सोमवार, 28 सितंबर 2026

विश्व के कल्याण का सदैव क्रियान्वयन करनेवाली भारतीय संस्कृति का एकात्म मानव दर्शन

 20वीं सदी के महान विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव दर्शन’ का विचार हमारे सामने रखा। उनका जीवनकाल 1916 से 1968 तक रहा।  वर्ष 1937 में अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक बने। 1951 में जनसंघ इस राजनैतिक दल के कार्यकर्ता बने। जीवन के अंतिम क्षण 1968 तक जनसंघ के समर्पित पदाधिकारी रहे। उनके कार्यकाल में ही जनसंघ ने अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त किया। 1980 में इसका रूपांतरण भारतीय जनता पक्ष में हुआ, जो आज केंद्र व कई राज्यों से सत्ता में है।

           पार्टी  में वे एक कुशल संगठक, मार्गदर्शक, दार्शनिक थे। वे कहते थे, “

भिन्न-भिन्न राजनीतिक पार्टियों का अपने लिए एक दर्शन, सिद्धांत या आदर्श या क्रमिक विकास करने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्हें कुछ स्वार्थों की पूर्ति के लिए एकत्र होने वाले लोगों का समुच्चय मात्र नहीं बनना चाहिए। उनका रूप किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या जॉइंट स्टॉक कंपनी से अलग होना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि पार्टी का दर्शन केवल पार्टी के घोषणा पत्र के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए। सदस्यों को उन्हें समझना चाहिए और उन्हें कार्यरूप में परिणाम करने के लिए निष्ठापूर्वक जुड़ जाना चाहिए।’’ (1) 
 अर्थात वे केवल सिद्धांत पर निर्भर न रहते हुए उसे धरातल पर उतारने वाले कर्मयोगी थे।

 

   एकात्म मानवदर्शन क्यो'?        

   23-24 जनवरी 1965 में जनसंघ के विजयवाड़ा में आयोजित अखिल भारतीय अधिवेशन में सिद्धांत और नीति प्रलेख, जो उन्होंने तैयार किया था, उसे अंतिम रूप दिया गया। इसी प्रलेख ने एकात्म मानव दर्शन  को जनसंघ दल का आधिकारिक विचार घोषित किया। इस दर्शन का दीनदयाल जी ने मुंबई में अपने चार-चार भाषणों में 22 से 25 अप्रैल 1965 पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया । एकात्म मानव दर्शन एक विचारधारा है, जिसमें मानव जाति के आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अंगों को दिशादर्शन करने की निश्चित रूप से क्षमता है।

       भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात इस पर विवाद चला कि अपने देश ने पूंजीवाद स्वीकारना चाहिए या समाजवाद, जो दोनों विचार यूरोप की भूमि का उपजे थे। भारत का उनसे कोई नाता नहीं था । वहाँ की परिस्थिति अनुरूप इन विचारधाराओं का जन्म हुआ था। दीनदयाल इस विचार को नकारते हुए कहते थे, ये दोनों विचार भौतिकवादी हैं। दोनों ही आचार आध्यात्मिकता का निषेध करते हैं।(2) ये विचारधारा मानव को व्यक्ति और समाज में बांटती है। व्यक्ति जीवन का विचार खंडित रूप से नही हो सकता, क्योंकि वह परिवार, समाज, सृष्टि और परमेष्ठी का संकलीत रूप है। इस शृंखला को तोड़कर सर्वांगीं विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। अर्थात ये सभी इकाइयां  परस्पर संबंधित और परस्परावलंबी हैं। इसलिए उन्होंने परस्पर पूरक रहना आवश्यक है।

    भारतीय परंपरा के अनुसार मानव एकात्म है, एकात्म यानी, जिस को बांटा नहीं जा सकता। न बांटे जाने वाली को इकाई को एकात्म कहते हैं। समाज और व्यक्ति इस प्रकार जुड़े हुए हैं, उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। मानव व्यक्ति के रूप में समाज का अभिन्न अंग है।(3) अर्थात मानव विकास की कल्पना टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, अपितु  समग्रता से करना चाहिए। यही आधार है एकात्म मानव दर्शन का। यह दर्शन हिंदू जीवन की वैश्विक दृष्टि को दर्शाता है। एकात्म मानव दर्शन  के मूलभूत सूत्र निम्नानुसार हैं वैश्विक एकात्मता, वैयक्तिक आत्मीयता से वैश्विक आत्मीयता तक उन्नयन, त्रिगुणात्मक, चतुर्विध मानवी व्यक्तित्व, पुरुषार्थ चतुष्टय, आदि.

