेदाराना हैइससे भ्रष्टाचार बढ़ता हैमासूम नागरिकों का जीवन बर्बाद हो जाता है।

 

नागपुर ने अनेक दुर्घटनाएँ देखी हैपुल गिर गयाक्या इसमें मृत नागरिकों का दोष है 

स्टार बस से दुर्घटना हुईक्या इसमें मृत नागरिकों का दोष है 

बिल्डर की बनाई हुई बिल्डिंग गिर गई क्या इसमें दबकर मरनेवाले नागरिकों का दोष है

पुलिस प्रशासन को स्पष्ट अनुशासन में रहकर नियमानुसार जांच करने का आदेशित करेंसमय के अधीन पुलिस प्रशासन जांच करेगा तो कोई चंद्रमामंगल ग्रह पर भी होगा नियमानुसार पकड़ा ही जाएगा।

 

गडकरी जी, फडणवीस जी जैसे कर्तृत्ववान व्यक्तिमत्व से प्रसिद्ध नागपुर नगरी के प्रशासनिक अधिकारियों एवं सरकारी कर्मचारियों को अनुशासन की आवश्यकता हैयह हमने स्व. शिवबहादुर सिंह ठाकुर जी की दुर्घटना में हुई दर्दनाक मृत्यु के उपरांत विभिन्न प्रशासनिक कार्यालयों में पदस्थ बैठे सरकारी अधिकारियों द्वारा नागरिकों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार को अनुभव कर समझा है।

 

प्रधान सेवक लिख लेने से गौरवान्वित महसूस करने वाले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में चल रही अमृतकाल की सरकार में प्रशासन पर पकड़ नहीं होना बहुत चिंताजनक है। जब सामान्य नागरिक किसी अधिकारी (सरकारी नौकर) के सामने खड़े रहता हैउस कार्य के लिए जिसकी  सरकारी नौकर को तनख्वाह मिलती हैवहां सभी मानव अधिकारमानवीय मूल्य और नैतिकता की गठरी की पोल खुल जाती है।

 

ठाकुर जी की मृत आत्मा को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि जिनके कारण हम प्रशासनिक नौकरों की संस्कृति से अवगत हो पाएं।

 

इंसान होने का हम कर्तव्य निभाएंगे,

न्याय के लिए अन्याय नहीं सहेंगे,

फिर आवाज उठाएंगे जब तक हम मर नहीं जाएंगे!


Tuesday, September 12, 2023

शासकीय योजनेत घोटाळा करणारे बैंक अधिकारी विरोधात विदर्भ हैचरी असोसिएशन

 


  पंतप्रधान श्री नरेंद्र मोदीजींच्या सरकार मार्फत सर्वांसाठी विविध योजना राबविली जातात, शेतक-यांना, MSME लघु उद्योजकांना बैंक द्वारे विविध प्रकारचे कर्ज दिले जातात. काही वर्षा नंतर दैनिक पेपर, प्रेस माध्यमांमध्ये लोंकाना कळते कि योजनेत घोटळा झालेला आहे, घोटाळ्याची रक्कम 100 कोटी, 500 कोटी रुपयांच्या जवळपास असते. खुप वर्षानंतर त्याची चौकशी होते. ती चौकशी, कोर्टाची तारीख सुरुच राहते. पण घोटाळे होणे थांबत नाही. बैंक घोटाळ्यात बैंक अधिकारी, शाखा प्रबंधक, व मोठे बैंक अधिकारी यांचा पुर्णपणे सहभाग असतोच. महत्वाचे कि पोलिस यंत्रणा बैंक अधिकारींवर कार्यवाही लवकर करीत नाही.

 

          या संदर्भात हैचरी असोसिएशनला सदस्यांकडुन शासकीय योजने सबंधी नागपुर क्षेतातल्या राष्ट्रीयकृत बैंकेचे बैंक अधिकारी तर्फे दुर्व्यव्हारची मानसिक त्रास झाल्याची अनेक तक्रारी प्राप्त झाल्या आहेतसदस्यांमध्ये बैंक मैनेजरांच्या, बैंक अधिकारीच्या दुर्व्यव्हार बद्दल तीव्र संताप रोष निर्माण झालेला आहे. यावर मागील महिन्यात हैचरी असोसिएशनच्या सर्व सदस्य, पदाधिकारीनी बैंकाच्या दुर्व्यव्हारा विरोधात निर्दशन करुन आंदोलन सुद्धा केलेले आहे. देशाचे वित्तमंत्री व वित्त विभागांनाही प्रत्यक्ष निवेदन देऊन ही झाले पण हे बैंक मोठे वरिष्ठ बैंक अधिकारी आपल्या भ्रष्ट बैंक कर्मचारी विरोधात दंडात्मक कार्यवाही करित नाहीत. शासकीय योजनेच्या अमलबजावणीत कसुर करणा-या बैंक अधिकारीवर ही गुन्हे दाखल करुन कार्यवाही करावी. केंद्रिय वित्त राज्यमंत्री डाँ.श्री भागवत कराड साहेबांसोबत विदर्भ हैचरी असोसिएशन चे अध्यक्ष नितीन पानतावणे यांची बैठक नई दिल्ली येथे जुलै महिन्यात झाली. पंजाब नेशनल बैंक मानकापुर (नागपुर) येथिल बैंक शाखा प्रबंधक सी.पी करवाडे व बैंक अधिकारी राहुल गि-हे कडुन हैचरी उद्योजकांना अरेरावी भाषा वापरुन मानसिक व शाब्दिक त्रास देण्यात आले, अश्या बेजवाबदार बैंक अधिकारींवर कार्यवाही करुन त्यांना तात्काळ नौकरीतुन बर्खास्त करण्यात यावे, बैंक मैनेजरांना व कर्मचारींना नागरिकांसोबत सन्मानाने व्यव्हार करण्याची ताकिद देण्यात यावी अश्या प्रकारचे तक्रार निवेदन बैंकेचे चेयरमन श्री अतुल गोयल जी यांना ही देण्यात आले होते. तरिही बैंकेचे वरिष्ठ अधिकारी बैंक शाखा प्रबंधक सी.पी करवाडे व बैंक अधिकारी राहुल गि-हे यांच्यावर कार्यवाही न करता पाठिशी घालत आहे हे विदर्भ हैचरी असोसिएशनच्या निर्दशात दिसुन आले. सदर अधिकारी स्थानिक मराठी तरुण उद्योजकांना उडवाउडविची कारणे सांगुन दिशाभुल करतात, व काही उद्योजकांना अश्या ढिसाढ बैंक अधिकारी कडुन अपमानास्पद वागणुक मिळालेली आहे. बैंकाच्या दुर्व्यव्हारा व गैरव्यव्हारा विरोधात संताप व्यक्त करूण पंजाब नेशनल बैंक किंग्जवे नागपुर चे मुख्य क्षेत्रिय प्रबंघक श्री चतुर्वेदी यांन विदर्भ हैचरी असोसिएशन प्रतिनिधी मंडला तर्फे निवेदन देण्यात आले. विदर्भ हैचरी असोसिएशनचे सदस्य राहुल भोरकर (वाकी), विनोद मोहोड (हिंगणा), रविशंकर रंगारी (टेकेपार भंडारा), अभिजित ठाकुर (कलमेश्वर ब्राम्हणवाडा) सोबत नागपुर एक्शन ग्रुपचे अध्यक्ष विश्वजीत सिंह उपस्थित होते व विदर्भ हैचरी असोसिएशनचे अध्यक्ष नितीन पानतावणे यांनी नागपुर पोलिस अधिक्षक हर्ष पोद्दार यांना निवेदन देऊन नागपुरातील सर्व क्षेत्रिय कार्यालय असलेल्या बैंकाकडुन शासकीय योजनेत होणा-या घोटाळे ची चौकशी करण्यास विशेष निरीक्षण टीम ची स्थापना करुन चौकशी करण्याची मागणीचे निवेदन दिले.

 

घोटाळा करण्याचे कार्य एवढ सोपं सहज नाही, फक्त लोन घेणाराच फसतो. बैंक अधिकारीच्या सहभागा शिवाय शक्यच नाही. शासकीय योजनेत भ्रष्टाचार करणारी ही बैंक अधिकारी वर्ग वर गुन्हा दाखल करण्यास पोलिसांनी कसुर करु नये. 150 शेतक-याची फसवणुक बोल्ला सारखे बिल्ले ला दुधाचा अभिषेक व तुपाचा नैवेद्य लावणारे 103 कोटी रुपयाचे भ्रष्टाचाराचे हार घालुन बैंक घोटाळ्यात रिकार्ड मध्ये नागपुराची नोंद झालेली घटनेने प्रत्येक नागपुरकराचा मान शर्मेने घालवली आहे. वरिष्ठ शिस्त प्रिय केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी जी, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी सारखे नेतृत्व करणारे नेते मंडळीच्या नाकाखाली बैंकेच्या माध्यमाने कोटी रपयाचे आर्थिक घोटाळे होत आहेत. या बैंक अधिकारीवर कोणाचा वचक नाही तर घोटाळे थांबणार याची शक्यता राहीली नाही.


Wednesday, December 7, 2022

Growing Economic theft

 

In Indonesia, President Muhammad Suharto’s vast political and business operations flourished for thirty-two years during a reign made rich by a peculiar combination of repression, liberality, co-optation of different constituencies and mineral resources. Until he resigned unexpectedly in 1998 under the pressure of the Asian financial crisis, Suharto enjoyed enormous popular support, despite the harsh and heavy hand off his military on dissidents. A small elite group of business magnets, military officers, professional bureaucrats, and former journalists around the president’s office controlled access to petroleum resources and windfall rents from it while they managed an elaborate network of political patronage that dispensed favors to businesses and local leaders in carefully calibrated ways,

The Indonesian nation itself had been forged in 1949, not even two decades before Suharto came to power, after a small but determined armed struggle against Dutch colonial rule. It was a remarkable transition for a profoundly multicultural population spread out across an enormous archipelago of tens of thousands of islands. The newly formed country was characterized by a strong army, a politicized Islam, and centralized political power. It’s very identity was built around the motto, ‘unity in diversity’ which became the basis for a durable nationalist sentiment.

Suharto was an army officer under Sukarno, Indonesia’s first President. He came to prominence in 1965, when he led the military in a bloody purge of communist dissidents with the active support of the US government. After he formally took over the reins of government on March 11, 1966, he replaced military chiefs with loyalists, purged dissidents in the parliament, changed the educational system, positioned the military’s ruthless force to quell protests, invited foreign investors to extract the country’s rich oil and mineral resources and built a team of mostly Berkeley educated advisers to direct the regime’s economic policy. The government only gave limited voice for the opposition and was careful to distribute rewards widely to all those who participated in its formal structures, while threatening sanctions against those who opposed them.

In the course of three decades, Suharto stole as much as US $35 billion in public funds, but he also helped them economy grow sevenfold in real terms by creating enormous oil wealth that made many Indonesians rich, while carrying along a burgeoning middle class. All thought there is little evidence to show that returns to the economy were spread extensively, there is enough to inform us that money, political favors, and sweet deals were carefully dispensed to sustain a complex but tight web of military officers, legislators, advisers, political officials, and a global network of company executes, bankers and world leader. Each of these elite groups supported her through preferential deals and other forms of patronage, whose patterns were reproduced across scales all the way down to local gang leaders and thugs

The flow of information was also carefully controlled. The Indonesian press, had a glorious history of independent views dating back to the eighteen century, was mobilized to serve as a partner of the government, with editors receiving periodic telephone calls from the authorities on how to handle the news. Those papers that resisted the official line, like the newspaper Indonesia Raya, the news magazine Detik, and a few others, were banned, with some of their editors facing incarceration by the state as well as vilification by more pliant members of the forth estate, thereby breeding a culture of compliance and self-censorship.

By 1990, the Suharto family business was so big that any large project had to include one or the other of its many subgroups. It was even involved in the country’s poverty reduction efforts; the central government direct provided benefits to provinces and villages thought the “Inpres” or “Presidential Instructions” programs, which were executed at the discretion of the president and constituted a major portion of the country’s development budget. The government’s semi-authoritarian style meant that opposition was always circumscribed and co-opted by the regime, whereas any open rebellion was immediately crushed. But Suharto did not need to use violence to keep revolt in check. He relied on the elite’s fears of religious extremism and social disorder to constrain opposition, even while he pitted various factions that were loyal to him against each other.

As the epigraph suggests, Indonesian society under Suharto had somehow become distorted into bipolar stances that required radical adjustments be made to everyday life.  Either one blithely ignored the brutal police violence of the government and its suppression of human rights, or one found oneself in the extremely dangerous position of being a covert dissident, “an underground subversive”; there was no middle ground. For ordinary Indonesians, Suharto brought prosperity, for elites and the military, much more. Only those concerned with human rights and democracy were appalled at what was going on, but they too mostly kept their silence.

Throughout history, publics have been critical or uncritical partners in most political regime, often being misled into trusting their intentions and operations up with. The average person’s success or failure in life is deeply interlinked with how the economy as a whole performs, because everyone is codependent on a well-functioning “habits-forming” machine, which standardizes almost every element of human activity from education to work practice and home life.

Wednesday, July 11, 2018

मजदुर की मज़बूरी


मां है रेशम के कारखाने में
बाप मसरूफ सूती मिल में है
कोख से मां की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारखानों के काम आयेगा
अपने मजबूर पेट की खातिर
भूक सरमाये की बढ़ाएगा

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिए जलायेगा

यह जो नन्हा है भोला भाला है
खूनीं सरमाये का निवाला है
पूछती है यह इसकी खामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है!



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मोदी जी ! ये नौकरशाह कभी सुधरेंगे नहीं

10:33:00 AM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses


प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का यह भाषण भारतीय नौकरशाहों के सम्मुख सिविल सर्विस दिवस पर दिया गया। सकारात्मक रूप से प्रधानमंत्री जी ने बच्चों को जैसे समझाया जाता है वैसे ही मंत्रालयीन सचिव, जिलाधिकारी, लोकसेवा परीक्षा उत्तीर्ण किए हुए अधिकारियों को समझाया।

संपूर्ण भाषण यहां दिया गया है, इतना विस्तृत विषय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने रखा। पर मजाल है कि कोई नौकरशाह सच में इतना Agent of Change व्यवहार में बदलाव, Perform करें। ऐसे एक भी उदाहरण नहीं है। भ्रष्टाचार, सुख सुविधा विलास में आकंठ डूबी हुई यह प्रशासनिक व्यवस्था देश की जनता पर निरंकुशता से राज कर रही है service सेवा नहीं कर रही।

हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी क्या इस बात से अवगत नहीं है? क्या उन्हें जमीनी सच्चाई नहीं पता है ? 


जब असली मालिक यह देश की जनता किसी सरकारी कार्यालय में जाती है, तो वह नौकर अधिकारी की दया, कृपा का इंतजार करती है। वह दया, करुणा लाखों करोड़ों में किसी एक को ही नसीब होती है। मोदी जी भले ही ऐसी व्यवस्था से अपेक्षा करते हो, परन्तु यथार्थ आप और हम सभी जानते है।


जनता सरकारी नौकर को नौकर ही समझे, अधिकारी नहीं । तब ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का यह भीष्म प्रयास सफल होगा, अन्यथा यह केवल औपचारिकता पूर्ण करने का नाटक ही माना जाएगा।

आप मेरे विचारों से सहमत नहीं होंगे परन्तु जिस दिन आप सरकारी कार्यालय के दरवाजे के बाहर इंतजार करेंगे उस दिन आप जान जायेंगे ये सरकारी नौकर इंसानियत के दुश्मन है। अहंकार, और दंभ में चूर है। निम्नलिखित भाषण मोदी जी ने दिया है अवश्य पढ़िए परन्तु उसे वर्तमान की सच्चाई के तराजू में आकलन किजिए।

मोदी जी के भाषण के बाद भी नौकरशाहों में रत्ती भर का बदलाव न आना यह विशेष रूप से इंगित करता है कि सरकारी नौकर व्यवहार में बदलाव लाने के लिए तैयार नहीं है। यह भाषण नया नहीं है। उस सकारात्मक भाव को नमन, परन्तु यथार्थ से इसका दूर दूर तक संबंध नहीं है।

- विश्वजीत सिंह (नागपुर)

9028266021

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 मंत्री परिषद के मेरे सहयोगी ... उपस्थित सभी महानुभाव और साथियों,

Civil Service Day देश के जीवन में भी और हम सबके जीवन में भी और विशेषकर आपके जीवन में, सार्थक कैसे बने? क्‍या ये ritual बनना चाहिए? हर साल एक दिवस आता है। इतिहास की धरोहर को याद करने का अवसर मिलता है। यह अवसर अपने-आप में इस बात के लिए हमें प्रेरणा दे सकता है क्‍या कि हम क्‍यों चले थे, कहां जाना था, कितना चले, कहां पहुंचे, कहीं ऐसा तो नहीं था कि जहां जाना था वहां से कहीं दूर चले गए? कहीं ऐसा तो नहीं था कि जहां जाना था अभी वहां पहुंचना बहुत दूर बाकी है? ये सारी बातें हैं जो व्‍यक्ति को विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। और ऐसे अवसर होते हैं जो हमें जरा पीछे मुड़ करके और उस कदमों को, उस कार्यकाल को एक critical नजर से देखने का अवसर भी देते हैं। और उसके साथ-साथ, ये अवसर ही होते हैं कि जो नए संकल्‍प के लिए कारण बनते हैं। और ये जीवन में हर किसी का अनुभव होता है। सिर्फ हम यहां बैठे हैं इसलिए ऐसा नहीं है।

एक विद्यार्थी भी जब exam दे करके घर लौटता है, एक तरफ रिजल्‍ट का इंतजार करता है, साथ-साथ ये भी सोचता है कि अगले साल तो प्रारंभ से ही पढ़ूंगा। निर्णय कर लेता है कि अगले साल exam के समय पढ़ना नहीं है मैं बिल्‍कुल प्रारंभ से पढ़ंगा, नियमित हो जाऊंगा, ये खुद ही कहता है किसी को कहना नहीं पड़ता। क्‍योंकि वो परीक्षा का माहौल ऐसा रहता है कि उसका मन करता है कि अगले साल के लिए कुछ बदलाव लाऊंगा हृदय में। और जब स्‍कूल-कॉलेज खुल जाती हैं तो याद तो आता है कि हां, फिर सोचता है ऐसा करें आज रात को पढ़ने के बजाय सुबह जल्‍दी उठ करके पढ़ेंगे। सुबह नींद आ जाती है सोचता है कि शायद सुबह जल्‍दी उठ करके पढ़ना हमारे बस का रोग नहीं है। ऐसा करें रात को ही पढ़ेंगे। फिर कभी मां को कहता है, मां जरा जल्‍दी उठा देना। कभी मां को कहता है रात को ज्‍यादा खाना मत खिलाओ कुछ ऐसा खिलाओ ताकि मैं पढ़ पाऊं। तरह-तरह की चीजें खोजता रहता है। लेकिन अनुभव आता है कि प्रयोग तो बहुत होते हैं लेकिन वो ही हाल हो जाता है, फिर exam आ जाती है फिर देर रात तक पढ़ता है, फिर note एक्‍सचेंज करता है, फिर सोचता है कल सुबह क्‍या होगा? ये जीवन का एक क्रम बन जाता है। क्‍या हम भी उसी ritual से अपने-आपको बांधना चाहते हैं? मैं समझता हूं कि फिर सिर्फ रुकावट आती है ऐसा नहीं है, थकावट भी आती है। और कभी-कभी रुकावट जितना संकट पैदा नहीं करती हैं उतनी थकावट पैदा करती हैं। और जिंदगी वो जी सकते हैं जो कभी थकावट महसूस नहीं करते, रुकावट को एक अवसर समझते हैं, रुकावट को चुनौती समझते हैं, वो जिंदगी को कहीं ओर ले जा सकते हैं। लेकिन जिनके जीवन में एक बार थकावट ने प्रवेश कर दिया वो किसी भी बीमारी से बड़ी भयंकर होती है, उससे कभी बाहर नहीं निकल सकता है और थकावट, थकावट कभी शरीर से नहीं होती है, थकावट मन की अवस्‍था होती है जो जीने की ताकत खो देती है, सपने भी देखने का सामर्थ्‍य छोड़ देती है और तब जा करके जीवन में कुछ भी न करना, और कभी व्‍यक्ति के जीवन में कुछ न होना उसके अपने तक सीमित नहीं रहता है, वो जितने बड़े पद पर बैठता है उतना ज्‍यादा प्रभाव पैदा करता है। कभी-कभार बहुत ऊंचे पद पर बैठा हुआ व्‍यक्ति कुछ कर करके जितना प्रभाव पैदा कर सकता है उससे ज्‍यादा प्रभाव कुछ न करके नकारात्‍मक पैदा कर देता है। और इसलिए मैं अच्‍छा कर सकूं अच्‍छी बात है, न कर पाऊं तो भी ये तो मैं संकल्‍प करुं कि मुझे जितना करना था, उसमें तो कहीं थकावट नहीं आ रही है, जिसके कारण एक ठहराव तो नहीं आ गया? जिसके कारण रुकावट तो नहीं आ गई और कहीं मैं पूरी व्‍यवस्‍था को ऊर्जाहीन, चेतनाहीन, प्राणहीन, संकल्‍प विहीन, गति विहीन नहीं बनाए देता हूं? अगर ये मन की अवस्‍था रही तो मैं समझता हूं संकट बहुत बड़ा गहरा जाता है। और इसलिए हम लोगों के जीवन में जैसे-जैसे दायित्‍व बढ़ता है, हमारे अंदर नया करने ऊर्जा भी बढ़नी चाहिए। और ये अवसर होते हैं जो हमें ताकत देते हैं।

कभी-कभार एक अच्‍छा विचार जितना सामर्थ्‍य देता है, उससे ज्‍यादा एक अच्‍छी सफलता, चाहे वो किसी और की क्‍यों न हो, वो हमारी हौसला बहुत बुलंद कर देती है। आज जो Award Winner हैं उनका कार्यक्षेत्र हिंदुस्‍तान की तुलना में बहुत छोटा होगा। इतने बड़े देश की समस्‍याओं के सामने एकाध चीज को उन्‍होंने हाथ लगाया होगा, हिसाब से लगाए तो वो बहुत छोटी होगी। लेकिन वो सफलता भी यहां बैठे हुए हर किसी को लगता होगा अच्‍छा, इसका ये भी परिणाम हो सकता है? अच्‍छा अनंतनाग में भी हो सकता है? आनंदपुर में भी हो सकता है? हर किसी के मन में विचार आंदोलित करने का काम एक सफल गाथा कर देती है।

और इसलिए Civil Service Day के साथ ये प्रधानमंत्री Award की जो परंपरा रही है उसको एक नया आयाम इस बार देने का प्रयास किया गया। कुछ Geographical कठिनाइयां हैं कुछ जनसंख्‍या की सीमाएं हैं। तो ऐसी विविधताओं से भरा हुआ देश है तो उसको तीन ग्रुप में कर करके कोशिश की लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि इतनी भारी scrutiny भी हो सकती हैं सरकारी काम में। वरना तो पहले क्‍या था application लिख देते थे और कुछ लोगों को बहुत अच्‍छा रिपोर्ट बनाने का आता भी है तो jury को प्रभावित भी कर देते हैं। और इस बार प्रभावित करने वाला कोई दायरा ही नहीं था। क्‍योंकि call-center से सैंकड़ों फोन करके पूछा गया भई आपके यहां ये हुआ था क्‍या हुआ ? Jury ने physically वहां meeting की। Video Conferencing से यहीं से Viva किया गया। यानी अनेक प्रकार की कोशिश करने के बाद एक कुछ अच्‍छाइयों की ओर जाने का प्रयास हुआ है। लेकिन जो अच्‍छा होता है उसका आनंद होता है, इतनी बड़ी प्रक्रिया हुई जैसे।

लेकिन मेरे मन में एक विचार आया कि 600-650 से ज्‍यादा जिले हैं। हमारी चुनौती यहां शुरू होती है कि पहले से बहुत अच्‍छा हुआ, क्‍योंकि करीब 74 सफलता की गाथाएं short-list हुईं हैं। वो पहले से कई गुना ज्यादा है। और पहले से कई गुना ज्यादा होना, वो अपने आप में एक बहुत बड़ा समाधान का कारण है। लेकिन जिसके जीवन में थकावट नहीं है, रूकावट का वो सोच ही नहीं सकता है, वो दूसरे तरीके से सोचता है कि 650-700 जिलों में से 10% ही short-list हुए, 90% छूट गये! क्या ये 90% लोगों के लिए चुनौती बन सकती है? उस district के लिए चुनौती बन सकती है कि भले हम सफलता पाएं या न पाएं, पर short-list तक तो हम अपने जिलों को ला करके रहेंगे। अपनी पसंद की एक योजना पकड़ेंगे, इसी वर्ष से पकड़ लेंगे और उस स्तुइदेन्त की तरह नहीं करेंगे, आज इसी Civil Service Day को ही तय करेंगे की अगली बार इस मंच पर होंगे और हम award ले कर के जायेंगे। हिंदुस्तान के सभी 650 से भी अधिक districts के दिमाग में ये विश्वास पैदा होना चाहिए।

74 पहले की तुलना में बहुत बड़ा figure है, बहुत बड़ा प्रयास है, लेकि‍न अगर मैं उससे आगे जाने के लि‍ए सोचता हूं तो मतलब यह है कि‍ थकावट से मैं बंधन में बंधा हुआ नहीं हूं। मैं रूकावट को स्‍वीकार नहीं करता हूं, मैं कुछ और आगे करने के लि‍ए चाहता हूं। यह भाव, यह संकल्‍प भाव इस टीम में आता है और जो लोग वीडि‍यो कॉन्‍फ्रेन्‍स पर मुझे सुन रहे हैं अभी, कार्यक्रम में, उन सब अफसर साहब, उनके भी दि‍माग में भाव आएगा। वो राज्‍य में चर्चा करे कि‍ क्‍या कारण है कि‍ हमारा राज्‍य नजर नहीं आता है। उस district में भी बैठी हुई टीम भी सोचे कि‍ क्‍या कारण है कि‍ आज मेरे district का नाम नहीं चमका। एक healthy competition, क्‍योंकि‍ जब से सरकार में कुछ बातों को लेकर के मैं आग्रह कर रहा हूं। उसमें मैं एक बात कहता हूं, cooperative federalism लेकि‍न साथ-साथ मैं कहता हूं competitive cooperative federalism राज्‍यों के बीच वि‍कास की स्‍पर्धा हो, अच्‍छाई की स्‍पर्धा हो, good governance की स्‍पर्धा हो, best practices की स्‍पर्धा हो, values की स्‍पर्धा हो, integrity की स्‍पर्धा हो, accountability, responsibility की स्‍पर्धा बढ़े, minimum governance का सपना स्‍पर्धा के तहत आगे नि‍कल जाने का प्रयास हो। यह जो competitive की बात है वो district में भी feel होना चाहि‍ए। इस civil service day के लि‍ए हम संकल्‍प करें कि‍ हम भी दो कदम और जाएंगे।

दूसरी बात है, हम लोग जब civil service में आए होंगे। कुछ लोग तो परंपरागत रूप से आए होंगे, शायद family tradition रही होगी। तीन-चार पीढ़ी से इसी से गुजारा करते रहे होंगे, ऐसे कई लोग होंगे। कुछ लोगों को यह भी लगता होगा कि‍ बाकी छोड़ो साहब, यह है एक बार अंदर पाइपलाइन में जगह बना लो। फि‍र तो ऐसे ही चले जाएंगे। फि‍र तो वक्‍त ही ले जाता है, हमें कहीं जाना नहीं पड़ता है। 15 साल हुए तो यहां पहुंच गए, 20 साल हो गए तो यहां पहुंच गए, 22 साल हो गए तो यहां पहुंच गए और जब बाहर नि‍कलेंगे तो करीब-करीब तीन में से एक जगह पर तो होंगे ही होंगे। उसको नि‍श्‍चि‍त भवि‍ष्‍य लगता है। सत्‍ता है, रूतबा है तो आने का मन भी करता है और वो गलत है ऐसा मैं नहीं मानता हूं। मैं ऐसा मानने वालों में से नहीं हूं कि‍ गलत है, लेकि‍न सवा सौ करोड़ देशवासि‍यों में से कि‍तने है जि‍नको यह सौभाग्‍य मि‍लता है। अपने परि‍श्रम से मि‍ला है, अपने बलबूते पर मि‍ला है फि‍र भी, यह भी तो जीवन का बहुत बड़ा सौभाग्‍य है कि‍ सवा सौ करोड़ में से हम एक-दो हजार, पाँच हजार, दस हजार, पंद्रह हजार लोग है जि‍नको यह सौभाग्‍य मि‍ला है। हम जो कुछ भी है। कोई एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जि‍सने मुझे इन सवा सौ करोड़ के भाग्‍य को बदलने के लि‍ए मौका दि‍या है। इतने बड़े जीवन के सौभाग्‍य के बाद अगर कुछ कर दि‍खाने का इरादा नहीं होता तो यहां पहुंचने के बाद भी कि‍स काम का है और इसलि‍ए तो कभी न कभी जीवन में.. मुझे बराबर याद है मैं आज से 35-40 साल पहले.. मैं तो राजनीति‍ में बहुत देर से आया। सामाजि‍क जीवन में मैंने अपने आपको खपाया हुआ था। तो मैं कभी यूनि‍वर्सि‍टी के दोस्‍तों से गप्‍पे-गोष्‍ठी करने चला जाता था, मि‍लता था, उनसे बात करता था और एक बार मैंने उनसे पूछा क्‍या सोचा, आगे क्‍या करोगे? तो हर कोई बता रहा था, पढ़ाई के बाद सोचेंगे। कुछ बता रहे थे कि‍ नहीं ये पि‍ताजी का व्‍यवसाय है वहीं करूंगा। एक बार मेरा अनुभव है, एक नौजवान था, हाथ ऊपर कि‍या, उसने कहा मैं आईएएस अफसर बनना चाहता हूं। मैंने कहा क्‍यों भई तेरे मन में ऐसे कैसे वि‍चार आया? इसलि‍ए मैंने कहा, क्‍योंकि‍ वहां उनका जरा रूतबा होता है। बोले – नहीं, मुझे लगता है कि‍ मैं आईएएस अफसर बनूंगा तो मैं कइयों की जि‍न्‍दगी में बदलाव ला सकता हूं, मैं कुछ अच्‍छा कर सकता हूं। मैंने कहा राजनीति‍ में क्‍यों नहीं जाते हो, वहां से भी तुम कुछ कर सकते हो। नहीं बोले, वो तो temporary होता है। उसकी इतनी clarity थी। यह व्‍यवस्‍था में अगर मैं गया तो मैं एक लंबे अर्से तक sustainably काम कर सकता हूं। 

आप उस ताकत के लोग है और इसलि‍ए आप क्‍या कुछ नहीं कर सकते हैं वो आप भली-भांति‍ जानते हैं। उसका अहसास कराने की आवश्‍यकता नहीं होती। एक समय होगा, हालात भी ऐसे रहे होंगे। व्‍यवस्‍थाएं बनानी होगी, एक सोच भी रही होगी और ज्‍यादातर हमारा role एक regulator का रहा है। काफी एक-दो पीढ़ी ऐसी हमारी इस परंपरा की रही होगी कि‍ जि‍नका पूरा समय, शक्‍ति‍regulator के रूप में गया होता है। उसके बाद से शायद एक समय आया होगा जि‍नमें थोड़ा सा दायरा बदला होगा। administrator का रूप रहा होगा। administrator के साथ-साथ कुछ-कुछ controller का भी थोड़ा भाव आया होगा। उसके बाद थोड़ा कालखंड बदला होगा तो लगा होगा कि‍ भई अब हमारी भूमि‍का regulator की तो रही नहीं। Administrator या controller से आगे अब एक managerial skill develop करना जरूरी हो गया है क्‍योंकि‍ एक साथ कई चीजें manage करनी पड़ रही है।

हमारा दायि‍त्‍व बदलता गया है लेकि‍न क्‍या 21वीं सदी के इस कालखंड में यहीं हमारा रूप पर्याप्‍त है क्‍या? भले ही मैं regulator से बाहर नि‍कलकर के लोकतंत्र की spirit के अनुरूप बदलता-बदलता administrator से लेकर के managerial role पर पहुंचा हूँ। लेकि‍न मैं समझता हूं कि‍ 21वीं सदी जो पूरे वैश्‍वि‍क स्‍पर्धा का युग है और भारत अपेक्षाओं की एक बहुत बड़ी.. एक ऐसा माहौल बनाए जहां हर कि‍सी न कि‍सी को कुछ करना है, हर कि‍सी को कुछ न कुछ आगे बढ़ना है। हर कि‍सी को कुछ न कुछ पाना भी है। कुछ लोगों को इससे डर लगता होगा। मैं इसे अवसर मानता हूं। जब सवा सौ करोड़ देशवासि‍यों के अंदर एक जज़बा हो कि‍ कुछ करना है, कुछ पाना है, कुछ बनना है। वो अपने आप में देश को आगे बढ़ाने का कारण होता है। ठीक है यार, पि‍ताजी ऐसा छोड़ कर गए अब चलो भई, क्‍या करने की जरूरत है, शौचालय बनाने की क्‍या जरूरत है। अपने मॉ-बाप कहां शौचालय में, ऐसे ही गुजारा करके गए। अब वो सोच नहीं है, वो कहता है नहीं, जि‍न्‍दगी ऐसी नहीं, जि‍न्‍दगी ऐसी चाहि‍ए। देश को बढ़ने के लि‍ए यह अपने आप में एक बहुत बड़ा ऊर्जा तत्‍व है। और ऐसे समय हम administrator हो, हम controller हो, collector हो, यह sufficient नहीं है। अब समय की मांग है कि‍ व्‍यवस्‍था से जुड़ा हुआ हर पुर्जा, छोटी से छोटी इकाई से लेकर के बड़े से बड़े पद पर बैठा हुआ व्‍यक्‍ति‍ वो agent of change बनना समय की मांग है। उसने अपने आप को उस रूप से प्रस्तुत करना पड़ेगा, उस रूप से करना पड़ेगा ताकि‍ वो उसके होने मात्र से, सोचने मात्र से, करने मात्र से change का अहसास दि‍खाई दे और आज या तो कल दि‍खाई देगा, वो इंतजार होना नहीं है। हमें उस तेजी से change agent के रूप में काम करना पड़ेगा कि‍ हम परि‍स्‍थि‍ति‍यों को पलटे। चाहे नीति‍ में हो, चाहे रणनीति‍ में हो, हमें बदलाव लाने के लि‍ए काम करना पड़ेगा।

कभी-कभार एक ढांचे में जब बैठते हैं तब experiment करने से बहुत डरते हैं। कहीं फेल हो जाएंगे, कहीं गलत हो जाएगा। अगर हम experiment करना ही छोड़ देंगे, फि‍र तो व्‍यवस्‍था में बदलाव आ ही नहीं सकता है और experiment कोई circular नि‍काल करके नहीं होता है। एक भीतर से वो आवाज उठती है जो हमें कहीं ले जाती है और जि‍नको लगता है कि‍ भई कहीं कोई risk न हो, वो experiment तो ठीक है। बि‍ना risk के जो experiment होता है वो experiment नहीं होता है, वो तो plan होता है जी। Plan और experiment में बहुत बड़ा अंतर होता है। Plan का तो आपको पता है कि‍ ऐसा होना है, यहां जाना है, experiment का plan थोड़ी होता है और मैं हमेशा experiment को पुरस्‍कृत करता हूं। ज़रा हटके। ये करने का जो कुछ लोग करते हैं और उनको एक संतोष भी होता है कि‍ भई पहले ऐसा चलता था, मैंने ये कर दि‍या। उसकी एक ताकत होती है।

इतने बड़े देश को हम 20-25-30 साल या पि‍छली शताब्‍दी के सोच और नि‍यमों से नहीं चला सकते हैं। technology ने मनुष्‍य जीवन को कि‍तना बदल दि‍या है लेकि‍न technology से बदली हुई जीवन व्‍यवस्‍था, शासन व्‍यवस्‍था में अगर प्रति‍बिंबि‍‍त नहीं होती है तो दायरा कि‍तना बढ़ जाएगा। और हम सबने अनुभव कि‍या है कि‍ योजनाएं तो आती हैं, सरकार में योजनाएं कोई नई चीजें नहीं होती हैं, लेकि‍न सफलता तो सरकारी दायरे से बाहर नि‍कलकर के जन सामान्‍य से जोड़ने से ही मि‍लती हैं। यह हम सबका अनुभव है। जब भी जन भागीदारी बढ़ी है आपकी योजनाएं सफल होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि‍ हमारे लि‍ए अनि‍वार्य है कि‍ अगर मैं civil servant हूं तो civil society के साथ engagement, ये मेरे लि‍ए बहुत अनि‍वार्य है। मैं अपने दायरे में, अपने चैम्‍बर में, अपनी फाइलों के बीच देश और दुनि‍या को चलाना चाहता हूं, तो मुझे जन सहयोग कम मि‍लता है। जि‍नको जरूरत है वो तो इसका फायदा उठा लेंगे, आ जाएंगे लेकि‍न कुछ जागरूक लोगों की भलाई से देश बनता नहीं है। सामान्‍य मानवि‍की जो कि‍ जागरूक नहीं है तो भी उसके हि‍त की बात उस तक पहुंचती हैं और वो जब हि‍स्‍सेदार बन जाता है तो स्‍थि‍ति‍यां पलट जाती हैं।

और इसलि‍ए शौचायल बनाना कोई इसी सरकार ने थोड़ी कि‍या है। जि‍तनी सरकारें बनी होंगी सभी सरकारों ने सोचा होगा। लेकि‍न वो जन आंदोलन नहीं बना। हम लोगों का काम है और सरकारी दफ्तर में बैठे हुए व्‍यक्‍ति‍यों का भी काम है कि‍ हम इन चीजों में, हमारी कार्यशैली में जनसामान्‍य, civil society से engagement, हम यह कैसे बढ़ाएं, हम उन दायरों को कैसे पकड़े। आप देखि‍ए, उसमें से आपको एक बहुत सरलीकरण नई चीजें भी हाथ लगेगी। और नई चीजें चीजों को करने का कारण भी बन जाती हैं और वही कभी-कभी स्‍वीकृति‍ बन जाती है, नीति‍यों का हि‍स्‍सा बन जाती है और इसलि‍ए हमारे लि‍ए कोशि‍श रहनी चाहि‍ए।

अब यह जरूर याद रखे कि‍ हम.. हमारे साथ दो प्रकार के लोग हम जानते हैं भली-भांति‍। कुछ लोगों को पूछते हैं तो वो कहते हैं कि‍ मैं जॉब करता हूं। कुछ लोगों को पूछते हैं तो कहते हैं कि‍ service करता हूं। वो भी आठ घंटे यह भी आठ घंटे, वो भी तनख्‍वाह लेता है यह भी तनख्‍वाह लेता है। लेकि‍न वो जॉब कहता है यह service कहता है। यह फर्क जो है न, हमें कभी भूलना नहीं चाहि‍ए, हम जॉब नहीं कर रहे हैं, हम service कर रहे हैं। यह कभी नहीं भूलना चाहि‍ए और हम सि‍र्फ service शब्‍द से जुड़े हुए नहीं हैं, हम civil service से जुड़े हुए हैं और इसलि‍ए हम civil society के अभि‍न्‍न अंग है। मैं और civil society, मैं और civil society को कुछ देने वाला, मैं और civil society के लि‍ए कुछ करने वाला, जी नहीं! वक्‍त बदल चुका है। हम सब मैं और civil society, हम बनकर के चीजों को बदलेंगे। यह समय की मांग रहती है। और इसलि‍ए मैं एक service के भाव से और जीवन में संतोष एक बात का है कि‍ मैंने कुछ सेवा की है। देश की सेवा की है, department के द्वारा सेवा की है, उस project के द्वारा सेवा की है लेकि‍न सेवा ही। हमारे यहां तो कहा गया है - सेवा परमोधर्म:। जि‍सकी रग-रग में इस बात की घुट्टी पि‍लाई गई हो कि‍ जहां पर सेवा परमोधर्म है, आपको तो व्‍यवस्‍था के तहत सेवा का सौभाग्‍य मि‍ला है और वहीं मैं समझता हूं कि‍ एक अवसर प्रदान हुआ है।

मेरा अुनभव है। मुझे एक लंबे अरसे तक मुख्‍यमंत्री के नाते सेवा करने का मौका मि‍ला। पि‍छले दो साल से आप लोगों के बीच बहुत कुछ सीख रहा हूं। मैं अनुभव से कह सकता हूं, बड़े वि‍श्‍वास से कह सकता हूं। हमारे पास ये देव दुर्लभ टीम है, सामर्थ्‍यवान लोग है। एक-एक से बढ़कर के काम करने की ताकत रखने वाले लोग है। अगर उनके सामने कोई जि‍म्‍मेवारी आ जाती है तो मैंने देखा है कि‍ वो Saturday-Sunday भी भूल जाते हैं। बच्‍चे का जन्‍मदि‍न तक भूल जाते हैं। ऐसे मैंने अफसर देखे हैं और इसलि‍ए यह देश गर्व करता है कि‍ हमारे पास ऐसे-ऐसे लोग हैं जो पद का उपयोग देश को कहीं आगे ले जाने के लि‍ए कर रहे हैं।

अभी नीति‍ आयोग की तरफ से एक presentation हुआ। बहुत कम लोगों को मालूम होगा। इस स्‍तर के अधि‍कारि‍यों ने, जब उनको ये काम दि‍या गया और जैसा बताया गया, मैंने पहले दि‍न presentation दि‍या था और बाद में मैंने उनको समय दि‍या था और मैंने कहा था कि‍ मैं आपसे फि‍र.. इसके light में मुझे बताइए और कुछ नया भी बताइए। और मैं आज गर्व से कह सकता हूं। कोई circular था, उसके साथ कोई discipline के बंधन नहीं थे। अपनी स्‍वेच्‍छा से करने वाला काम था और शायद हि‍न्‍दुस्‍तान के लोगों को जानकर के अचंभा होगा कि‍ इन अफसरों ने 10 thousand man hour लगाए। यह छोटी घटना नहीं है और मेरी जानकारी है कि‍ कुछ group जो बने थे, 8, 10-10, 12-12 बजे तक काम करते थे। कुछ group बने थे जि‍न्‍होंने अपना Saturday-Sunday छोड़ दि‍या था और नि‍यम यह था कि‍ office में अगर शाम को छह बजे के बाद काम करना है। शाम को office hours के बाद ten thousand hours लगाकर के यह चिंतन कर-करके यह कार्य रचना तय की गई है। इससे बड़ी घटना क्‍या हो सकती है जी, इससे बड़ा गर्व क्‍या हो सकता है? मैंने उस दि‍न भी कहा था और आज भी नीति‍ आयोग की तरफ से कहा गया है कि‍ हमें एक बहुत बड़े वि‍द्वान, consultant जो जानकारि‍यां देते हैं। लेकि‍न जो 25-30 साल इसी धरती से काम करते-करते नि‍कले हुए लोग जब सोचते हैं तो कि‍तनी ताकतवर चीजें दे सकते हैं, उसका यह उत्‍तम उदाहरण है। अनुभव से नि‍कली हुई चीज है और उसको वहां छोड़ा नहीं। यह चिंतन की chain के रूप में उसको एक बार फि‍र से follow up के नाते reverse gear में ले जाया गया। वो बैठे गए, वो अलग बैठा गया और उस वक्‍त हमने अपने-अपने department ने अपना action plan बनाया। जि‍स action plan का बजट के अंदर भी reflection दि‍खाई दे रहा था। बजट की कई बातें ऐसी हैं जो इस चिंतन में से नि‍कली थी। Political thinking process से नहीं आई थी। यह बहुत छोटी बात नहीं है जी। इतना बड़ा involvement decision making में एक नया work culture है, नई कार्यशैली है।


मैं कभी अफसरों से नि‍राश नहीं हुआ। इतने बड़े लंबे तजुर्बे के बाद मैं वि‍श्‍वास से कहता हूं कि‍ मैं कभी अफसरों से नि‍राश नहीं हुआ। मेरे जीवन में कभी मुझे कि‍सी अफसर को डांटने की नौबत नहीं आई, ऊंची आवाज में बोलने की नौबत नहीं आई है। मैं zero experience के साथ शासन व्‍यवस्‍था में आया था। मुझे पंचायत का भी अनुभव नहीं था। पहले दि‍न से आज तक मुझे कभी कोई कटु अनुभव नहीं आया। मैंने यह सामर्थ्‍य देखा है। क्‍यों? मैंने अपनी सोच बनाई हुई है कि‍ हर व्‍यक्‍ति‍ के अंदर परमात्‍मा ने उत्‍तम से उत्‍तम ताकत दी है। हर व्‍यक्‍ति‍ में परमात्‍मा ने जहां है, वहां से ऊपर उठने का सामर्थ्‍य दि‍या है। हर व्‍यक्‍ति‍ के अंदर परमात्‍मा है। एक ऐसा इरादा दि‍या है कि‍ कुछ अच्‍छा करके जाना है। कि‍तना ही बुरा कोई व्‍यक्‍ति‍ क्‍यों न हो वो भी मन में कुछ अच्‍छा करके जाने के लि‍ए सोचता है। हमारा काम यही है कि‍ इस अच्‍छाई को पकड़ने का प्रयास करे और मुझे हमेशा अनुभव आया है कि‍ जब हरेक की शक्‍ति‍यों को मैं देखता हूं तो अपरमपार मुझे शक्‍ति‍यों का भंडार दि‍खाई देता है और तभी मैं आशावादी हूं कि‍ मेरे राष्‍ट्र का कल्‍याण सुनि‍श्‍चि‍त है, उसको कोई रोक नहीं सकता है। इस भाव को लेकर के मैं चल पाता।


जि‍सके पास इतनी बढ़ि‍या टीम हो, देश भर में फैले हुए, हर कोने में बैठे हुए लोग हो, उसे नि‍राश होने का कारण क्‍या हो सकता है। उसी आशा और वि‍श्‍वास के साथ, इसी टीम के भरोसे, जि‍न सपनों को लेकर के हम चले हैं। वक्‍त गया होगा, शायद गति‍ कम रही होगी। diversion भी आए होंगे, divisions भी आए होंगे। लेकि‍न उसके बावजूद भी हमारे पास जो अनुभव का सामर्थ्‍य है, उस अनुभव के सामर्थ्‍य से हम गति‍ भी बढ़ा सकते हैं, व्याप्ति भी बढ़ा सकते हैं, output-outlay की दुनि‍या से बाहर नि‍कलकर के हम outcome पर concentration भी कर सकते हैं। हम परि‍णाम को प्राप्‍त कर सकते हैं।


कभी-कभार हम senior बन जाते हैं। कभी-कभार क्‍या, बन ही जाते हैं, व्‍यवस्‍था ही ऐसी है। तो हमें लगता है और ये सहज प्रकृति‍ है। पि‍ता अपने बेटे को कि‍तना ही प्‍यार क्‍यों न करते हो, उनको मालूम है कि‍ उनका बेटा उनसे ज्‍यादा होनहार है, बहुत कुछ कर रहा है लेकि‍न पि‍ता की सोच तो यही रहती है कि‍ तेरे से मुझे ज्‍यादा मालूम है। हर पि‍ता यही सोचता है कि‍ तेरे से मैं ज्‍यादा जानता हूं और इसलि‍ए हम जो यहां बैठे हैं तो जूनि‍यर अफसर से हम ज्‍यादा जानते हैं, वि‍चार आना। वो हम जन्‍म से ही सीखते आए हैं। उसमें कोई आपका दोष नहीं है। मुझे भी यही होगा, आपको भी यही होगा। लेकि‍न जो सत्‍य है, अनुभव होने के बावजूद भी क्‍या बदलाव नहीं आ जाता। आज स्‍थि‍ति‍ ऐसी है कि‍ पीढ़ि‍यों का अंतर हमें अनुभव करना होगा। हम जब छोटे होंगे तब हमारी जानकारि‍यों का दायरा और समझ और आज के बच्‍चे में जमीन-आसमान का अंतर है। मतलब हमारे बाद जो पीढ़ी तैयार होकर के आज system में आई है। भले ही हमें इतना अनुभव नहीं होगा लेकि‍न हो सकता है वो ज्ञान में हमसे ज्‍यादा होगा। जानकारि‍यों में हमसे ज्‍यादा होगा। हमारी सफलता इस बात में नहीं है कि‍ तेरे से मैं ज्‍यादा जानता हूं, हमारी सफलता इस बात में है कि‍ मेरा अनुभव और तेरा ज्ञान, मेरा अनुभव और तेरी ऊर्जा, आओ यार मि‍ला ले, देश का कुछ कल्‍याण हो जाएगा। यह रास्‍ता हम चुन सकते हैं। आप देखि‍ए ऊर्जा बदल जाएगी, दायरा बदल जाएगा। हमें एक नई ताकत मि‍लेगी।


मैं कभी-कभी कहता हूं कि‍ जब आप कंप्‍यूटर पर काम करना सीखते हैं और ऐसी दुनि‍या है कि‍ अंदर उतरते-उतरते चले ही जाते हैं। Communication world इतना बड़ा है। लेकि‍न अगर आपकी मॉं देखती है तो वो कहती है, अच्‍छा बेटा! तुझे इतना सारा आ गया, बहुत सीख लि‍या तूने। लेकि‍न अगर आपका भतीजा देखता है तो कहता है क्‍या अंकल आपको इतना भी नहीं आता। यह तो छोटे बच्‍चों को आता है, आपको नहीं आता है। इतना बड़ा फर्क है। एक ही घर में तीन पीढ़ी है तो ऊपर एक अनुभव आएगा और नीचे दूसरा अनुभव आएगा। क्‍या हम सीनि‍यर होने के नाते इस बदली हुई सच्‍चाई को स्‍वीकार कर सकते हैं क्‍या? हमारे पास वो नहीं है जो आज नई पीढ़ी के पास है, तो मानना पड़ेगा। उसके सोचने के तरीके बदल गए हैं। जानकारि‍यां पाने के उसके रास्‍ते अलग हैं। एक चीज को खोजने के लि‍ए आप घंटों तक ढूंढते रहते हैं यार क्‍या हुआ था। वो पल भर में यूं लेकर के आ जाता है कि‍ नहीं-नहीं साहब ऐसा था।



हमारे लि‍ए यह सबसे बड़ी आवश्‍यकता है कि‍ हम Civil Service Day पर यह संकल्‍प करे कि‍ नई पीढ़ी जो हमारी व्‍यवस्‍था में आई है, से एक दम जूनियर अफसर होंगे, उनके पास हमसे कुछ ज्‍यादा है। उसको अवसर देने के लिए मैं अपना मन बना सकता हूं। उसको मैं मेरे अंदर internalize करने के लिए कुछ व्‍यवस्‍था कर सकता हूं? आप देखिए आपके department की ताकत बहुत बदल जाएगी, बहुत बदल जाएगी। आपने जो निर्णय किए हैं उस निर्णयों को आप बड़ी, बहुत उत्‍सव के साथ, उमंग के साथ भरपूर कर पाएंगे।


और भी एक बात है, सारी समस्‍याओं की जड़ में है Contradiction and conflict, ये इरादतन नहीं आए हैं, कुल मिला करके हमारी कार्यशैली जो विकसित हुई है उसने हमें यहां ला करके छोड़ा है। Simple word में कोई कह देते हैं कि silo में काम करने का तरीका। कुछ लोगों के लिए silo में काम करना Performance के रूप में ठीक हो जाता है, कर लेता है। लेकिन इससे परिणाम नहीं मिलता है। अकेले जितना करे, उससे ज्‍यादा टीम से बहुत परिणाम मिलता है, बहुत परिणाम मिलता है। टीम की ताकत बहुत होती है। कंधे से कंधा मिला करके जैसे department की सफलताएं साथियों के साथ करना जरूरी है, वैसे राष्‍ट्र के निर्माण के लिए department to department कंधे से कंधे मिलना बहुत जरूरी है। अगर silo न होता तो अदालतों में हमारी सरकार के इतने cases न होते। एक department दूसरे department के साथ Supreme Court में लड़ रहा है, क्‍यों। इस department को लगता है मेरा सही है, दूसरे department को लगता है मेरा सही है, अब Supreme Court तय करेगी ये दोनों departments ठीक हैं कि नहीं हैं। ये इसलिए नहीं हुआ कि कोई किसी को परास्‍त करना चाहता था, वहां बैठा हुआ अफसर को किसी से झगड़ा था, क्‍योंकि ये केस चलता हो गया, चार अफसर उसके बाद तो बदल चुके होंगे। लेकिन क्‍योंकि silo में काम करने के कारण और को समझने का अवसर नहीं मिलता हैं। पिछले दिनों जो ये ग्रुप बना, इसका सबसे बड़ा फायदा ये हुआ है, उस department के अफसर उसमें नहीं थे, और जो अफसर मुझे मिले में उनसे पूछता था, मैं सिर्फ बातों को ऐसे official तरीके से काम करना मुझे आता भी नहीं है। भगवान बचाए, मुझे सीखना भी नहीं है। लेकिन मैं बातें भोजन के लिए सब अफसरों के साथ बैठता था, मैं उसमें बड़ा आग्रह रखता था कि मेरे टेबल पर कौन आए हैं। मैं सुझाव देता था और फिर मैं उनको पूछता था ये तो ठीक है आपने रिपोर्ट-विपोर्ट बनाया। लेकिन आप बैठते थे तो क्‍या लगता? अधिकतम लोगों ने ये कहा कि साहब हम एक batch mate रहे हैं लेकिन सालों से अलग-अलग काम करते पता ही नहीं था कि मेरे batch mate में इतना ताकत है इतना talent है। बोले तो ये बैठे तो पता चला। हमें पता भी नहीं था कि मेरे इस साथी में इस प्रकार की extra ordinary energy है। बोले साथ बैठे तो पता चला। हमें ये भी पता नहीं कि था कि उसको समोसा पंसद है कि पकौड़ा पंसद है। साथ बैठे तो पता चला कि उसको समोसा पसंद है तो हम अगली मीटिंग में कहते कि यार तुम उसके लिए समोसा ले आना। चीजें छोटी होती हैं, लेकिन टीम बनाने के लिए बहुत आवश्‍यक होती हैं।


ये दायरो को तोड़ करके, बंधनों को छोड़ करके, टीम के रूप में बैठते हैं तो ताकत बहुत बन जाती हैं। कभी-कभार department में एक से ज्‍यादा जोड़ दें तो दो हो जाते हैं लेकिन एक department एक के साथ एक मिल जाता है तो ग्‍यारह हो जाते हैं। टीम की अपनी ताकत है, आप अकेले खाने के लिए खाने बैठे हैं तो कोई आग्रह करेगा तो एकाध दो रोटी ज्‍यादा खाएंगे लेकिन छह दोस्‍त खाना खा रहे हैं तो पता तक नहीं चलता तीन-चार रोटी ऐसे ही पेट में चली जाती हैं, टीम का एक माहौल होता है। आवश्‍यकता है कि हमें टीम के रूप में silo से बाहर निकल करके समस्‍या हैं तो अपने साथी को सीधा फोन करके क्‍यों न पूछें। उसके चैम्‍बर में क्‍यों न चले जाएं। वो मेरे से जूनियर होगा तो भी चले जाओ अरे भाई क्‍या बात है फाइल तुम्‍हारे यहां सात दिन से आई है, तुम देखो जरा noting करते हो तो जरा ये चीजें ध्‍यान रखो ।


आप देखिए चीजें गति बन जाएगी। और इसलिए reform to transform, ये जो मैं मंत्र ले करके चल रहा हूं, लेकिन ये बात सही है कि reform से transform होता है, ऐसा नहीं है। Reform to perform to transform, perform वाली बात जब तक हमारे, और वो हमारे बस में है। और इसलिए हम लोगों के लिए, हम वो लोग हैं जिनके लिए Reform to perform to transform, ये perform करना हमारे लिए, मैं नहीं मानता हूं आज vision में कोई कमी है, दिशा में कोई कमी है। दो साल हुए इस सरकार की किसी नीति गलत होने का अभी तक कोई आरोप नहीं लगा है। किसी ने उस पर कोई ये चुनौती नहीं की है, ज्‍यादा से ज्‍यादा ये हुआ भई गति तेज नहीं है, कोई ये शिकायत करता है। कोई कहता है impact नहीं आ रहा है। कोई कहता है परिणाम नहीं दिखता है। कोई ये नहीं कहता है गलत कर रहे हो। मतलब ये हुआ कि जो आलोचना होती है उस आलोचना को गले लगा करके हमने perform को हम कैसे बढ़ोतरी बना सकें ताकि हमारा transform संकल्‍प है, वो पूरा हो सके।


Reform कोई कठिन काम नहीं है, कठिन अगर है तो perform है। और perform हो गया तो transform के लिए कोई नाप पट्टी ले करके बैठना नहीं पड़ता है, अपने-आप नजर आता है यहां transformation हो रहा है। और मैं देख रहा हूं कि बदलाव आ रहा है। आज समय-सीमा में सरकार काम करने की आदत बनी है। हर चीज मोबाइल फोन पर, app पर monitor होने लगी है। ये अपने-आप में अच्‍छी चीजें आपने स्‍वीकार की हैं, ये थोपी नहीं गई हैं। Department ने खुद ने तय किया है, इतने दिन में ये करेंगे, इतने दिन में करेंगे। हम इतनी solar energy करेंगे, हम इतना पानी पहुंचाएंगे, हम इतनी बिजली पहुंचाएंगे, हम इतने जन-धन एकाउंट खोलेंगे, आपने तय किया है, आप पर थोपा नहीं गया है।


और जो आपने तय किया है वो भी इतना ताकतवार है, इतना प्रेरक है कि मैं मानता हूं देश को कोई कमी नहीं रह सकती है, हम perform करके दिखा दें बस। और मुझे विश्‍वास है कि ऐसी टीम मिलना बहुत मुश्किल होता है। मैं बहुत भाग्‍यशाली हूं कि मुझे ऐसी अनुभवी ऐसी टीम मिली है। देश भर में फैले हुए ऊर्जावान नौजवान व्‍यवस्‍था में आ रहे हैं। वे भी पूरी ताकत से कर रहे हैं। हर किसी को लगता है गांव के जीवन को बदलना है।


पिछली बार मैंने आप सबों से कहा था कि बहुत साल हो गए होंगे तो एक बारी जहां पहले duty किया था वहां हो आइए न क्‍या हुआ। और सभी अफसर गए हैं और उनका जो अनुभव हैं बड़े प्रेरक हैं। कुछ नहीं कहना पड़ा, वो देख करके आया कि मैं आज से 30 साल पर जहां पहली job की थी, पहली बार मेरी duty लगी थी, आज 30 साल के बाद वहां गया, मैं तो बहुत बदल चुका, कहां से कहां पहुंच गया, लेकिन जिन्‍हें छोड़ करके आया था वहीं का वहीं रह गया। ये सोच अपने-आप में मुझे कुछ कर गुजरने की ताकत दे देती है। किसी के भाषण की जरूरत नहीं पड़ती है, किसी किताब से कोई सुवाक्‍यों की जरूरत नहीं पड़ती है, अपने-आप प्रेरणा मिलती है। ये ही तो जगह है, 30 साल पहले मैं इसी गांव में रहा था? इसी दफ्तर में रहा था? ये ही लोगों का हाल था? मैं वहां पहुंच गया, वो यहीं रह गए, मेरी तो यात्रा चल पड़ी उनकी नहीं चल पड़ी। ये सोच अगर मन में रहती है, उन लोगों को याद कीजिए जहां से आपने अपने carrier की शुरूआत की थी। उस इलाके को याद करिए, उन लोगों को याद कीजिए, आप देखिए आपको लगेगा कि अब तो निवृत्ति का समय भले ही दो, चार, पांच साल में आने वाला हो लेकिन कुछ करके जाना है। ये कुछ करके जाना है, वो ही तो सबसे बड़ी ताकत आती है और वो ही तो देश को एक नई शक्ति देती है। और मुझे विश्‍वास है इस टीम के द्वारा और वैश्विक परिवेश में काम करना है। अब हम न department silo में रह सकता है न देश silo में रह सकता है। Inter-dependent world बन चुका है। और इसलिए हम लोगों को उसमें अपने-आपको भी जोड़ना पड़ेगा। हर बदलती हुई परिस्थिति को चुनौती के रूप में स्‍वीकार करते हुए, अवसर में पलटते हुए काम करने का संकल्‍प करें।


मनरेगा में इतना पैसा जाता है। मैं जानता हूं सूखे की स्थिति है, पानी की कमी है, लेकिन ये भी तो है कि अगला वर्ष अच्‍छी वर्षा का वर्ष आ रहा है, ऐसा अनुमान किया गया है तो मेरे पास अप्रैल, मई, जून जितना भी समय बचा है, क्‍या मैं मनरेगा के पैसों से जल संचय का एक सफल अभियान चला सकता हूं? अगर आज पानी संचय की मेरी इतनी व्‍यवस्‍था है तो desilting करके, नए तालाब खोद करके, नए canal साफ कर-करके, मैं पूरी व्‍यवस्‍था से इस शक्ति का उपयोग जल संचय में करूं, हो सकता है बारिश कम भी आ जाए तो भी गुजारा करने के लिए काम आ आती है। मैं मानता हूं कि बहुत बड़ी ताकत है और जन भागीदारी से सब संभव है, सब संभव है। इन चीजों को हम करने का संकल्‍प ले करके चलें।


जिन जिलों ने ये जो सफलता पाई उन जिलों की टीमों को मैं हृदय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं और मैं देश भर के जिलों के अधिकारियों से आग्रह करुंगा कि अब जिले की हर टीम ने कहीं न कहीं participation करना चाहिए। कुछ ही लोग participation करें ऐसा नहीं, आप भी इस competition में आइए, आप भी अपने जिले में सपनों के अनुकूल कोई चीज कर करके जाने का संकल्‍प करें। इसी एक अपेक्षा के साथ आप सबको Civil Service Day पर हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं। आपने जो किया है देश उसके लिए गर्व करता है, आप बहुत कुछ कर पाएंगे, देश सीना तान करके आगे बढ़ेगा, इस विश्‍वास के साथ बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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एट्रोसिटी केस दाखल केल्याचे फायदे

9:03:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

 महाराष्ट्र राज्यात एट्रोसिटी दाखल केल्यावर मिळणारे फायदे 

  • सरकारी नोकरी
  • 3 महिन्याचे राशन
  • पेन्शन 
  • मुलांचे शिक्षणाचे खर्च
  • सरकारी नोकरी
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांनी महाड, रायगड येथे ‘अनुसूचित जाती व अनुसूचित जमाती (अत्याचार प्रतिबंध) अधिनियम 1989 (सुधारित अधिनियम 2015)' अंतर्गत बाधित कुटुंबांतील वारसांना शासकीय नोकरीत थेट नियुक्तीपत्रांचे वितरण केले.

शासकीय नोकरीतील लाभार्थी :-
  • अनुष्का शिंदे
  • सारिका बनसोडे
  • पूनम जाधव
  • पूजा म्हस्के
  • धीरज पवार
  • योगिता जाधव
  • समीर गांगुर्डे 
  • सीमा बेतालजी
  • मनोज साळवे

पालकमंत्री डॉ. पंकज भोयर यांच्याहस्ते नियुक्ती आदेश

वर्धा जिल्ह्यातील अनुसूचित जाती जमाती अत्याचार प्रतिबंधक कायद्यान्वये ॲट्रॉसिटी ॲक्ट अंतर्गत खुन प्रकरणाच्या पिडीत कुटुंबातील सदस्यांना शासकीय नोकरी देण्याचे धोरण महाराष्ट्र शासनाच्या सामाजिक न्याय व विशेष सहाय्य विभागाचे आहे. महाराष्ट्र शासनाने 20 नोव्हेंबर 2025 रोजी शासन निर्णय काढला.
त्यानंतर महाड जिल्हा रायगड येथे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाठ, केंद्रीय सामाजिक न्याय राज्यमंत्री रामदास आठवले, सामाजिक न्याय व विशेष सहाय्य विभागाचे प्रधान सचिव हर्षदीप कांबळे, समाज कल्याणच्या आयुक्त दीपा मुधोळ मुंडे यांच्या हस्ते व उपस्थितीमध्ये 100 कुटुंबीयांना शासकीय नोकरीचे आदेश वितरित करण्यात आले होते व उर्वरित खून प्रकरणात उध्वस्त पिडीताना त्यांच्या जिल्ह्यामध्ये नोकरीच्या आदेश देण्यात येईल असे आश्वासित करण्यात आले होते. त्या अनुषंगाने वर्धा जिल्ह्यामध्ये पालकमंत्री यांच्या उपस्थितीमध्ये ३० कुटुंबीयांना शासकीय नोकरीच्या आदेश देण्यात आले. त्यानुसार रिक्त जागांची उपलब्धता आणि लाभार्थी उमेदवारांच्या पात्रतेनुसार जिल्ह्यातील अनुसूचित जाती कुटुंबातील 8 उमेदवारांना पालकमंत्री डॉ.पंकज भोयर यांच्याहस्ते शासकीय नोकरीचे नियुक्ती आदेश देण्यात आले. जिल्ह्यात पात्र 30 उमेदवारांपैकी काही नियुक्त्या इतर जिल्ह्यात देण्यात आल्या आहे.

जिल्हाधिकारी कार्यालयाच्या सभागृहात नियुक्ती आदेश वितरणाचा कार्यक्रम आयोजित करण्यात आला होता. यावेळी जिल्हाधिकारी वान्मथी सी, अतिरिक्त जिल्हाधिकारी संजय तेली, समाजकल्याणचे सहाय्यक आयुक्त अंकेश केदार, आदिवासी विकास विभागाच्या प्रकल्प अधिकारी गितांजली निकम, जिल्हा माहिती अधिकारी मंगेश वरकड, सालोडचे उपसरपंच आशिष कुचेवार आदी उपस्थित होते.

आधार हरवलेल्या कुटुंबाला धीर देण्याचा प्रयत्न - डॉ.पंकज भोयर
  • अनुसूचित जाती जमाती अत्याचार प्रतिबंधक कायद्यान्वये पिडीत व्यक्तीस 1 ते 8 लाख रुपयांपर्यंत प्रकरणपरत्वे मदत दिली जाते.
  • अनुसूचित जाती जमाती या घटकातील ज्या कुटुंबात खुनासारखा गंभीर प्रकार घडलेला असतो, अशा कुटुंबातील पात्र व्यक्तीस शासकीय नोकरी देण्यात येते. 
घरातील कर्ता पुरुष गेल्यानंतर कुटुंब वाऱ्यावर न सोडता त्या कुटुंबाला दिलासा देण्यासाठी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यांनी हा महत्वपुर्ण निर्णय घेतला असल्याचे पालकमंत्री डॉ.पंकज भोयर यावेळी म्हणाले. जिल्ह्यात 30 कुटुंबातील उमेदवार नोकरी मिळविण्यास पात्र आहे. यापैकी 8 उमेदवारांना वर्धा जिल्ह्यात तर चंद्रपुर 2, गडचिरोली 7, भंडारा 1, नागपूर 1 याप्रमाणे नियुक्ती देण्यात आल्या आहे. 11 कुटुंब अनुसूचित जमातीतील असल्याने या उमेदवारांना आदिवासी विकास विभागाच्यावतीने नियुक्त्या देण्यात येणार असल्याचे पालकमंत्र्यांनी सांगितले.

नियुक्त्या देण्यात आलेल्या 8 उमेदवारांमध्ये 
  • पुजा आनंदराव रनधिर
  • राहुल ज्ञानेश्वर वाहने
  • निलेश वसंतराव हातमोडे
  • स्वप्नील सुरेश ओंकार
  • प्रगती गजानन देवतळे
  • विकास दौलतराव शंभरकर,
  • शुभम रमेश घोरपडे,
  • मन्टी अशोकराव तायवाडे या उमेदवारांचा समावेश आहे. समाजकल्याणच्या निवासी शाळा, वसतीगृहांमध्ये वेगवेगळ्या पदांवर हे उमेदवार कार्यरत राहणार आहे. कार्यक्रमाचे प्रास्ताविक सहाय्यक आयुक्त अंकेश केदार यांनी केले. संचलन समाजकल्याण निरिक्षक शरद निबुदे यांनी केले.


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राजकीय पार्टियों के निशान की राजनीति

8:53:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses


 आखिर क्यों ?


कांग्रेस के निशान पंजे में स्वस्तिक भी था । 


अली का पंजा आलीशान, इंदिरा जी का यही निशान यह नारा शायद भारत की होशियार जनता भूल चुकी है ! 


बैल जोड़ी, गाय बछड़ा यह भी कांग्रेस का चुनाव चिन्ह रह चुका है । फिर अल्पसंख्यकों को बुरा न लगे इसलिए बैल गाय बछड़े खूब कटते रहे। 


भारतीय चुनाव आयोग के जनप्रतिनिधि अधिनियम के नियमों के अनुसार शरीर का अंग कभी चुनाव चिन्ह नहीं हो सकता है।


भाजपा का चुनाव चिन्ह दीपक, हलधर किसान, फिर कमल ! 


पार्टियों को चुनाव चिन्ह निर्वाचन आयोग देता है। किसी सलाहकार ने हिंदुओं को बेवकूफ बनाने के लिए इंदिरा गांधी को यह थ्योरी बताई कि कह दीजिए देवरहा बाबा / कांची कामकोटि के शंकराचार्य से यह पंजा निशान आशीर्वाद में मिला है।


फॉरवर्ड ब्लॉक के रूईकर गुट का चुनाव चिन्ह हाथ का पंजा रह चुका है। बाबासाहेब आंबेडकर जी की पार्टी शैडयूल्ड कास्ट फेडरेशन का चुनाव चिन्ह हाथी रह चुका है, निर्वाचन आयोग ने बाद में हाथी बसपा को दे दिया। 


विश्वजीत सिंह

चुनाव विश्लेषक, अभ्यासक


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बंदर के लिए शोकसभा : विश्वजीत सिंह

10:07:00 AM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

यह कल ही की घटना है, मुझे निंद नहीं आई, दुख जताए भी तो किसे, इतनी आत्मीयता जब प्राणियों में ही नहीं रही तो इंसानों में तो बहुत दूर है।

दोपहर में खिड़की से देखा एक बड़ा बंदर, वह तो बंदरिया थी, वानर जैसे उसके साथ कुछ बच्चे बंदर भी थे। वे हमारे कृष्णा हेरिटेज अपार्टमेंट में आए थे। इस तपती गर्मी की दुपहरी में जंगलों से प्राणियों का शहर की ओर आना यह अब आम बात हो गई है। हुप हुप की आवाज से इमली के बड़े पेड़ पर बंदर खेलकूद कर रहे थे। पेड़ के नीचे कुत्ते जमा होकर बंदरों पर भौंक रहे थे।

मैने देखा घर के बच्चे फ्लैट की बालकनी से यह दृश्य मजे लेकर देख रहे है । फिर कुछ ही देर में जोर की आवाज आई देखा ब्लास्ट हुआ है। बड़ी चिंगारी निकली है। मैं दौड़ा दौड़ा भागा भागा फ्लैट की बालकनी में आया, जोर से एक आवाज दी, 

कल्पेश !

कल्पेश !

कल्पेश यह गरीब बहुजन समाज से ताल्लुख रखता हुआ लड़का है जो ठेकेदारी में रेलवे में सैंडबॉय का काम करता है। मालगाड़ी के इंजिन में रेत डालने का काम करता है। 

वह दौड़ा दौड़ा रेल्वे ट्रैक पर आया। एक मालगाड़ी खड़ी थी। उसमें उसने रेत भर दिया था। उसने मेरे आवाज के जवाब में आवाज लगाई। भईया आया। 

भईया बोलिए।

मैने उससे बालकनी से ही पूछा यह ब्लास्ट जैसी आवाज ? उसने कहा एक बंदर करंट लगकर मर गया है।

मैं दौड़ा दौड़ा फ्लैट से नीचे की ओर भागा। सैंड पॉइंट पर पहुंचकर कल्पेश को बोला कहां हुआ है यह ब्लास्ट। उसे साथ चलकर वह जगह दिखाने के लिए कहा। 

वह रेलवे ट्रैक पर चलने लगा। बोला भैया छोड़ो ये बंदरों में कहां पड़ रहे हो। मैने कहां भाई ये गर्मी का समय है, शायद दाना पानी के लिए ये प्राणी यहां आए हो। उनके पीछे कुत्ते पड़ गए और यह बंदर कुत्तों से बचने के लिए इलेक्ट्रिक के हाय टेंशन पोल पर चढ़ गया। और इसी दौरान एक ही सेकंड में शायद उसे भी पता न हो इलेक्ट्रिक सर्किट के करंट लगने से उसका पूरा शरीर, उसमें का खून जलकर काला पड़ गया। और वहां से वह नीचे गिरा। अमूमन बंदर तारो पर चिपक जाया करते है। यह तो नीचे गिरा।



मैं वहां उस जगह पहुंचा तो देखा कि इतने कम समय में कुछ कुत्ते उस बंदर के शरीर को नोच रहे है। किसीने पैर के पास तो किसी ने पूछ को नोचना शुरू कर दिया है। मैने पत्थर उठाया और कुत्तों को भगाया। फिर वही उसके पास बैठ गया । इस विचार में की इसकी मौत कैसे हुई होगी। घटनाक्रम घूम रहा था। मैं वही बैठा रहा। मेरे घर से छोटे भाई की बच्ची भी वहां मुझे बड़े पापा कहती हुई आ गई। और देखकर रोने लगी। बच्चों को दुख ज्यादा होता है। कल्पेश कहने लगा भैया बच्चों को रात में नींद नहीं आएगी। बच्चे डर जाएंगे। 

मैने कहां सच्चाई उन्हें भी जानने दीजिए, शायद बड़े होकर वे इतने समझदार बन जाएं कि उन्हें यह घटना आम न लगे।

मैं करीब डेढ़ घंटे वही जगह पर फोन लगाता रहा की नगर पंचायत की गाड़ी आ जाएं जिससे उस बंदर की लाश का यथोचित सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हो जाएं। अनेक लोगों को फोन लगाया। उन्हें घटना के फोटो व्हाट्सएप पर भेजे। पर कोई सहायता नहीं मिली। इसमें बहुत समय गुजर गया। संध्या होने लगी। अब इस स्थिति में समझ में आया कि प्राणियों की मौत इंसानों के लिए कोई महत्व नहीं रखती। 

दुख तो इस बात का था कि वह बंदर किसी के परिवार का हिस्सा था। कुछ दिनों पहले हमने रामनवमी, फिर हनुमान जयंती बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई। सुंदरकांड भी पढ़ा, और १३ अप्रैल को यह घटना हो गई।

मुझे लगा कि बाकी के बंदर कहां चले गए। एक बंदर मर गया उसके आसपास बंदर आने चाहिए। बंदरों ने गोला करना चाहिए। आसपास एक भी बंदर नहीं मिला। शायद डर से उस बंदर को छोड़कर भाग गए। प्रायः अपनो के बिछड़ने का दुख प्राणियों में ज्यादा देखा जाता है। पक्षी हो या प्राणी दुख तो होता ही है। कौओं को देखा है दुखी होकर सभा करते हुए। 

जब बंदर का परिवार उस बंदर को अपने बीच नहीं पाएगा तो क्या वे उसे ढूंढेंगे? बंदर की माताजी का दुख यह मै सोच कर ही दुखी हो जाता हूं। पता नहीं वह बंदर कितनों को अनाथ कर गया।

क्या इंसानों की तरह प्राणियों में भी आत्मीयता की कमी हो गईं है?

भाई की छोटी बच्ची ने कहा बड़े पापा अब तो हम बर्थडे भी नहीं मना सकते । उसके पिताजी का जन्मदिन था।

रेलवे की तारों से लगकर यह बंदर मरा है। ऐसे न जाने कितने प्राणी, पक्षी अपने परिवार को खो देते है। अब इसके समुचित अन्तिम संस्कार की व्यवस्था कौन करेगा ? यह रेलवे का मामला है कोई इसमें पड़ना नहीं चाहता। न स्थानिक पुलिस और न नगर पंचायत और न ही वन विभाग के अधिकारी। 

इसी जद्दोजहद में बहुत देर हो गई। आखिर नमक, भगवा कपड़ा और पूजा सामग्री लेकर गड्ढा खोदा गया। उसी में एक बोतल पानी से बंदर के मुंह पर पानी डाला गया। भगवे कपड़े में लपेटकर उस बंदर को गड्ढे में रखा गया। उसपर मिट्टी डाली गई। 


मुझे रातभर नींद नहीं आई। बार बार उसी बंदर का ख्याल। दुख तो उसके परिवार को भी हुआ होगा। 

अब रातभर विचार करके यह निश्चय किया है कि इस दुख के लिए शोकसभा रखी जाएं उसमें वन विभाग, नगर प्रशासन, नागरिक प्रतिनिधि और रेलवे के अधिकारियों को भी बुलाया जाएं। 

क्या पता इस शोकसभा से खोई हुई आत्मीयता लौट आएं।



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नागपूरचं भाऊ : सुनील किटकरू

12:51:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

 



नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी 

फिकी पडे वाळवंटी सफारी l 


 माणूस वऱ्हाडी काय त्याचा रुबाब 

रणरणत्या झळात बी चहाची वाफ 

 पुरणपोळी तूप त्याची न्याहारी 

 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


देतो ताणून थंड कुलरच्या हवेत 

 आग ओकणाऱ्याला नाही भाव देत 

 वाघासारखी फिरण्याची हौस न्यारी

 नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


सपन सरता ताटात दिसे खिचडी 

 भाजी वांग्याची अन मिरची बेगडी 

दूध ताकांनी पळवतो उन्हाळी 

नागपूरचं भाऊ ऊन लई भारी l


फिकी पडे वाळवंटी सफारी

नागपूरच भाऊ ऊन लई भारी l

जसा कोकणाला हापूस तारी 

नागपूरची भाऊ संत्री लई भारी l

             - सुनील किटकरु



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बालक केशव हेडगेवार का वंदेमातरम असहयोग आंदोलन

2:50:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

वंदे मातरम् आंदोलन

सन 1907 के मध्य में विद्यालय निरीक्षक प्रतिवर्ष की भांति स्कूल का निरीक्षण करने नील सिटी स्कूल आए थे। जैसे ही निरीक्षक केशव हेडगेवार की कक्षा में गए, सभी छात्रों ने उठकर एक साथ 'वंदे मातरम्' की जोरदार घोषणा से उनका स्वागत किया और प्रत्येक कक्षा में इसकी पुनरावृत्ति होती रही। केशव के सहपाठी गोविंद गणेश आवदे ने इस घटना का वर्णन करते हुए लिखा- 'गुस्से से लाल-पीले होकर विद्यालय निरीक्षक प्रधानाध्यापक जनार्दन विनायक ओक के कमरे में आ गए और बिना बात किए सीधे चले गए। इसके तुरंत बाद उन्होंने विद्यालय प्रबंध समिति के चेयरमैन सर विपिन कृष्ण बोस को पत्र लिखकर दोषी छात्रों को 'अनुशासनहीनता' के लिए अविलंब सजा देने की मांग की।' स्कूल के अधिकारियों को इसका तनिक भी भान नहीं था कि छात्रों के बीच जबर्दस्त राजनीतिक ध्रुवीकरण हो चुका है। केशव ने आरंभ से अंत तक की योजना अत्यंत ही गोपनीय तरीके से बना रखी थी। विद्यालय प्रबंध समिति के निर्णय के विरुद्ध स्कूल के सभी दो हजार छात्र अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। हड़ताल दो महीने तक चलती रही। इस हड़ताल में नागपुर का मारिस कालेज भी शामिल हो गया। केशव के नेतृत्व में जुलूस, प्रभात फेरी इत्यादि आम बात बन गई। अंततः अच्युतराव कोल्हटकर की मध्यस्थता से स्कूल खुला। छात्रों ने समझाने-बुझाने तथा अपने माता-पिता एवं शिक्षकों के दबाव में माफी माग ली। परंतु अकेले केशव ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया। उन्होंने भरी सभा में कहा: "अगर मातृभूमि की आराधना अपराध है तो मैं यह अपराध एक नहीं, अनगिनत बार करूंगा और इसके लिए मिलने वाली सजा को भी सहर्ष स्वीकार करूंगा।' फलतः सितंबर माह में केशव को विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया। केशव ने इसे देशभक्ति का प्रसाद समझकर सहर्ष स्वीकार कर लिया। नागपुर में वह लोकप्रिय युवा नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए।



असहयोग आंदोलन 

इस आंदोलन में डॉ. हेडगेवार का योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होंने गांव-गांव जाकर भाषण दिया और लोगों को जागृत किया। इस पर अंग्रेज सरकार ने उन पर राजद्रोह (sedition) का अनुसार, आमतौर पर नेता लोग कोई बचाव नहीं मुकदमा चलाया। तब आंदोलन के नियम करते थे, सजा भुगतना ही अपना बयान होता था। लेकिन डॉक्टर हेडगेवार ने तय किया कि मैं कोर्ट में डिफेन्स दूंगा, क्योंकि वह भी मेरा एक भाषण ही होगा।" उस समय अदालत में जनता और पत्रकार मौजूद रहते थे, तो उन्हें अपना संदेश फैलाने का उन्होंने न्यायाधीश से सीधे पूछा था, "न्यायाधीश एक और अवसर मिलना था। अपने मुकदमे में महोदय, यह बताइए कि किस क़ानून के तहत अंग्रेज लोग यहां आकर भारत पर राज्य कर रहे हैं? स्वतंत्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है - यह सारी दुनिया मानती है। तो क्या कोई कानून है जिसके आधार पर अंग्रेज हम पर राज कर रहे हैं? नहीं है! इसलिए अंग्रेजों का राज्य ही गैर-क़ानूनी है। आपका कोर्ट भी गैर-कानूनी है। आप तो गैरकानूनी जज हैं-मैं आपके अधिकार को मानता ही नहीं!" उन्होंने कहा- "मैंने केवल देशवासियों को यही बताया कि स्वतंत्र होना हमारा अधिकार है। और स्वतंत्र कैसे होना है, यह भी समझाया। मैंने कोई अपराध नहीं किया। और अगर आपने इसे अपराध माना भी, तो आपमें मुझे सजा देने का अधिकार नहीं है क्योंकि मैं आपकी अदालत को मान्यता नहीं देता।" इस पर उन्हें एक साल के सश्रम कारावास की सजा हुई। सजा सुनाते हुए मैजिस्ट्रेट ने टिप्पणी लिखी - अंग्रेजी में जिसे Obiter Dicta कहते है कि "जिन भड़काऊ भाषणों के कारण इन पर अभियोग लगाया गया है, उनसे अधिक विद्रोहपूर्ण तो इनका बचाव में दिया गया जवाब है।"


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नागपूर दंगल रिपोर्ट: भारतीय विचार मंच, नागपूर

3:11:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

    


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नागपुर ने अनेक दुर्घटनाएँ देखी है, क्या इसमें मृत नागरिकों का दोष है ?

1:05:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

संध्या के समय ठाकुर साहब ने हेलमेट पहनकर सभी कागज पत्र ओके वाली दोपहिया गाड़ी नागपुर की सड़क पर चलाईकिसी अज्ञात ने ठाकुर साहब के वाहन को टक्कर मार दीठाकुर साहब जगह पर ही मर गए ! इसमें क्या ठाकुर साहब की गलती है ?



नागपुर शहर में पिछले २ महीने से हो रही 212 से भी ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं में 73 लोगो ने जीवन गंवाया है। इसमें कुछ ही मामलों में दोषियों पर पुलिस द्वारा कार्यवाही की गईबाकी अन्य में अज्ञात व्यक्ति के नाम पर दुर्घटनाओं के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। दुर्घटना में लिप्त व्यक्तियों की जांच कर अब तक अपराधियों पर कार्यवाही न करना पुलिस की कार्यप्रणाली पर ही शंका उत्पन्न करता है। नागपुर शहर के सर्वाधिक सुरक्षित शासकीय कार्यालयों से युक्त क्षेत्र जिला न्यायालयजिलाधिकारी कार्यालयआकाशवाणी के मार्ग पर दिनांक 18 फरवरी 2024 को संध्या के समय समाजसेवी श्री शिवबहादुर सिंह ठाकुर की दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनका भरा पूरा शोकाकुल  परिवार अब भी सदमे में है। महीना बीत जाने के उपरांत भी उनके वाहन को टक्कर मारनेवाली कार एवम दोपहिया वाहन बाइक की अब तक पहचान न होनापुलिस की जांच प्रणालीलेटलतीफी पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित करता है। सात वर्ष पहले वर्ष 2016 में नागपुर शहर को केंद्र सरकार द्वारा तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस के कार्यकाल में कुल 3,303 करोड़ रुपए की लागत से स्मार्ट सिटी शहरी विकास योजना के अंतर्गत शहर में 3700 सीसीटीवी कैमरे 524 करोड़ रुपए खर्च कर लगाए गए थेजिनकी देखरेख L&T कंपनी करती हैपरंतु दुर्घटना का एक भी CCTV फुटेज प्राप्त न होना यह भी नागरिक सुरक्षा को लेकर व्यवस्था पर प्रश्न उपस्थित करता है। नागपुर शहर को 2020 में सेफ एवं स्मार्ट सिटी पुरस्कार मिला थापरंतु नागरिकों के लिए नागपुर शहर सुरक्षित नही है यह दुर्घटनाओं की संख्या को देखकर स्पष्ट होता है। दुर्घटना के कारणों की जांच करना एवं दोषियों पर कार्यवाही कर न्याय दिलाना पुलिस प्रशासन का कर्तव्य होता हैपरंतु सामान्य नागरिकों के संबंध में पुलिस प्रशासन गंभीर नहीं है। वही गडकरी जी के बेटे या फडणवीस जी की बेटी की बात होतीया उनके माता-पिता की दुर्घटना की बात होती तो शायद दिन में ही जांच होकरअपराधियों की धरपकड़ कर कार्यवाही हो जाती।  प्रशासन नागरिकों के लिए गंभीर नहीं है। समाजसेवी श्री शिवबहादुर सिंह ठाकुर जी की दुर्घटना में मृत्यु होने के कारणों का एक माह पश्चात भी पता नही चलनापुलिस की जांच पर ही सवालिया निशान लगाता है। शहर में विभिन्न जगहों पर नागपुर महानगर पालिका द्वारा ठेकेदारों के माध्यम से सीमेंट रोड के निर्माण कार्य शुरू हैउनमें से एक कार्य जिलाधिकारी कार्यालय के सामने से आकाशवाणी चौक होते हुए महाराजबाग तक शुरू हैइसके ठेकेदार ACEPL लिमिटेड कंपनी के श्री अभिषेक विजयवर्गीय हैइनकी जिम्मेदारी थी की रोड निर्माण के कार्यों में सुरक्षा नियमों का पालन कर बैरिकेड लगाकर समुचित व्यवस्था करें परंतु ठेकेदार की दोषपूर्ण निर्माण प्रणाली एवं कार्य के कारण दुर्घटना में जीवन गंवाने वाले शिवबहादुर सिंह ठाकुर जी के परिवार ने ठेकेदार कंपनी ACEPL लिमिटेड के संचालक अभिषेक विजयवर्गीय पर सदोष मनुष्यवध की कलम अंतर्गत कार्यवाही करने का निवेदन किया है। नागरिकों की सुरक्षा की दृष्टि से नागपुर शहर में पिछले महिनों में सड़क दुर्घटनाओं पर जान गंवाने वालों को भावपूर्ण श्रद्धांजलि देते हुए सभी केसेस की जांच के लिए SIT विशेष जांच दल गठित करने का सरकार से पत्रकार परिषद में निवेदन किया है। बड़े बड़े विकसित शहरों में जीवन को सबसे ज्यादा महत्व प्राप्त हैजब नागरिकों का जीवन ही सुरक्षित नही होगा तो जीवन के स्तर को सुधारने के लिए निर्मित सुख सुविधासंसाधन जैसे बड़े बड़े रास्तेब्रिजमेट्रो का औचित्य ही क्या रह जायेगाकरोड़ों रुपए खर्च कर बहुत बड़ी प्लानिंग नियोजन से सीमेंट रास्ते बनाएं जाते हैवे बनाते समय नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च रखते हुए पूर्ण किए जाएजिससे नागरिकों को तकलीफ न हो। और हां दुर्घटना के उपरांत पुलिस वाले दोषी को बचाने के लिए अज्ञात न लिखे। दुर्घटना में मृतक के परिवार को यह भी स्पष्ट बता दीजिए की सड़क दुर्घटनाओं के लिए जांच पुलिस नही कर सकती हैपुलिस आयुक्त के पास भी अनेकों कार्य होते है जैसे पुलिस क्रीड़ा में शामिल होनाबड़े बड़े कार्यक्रमों में भाषण देनाकिताब लिखनाशहर में किसी प्रमुख व्यक्ति के आने पर स्वागत के लिए Line Up में हाथ जोड़कर खड़े रहना और कहना स्मार्ट शहर नागपुर में स्वागत हैबंदोबस्त में कोई कमी हो तो आदेश करें। 

 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित रस्ता सुरक्षा समिति के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अभय सप्रे (सेवानिवृत्त) जी को भी निवेदन करते है की जनता को जनजागृति का बहाना बनाकर दोषियों को बचाने का प्रयास न करेंदुर्घटना हुई है तो कारण है, जिम्मेदार है । प्रशासन को अनुशासन की आवश्यकता हैजब भी प्रशासन ढीला रवैया अपनाता हैदुर्घटना होती है। दुर्घटना का आरोप किसी अज्ञात पर मढ़ना गैरजिम्मेदाराना हैइससे भ्रष्टाचार बढ़ता हैमासूम नागरिकों का जीवन बर्बाद हो जाता है।

 

नागपुर ने अनेक दुर्घटनाएँ देखी हैपुल गिर गयाक्या इसमें मृत नागरिकों का दोष है 

स्टार बस से दुर्घटना हुईक्या इसमें मृत नागरिकों का दोष है 

बिल्डर की बनाई हुई बिल्डिंग गिर गई क्या इसमें दबकर मरनेवाले नागरिकों का दोष है

पुलिस प्रशासन को स्पष्ट अनुशासन में रहकर नियमानुसार जांच करने का आदेशित करेंसमय के अधीन पुलिस प्रशासन जांच करेगा तो कोई चंद्रमामंगल ग्रह पर भी होगा नियमानुसार पकड़ा ही जाएगा।

 

गडकरी जी, फडणवीस जी जैसे कर्तृत्ववान व्यक्तिमत्व से प्रसिद्ध नागपुर नगरी के प्रशासनिक अधिकारियों एवं सरकारी कर्मचारियों को अनुशासन की आवश्यकता हैयह हमने स्व. शिवबहादुर सिंह ठाकुर जी की दुर्घटना में हुई दर्दनाक मृत्यु के उपरांत विभिन्न प्रशासनिक कार्यालयों में पदस्थ बैठे सरकारी अधिकारियों द्वारा नागरिकों के प्रति हो रहे दुर्व्यवहार को अनुभव कर समझा है।

 

प्रधान सेवक लिख लेने से गौरवान्वित महसूस करने वाले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में चल रही अमृतकाल की सरकार में प्रशासन पर पकड़ नहीं होना बहुत चिंताजनक है। जब सामान्य नागरिक किसी अधिकारी (सरकारी नौकर) के सामने खड़े रहता हैउस कार्य के लिए जिसकी  सरकारी नौकर को तनख्वाह मिलती हैवहां सभी मानव अधिकारमानवीय मूल्य और नैतिकता की गठरी की पोल खुल जाती है।

 

ठाकुर जी की मृत आत्मा को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि जिनके कारण हम प्रशासनिक नौकरों की संस्कृति से अवगत हो पाएं।

 

इंसान होने का हम कर्तव्य निभाएंगे,

न्याय के लिए अन्याय नहीं सहेंगे,

फिर आवाज उठाएंगे जब तक हम मर नहीं जाएंगे!



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शासकीय योजनेत घोटाळा करणारे बैंक अधिकारी विरोधात विदर्भ हैचरी असोसिएशन

2:35:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

 


  पंतप्रधान श्री नरेंद्र मोदीजींच्या सरकार मार्फत सर्वांसाठी विविध योजना राबविली जातात, शेतक-यांना, MSME लघु उद्योजकांना बैंक द्वारे विविध प्रकारचे कर्ज दिले जातात. काही वर्षा नंतर दैनिक पेपर, प्रेस माध्यमांमध्ये लोंकाना कळते कि योजनेत घोटळा झालेला आहे, घोटाळ्याची रक्कम 100 कोटी, 500 कोटी रुपयांच्या जवळपास असते. खुप वर्षानंतर त्याची चौकशी होते. ती चौकशी, कोर्टाची तारीख सुरुच राहते. पण घोटाळे होणे थांबत नाही. बैंक घोटाळ्यात बैंक अधिकारी, शाखा प्रबंधक, व मोठे बैंक अधिकारी यांचा पुर्णपणे सहभाग असतोच. महत्वाचे कि पोलिस यंत्रणा बैंक अधिकारींवर कार्यवाही लवकर करीत नाही.

 

          या संदर्भात हैचरी असोसिएशनला सदस्यांकडुन शासकीय योजने सबंधी नागपुर क्षेतातल्या राष्ट्रीयकृत बैंकेचे बैंक अधिकारी तर्फे दुर्व्यव्हारची मानसिक त्रास झाल्याची अनेक तक्रारी प्राप्त झाल्या आहेतसदस्यांमध्ये बैंक मैनेजरांच्या, बैंक अधिकारीच्या दुर्व्यव्हार बद्दल तीव्र संताप रोष निर्माण झालेला आहे. यावर मागील महिन्यात हैचरी असोसिएशनच्या सर्व सदस्य, पदाधिकारीनी बैंकाच्या दुर्व्यव्हारा विरोधात निर्दशन करुन आंदोलन सुद्धा केलेले आहे. देशाचे वित्तमंत्री व वित्त विभागांनाही प्रत्यक्ष निवेदन देऊन ही झाले पण हे बैंक मोठे वरिष्ठ बैंक अधिकारी आपल्या भ्रष्ट बैंक कर्मचारी विरोधात दंडात्मक कार्यवाही करित नाहीत. शासकीय योजनेच्या अमलबजावणीत कसुर करणा-या बैंक अधिकारीवर ही गुन्हे दाखल करुन कार्यवाही करावी. केंद्रिय वित्त राज्यमंत्री डाँ.श्री भागवत कराड साहेबांसोबत विदर्भ हैचरी असोसिएशन चे अध्यक्ष नितीन पानतावणे यांची बैठक नई दिल्ली येथे जुलै महिन्यात झाली. पंजाब नेशनल बैंक मानकापुर (नागपुर) येथिल बैंक शाखा प्रबंधक सी.पी करवाडे व बैंक अधिकारी राहुल गि-हे कडुन हैचरी उद्योजकांना अरेरावी भाषा वापरुन मानसिक व शाब्दिक त्रास देण्यात आले, अश्या बेजवाबदार बैंक अधिकारींवर कार्यवाही करुन त्यांना तात्काळ नौकरीतुन बर्खास्त करण्यात यावे, बैंक मैनेजरांना व कर्मचारींना नागरिकांसोबत सन्मानाने व्यव्हार करण्याची ताकिद देण्यात यावी अश्या प्रकारचे तक्रार निवेदन बैंकेचे चेयरमन श्री अतुल गोयल जी यांना ही देण्यात आले होते. तरिही बैंकेचे वरिष्ठ अधिकारी बैंक शाखा प्रबंधक सी.पी करवाडे व बैंक अधिकारी राहुल गि-हे यांच्यावर कार्यवाही न करता पाठिशी घालत आहे हे विदर्भ हैचरी असोसिएशनच्या निर्दशात दिसुन आले. सदर अधिकारी स्थानिक मराठी तरुण उद्योजकांना उडवाउडविची कारणे सांगुन दिशाभुल करतात, व काही उद्योजकांना अश्या ढिसाढ बैंक अधिकारी कडुन अपमानास्पद वागणुक मिळालेली आहे. बैंकाच्या दुर्व्यव्हारा व गैरव्यव्हारा विरोधात संताप व्यक्त करूण पंजाब नेशनल बैंक किंग्जवे नागपुर चे मुख्य क्षेत्रिय प्रबंघक श्री चतुर्वेदी यांन विदर्भ हैचरी असोसिएशन प्रतिनिधी मंडला तर्फे निवेदन देण्यात आले. विदर्भ हैचरी असोसिएशनचे सदस्य राहुल भोरकर (वाकी), विनोद मोहोड (हिंगणा), रविशंकर रंगारी (टेकेपार भंडारा), अभिजित ठाकुर (कलमेश्वर ब्राम्हणवाडा) सोबत नागपुर एक्शन ग्रुपचे अध्यक्ष विश्वजीत सिंह उपस्थित होते व विदर्भ हैचरी असोसिएशनचे अध्यक्ष नितीन पानतावणे यांनी नागपुर पोलिस अधिक्षक हर्ष पोद्दार यांना निवेदन देऊन नागपुरातील सर्व क्षेत्रिय कार्यालय असलेल्या बैंकाकडुन शासकीय योजनेत होणा-या घोटाळे ची चौकशी करण्यास विशेष निरीक्षण टीम ची स्थापना करुन चौकशी करण्याची मागणीचे निवेदन दिले.

 

घोटाळा करण्याचे कार्य एवढ सोपं सहज नाही, फक्त लोन घेणाराच फसतो. बैंक अधिकारीच्या सहभागा शिवाय शक्यच नाही. शासकीय योजनेत भ्रष्टाचार करणारी ही बैंक अधिकारी वर्ग वर गुन्हा दाखल करण्यास पोलिसांनी कसुर करु नये. 150 शेतक-याची फसवणुक बोल्ला सारखे बिल्ले ला दुधाचा अभिषेक व तुपाचा नैवेद्य लावणारे 103 कोटी रुपयाचे भ्रष्टाचाराचे हार घालुन बैंक घोटाळ्यात रिकार्ड मध्ये नागपुराची नोंद झालेली घटनेने प्रत्येक नागपुरकराचा मान शर्मेने घालवली आहे. वरिष्ठ शिस्त प्रिय केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी जी, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जी सारखे नेतृत्व करणारे नेते मंडळीच्या नाकाखाली बैंकेच्या माध्यमाने कोटी रपयाचे आर्थिक घोटाळे होत आहेत. या बैंक अधिकारीवर कोणाचा वचक नाही तर घोटाळे थांबणार याची शक्यता राहीली नाही.



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Growing Economic theft

8:09:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

 

In Indonesia, President Muhammad Suharto’s vast political and business operations flourished for thirty-two years during a reign made rich by a peculiar combination of repression, liberality, co-optation of different constituencies and mineral resources. Until he resigned unexpectedly in 1998 under the pressure of the Asian financial crisis, Suharto enjoyed enormous popular support, despite the harsh and heavy hand off his military on dissidents. A small elite group of business magnets, military officers, professional bureaucrats, and former journalists around the president’s office controlled access to petroleum resources and windfall rents from it while they managed an elaborate network of political patronage that dispensed favors to businesses and local leaders in carefully calibrated ways,

The Indonesian nation itself had been forged in 1949, not even two decades before Suharto came to power, after a small but determined armed struggle against Dutch colonial rule. It was a remarkable transition for a profoundly multicultural population spread out across an enormous archipelago of tens of thousands of islands. The newly formed country was characterized by a strong army, a politicized Islam, and centralized political power. It’s very identity was built around the motto, ‘unity in diversity’ which became the basis for a durable nationalist sentiment.

Suharto was an army officer under Sukarno, Indonesia’s first President. He came to prominence in 1965, when he led the military in a bloody purge of communist dissidents with the active support of the US government. After he formally took over the reins of government on March 11, 1966, he replaced military chiefs with loyalists, purged dissidents in the parliament, changed the educational system, positioned the military’s ruthless force to quell protests, invited foreign investors to extract the country’s rich oil and mineral resources and built a team of mostly Berkeley educated advisers to direct the regime’s economic policy. The government only gave limited voice for the opposition and was careful to distribute rewards widely to all those who participated in its formal structures, while threatening sanctions against those who opposed them.

In the course of three decades, Suharto stole as much as US $35 billion in public funds, but he also helped them economy grow sevenfold in real terms by creating enormous oil wealth that made many Indonesians rich, while carrying along a burgeoning middle class. All thought there is little evidence to show that returns to the economy were spread extensively, there is enough to inform us that money, political favors, and sweet deals were carefully dispensed to sustain a complex but tight web of military officers, legislators, advisers, political officials, and a global network of company executes, bankers and world leader. Each of these elite groups supported her through preferential deals and other forms of patronage, whose patterns were reproduced across scales all the way down to local gang leaders and thugs

The flow of information was also carefully controlled. The Indonesian press, had a glorious history of independent views dating back to the eighteen century, was mobilized to serve as a partner of the government, with editors receiving periodic telephone calls from the authorities on how to handle the news. Those papers that resisted the official line, like the newspaper Indonesia Raya, the news magazine Detik, and a few others, were banned, with some of their editors facing incarceration by the state as well as vilification by more pliant members of the forth estate, thereby breeding a culture of compliance and self-censorship.

By 1990, the Suharto family business was so big that any large project had to include one or the other of its many subgroups. It was even involved in the country’s poverty reduction efforts; the central government direct provided benefits to provinces and villages thought the “Inpres” or “Presidential Instructions” programs, which were executed at the discretion of the president and constituted a major portion of the country’s development budget. The government’s semi-authoritarian style meant that opposition was always circumscribed and co-opted by the regime, whereas any open rebellion was immediately crushed. But Suharto did not need to use violence to keep revolt in check. He relied on the elite’s fears of religious extremism and social disorder to constrain opposition, even while he pitted various factions that were loyal to him against each other.

As the epigraph suggests, Indonesian society under Suharto had somehow become distorted into bipolar stances that required radical adjustments be made to everyday life.  Either one blithely ignored the brutal police violence of the government and its suppression of human rights, or one found oneself in the extremely dangerous position of being a covert dissident, “an underground subversive”; there was no middle ground. For ordinary Indonesians, Suharto brought prosperity, for elites and the military, much more. Only those concerned with human rights and democracy were appalled at what was going on, but they too mostly kept their silence.

Throughout history, publics have been critical or uncritical partners in most political regime, often being misled into trusting their intentions and operations up with. The average person’s success or failure in life is deeply interlinked with how the economy as a whole performs, because everyone is codependent on a well-functioning “habits-forming” machine, which standardizes almost every element of human activity from education to work practice and home life.


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मजदुर की मज़बूरी

9:42:00 PM Reporter: Vishwajeet Singh 0 Responses

मां है रेशम के कारखाने में
बाप मसरूफ सूती मिल में है
कोख से मां की जब से निकला है
बच्चा खोली के काले दिल में है

जब यहाँ से निकल के जाएगा
कारखानों के काम आयेगा
अपने मजबूर पेट की खातिर
भूक सरमाये की बढ़ाएगा

हाथ सोने के फूल उगलेंगे
जिस्म चांदी का धन लुटाएगा
खिड़कियाँ होंगी बैंक की रौशन
खून इसका दिए जलायेगा

यह जो नन्हा है भोला भाला है
खूनीं सरमाये का निवाला है
पूछती है यह इसकी खामोशी
कोई मुझको बचाने वाला है!




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