 एकात्म मानव दर्शन के केंद्रभूत विचार इस तरह है।

 (अ) यह दर्शन भारतीय चिंतन का युगानुकूल रूप है।

(ब) यह विचारव्यूह (Ideology) नहीं है बल्कि विचार प्रवाह है जो परिवर्तनीय है। क्रियान्वयन हेतु इसे पारिस्थितानुकूल ढाला जा सकता है। भारत में जन्मीं सभी विचारधाराएं इसका अंग हो सकती हैं।

(क) इस दर्शन को प्रत्यक्ष रूप देने के लिए चिंतक, परिष्कृत लोकमत, समाजमाध्यम, साहित्य परिचर्चा व विविध कलाएं साहाय्यभूत हो सकती हैं।

व्याप्ति : इस दर्शन का लक्ष्य क्या है? दीनदयाल कहते हैं— "

हमने किसी संप्रदाय या वर्ग की सेवा का नहीं बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की सेवा का व्रत लिया है। सभी देशवासी हमारे बांधव हैं। जब तक हम सभी बंधुओं को भारत माता के सपूत होने का सच्चा गौरव प्रदान नहीं करा देंगे, हम चुप नहीं बैठेंगे। हम भारत माता को सही अर्थों में सुजलाम्, सुफलाम् बनाकर रहेंगे। वह दश प्रहरण धारिणी दुर्गा बनकर असुरों का संहार करेगी, लक्ष्मी बनकर जन-जन को समृद्ध करेगी और सरस्वती बनकर अज्ञानांधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलायेगी.... जब तक देश में एकरसता, कर्मठता, समानता, संपन्नता, ज्ञानवता सुख और शांति की सप्तजाह्नवी का पुण्यप्रवाह नहीं ला पाते, हमारा भगीरथ तप पूरा नहीं होगा........ विजय का विश्वास है, तपस्या का निश्चय लेकर चलें!"(4)    
दीनदयाल जी इस दर्शन द्वारा मानवी जीवन से लेकर सृष्टि तक सभी विषयों को स्पर्श करते हैं और लक्ष्य प्राप्ती हेतु साधना का आग्रह करते हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश, राष्ट्रसुरक्षा, आर्थिक संपन्नता, शिक्षा ये इन सारे विषयों पर अपना मंतव्य देते हैं। उनका जीवन एक श्रेष्ठ, कर्मठ, त्यागी, राष्ट्रभक्त का जीवन था। उनके विचार केवल कल्पनाजगत में नहीं अपितु प्रत्यक्ष रूप देने के लिए थे।

एकात्म मानवदर्शन – क्रियान्वयन के प्रयास

दीनदयालजी के सहकारी स्व. भारतरत्न नानाजी देशमुख ने 1968 में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना कर एकात्म मानवदर्शन को कृतिरूप देने का प्रयास किया।

1972 में मध्य प्रदेश के सतना जिले में पवित्र चित्रकूट क्षेत्र को इस प्रयोगार्थ चुना गया और कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि विषयों पर जनसहभागिता की मदद से कार्य प्रारंभ किया।

उसी प्रकार उत्तर प्रदेश का गोंडा जिल्हा और महाराष्ट्र का बीड जिल्हा भी कार्य हेतु लिया गया।

(अ) कृषि विकास :- इस संदर्भ में डॉ. जितेन्द्र बजाज कहते हैं 

– "दीनदयाल उपाध्याय केवल कृषि को प्रथम प्राथमिकता देने और कृषि की पैदावार बढ़ाने की बात नहीं करते; एकात्म अर्थनीति में वे इसके लिए उपयुक्त उपायों पर भी विचार करते हैं। उन्नत बीजों की आवश्यकता पर बल देते हैं, अच्छे औजारों की उपलब्धी की बात करते हैं, रासायनिक उर्वरक और जैविक खाद के सम्यक, संतुलित उपयोग की बात करते हैं... कृषि को अदेवमातृका बनाने की चर्चा करते हैं।"(5)

इन विचारों के क्रियान्वयन की दृष्टि से चित्रकूट इलाके में गनीवा और मझगवां में दो बड़े कृषि विज्ञान केन्द्र और मॉडल फार्म हैं, जहां किसानों को कम लागत में अधिक पैदावार और जलवायु के अनुसार खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।

महाराष्ट्र के बीड जिले में ग्रामीण विकास संस्था 1992 में प्रारंभ हुई। अंबाजोगाई में कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से आधुनिक खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।

उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा में 2,50,000 एकड़ खेती सिंचित हुई, 95,000 किसान लाभान्वित हुए और 2008 गांव को फायदा हुआ। 27000 ट्यूबवेल्स तैयार की गयीं केवल दो वर्षों में। बीड जिले में श्रम साधना शिविर आयोजित कर 4 लाख क्युबिक मीटर गाद (Silt) जलाशयों से निकाला गया। उसे खेतों में डाला गया, जिससे जमीन अधिक उपजाऊ बनी, जल स्तर बढ़ा।

(2) रोजगार और उद्यमिता :-

(अ) उद्यमिता विद्यापीठ : चित्रकूट में उद्यमिता विद्यापीठ की स्थापना की गयी, यहां ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। कुटीर उद्योग जैसे खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, अगरबत्ती निर्माण का प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है।

(ब) औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्र (ITI) :- युवकों को तकनीकी कौशल सिखाने के लिए संस्थान ITI केन्द्र भी संचालित करता है। गोंडा में जनशिक्षण संस्थान सन 2000 से सैकड़ों ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित कर रहा है।

(3) स्वास्थ्य और चिकित्सा :-  यहां 53 एकड़ में फैला एक विशाल आयुर्वेदिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र है। दंत चिकित्सा की भी व्यवस्था है, इसे 'आरोग्यधाम' कहते हैं।

चित्रकूट रसशाला में शुद्ध और प्रामाणिक आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण किया जाता है।

एक ऑपरेशन थिएटर, प्रसुती एवं बालचिकित्सा केन्द्र, आयुर्वेद अनुसंधान पुस्तकालय, जड़ी-बूटी बगिया, ग्रामीण लोगों के लिए मौसमी बीमारियों के इलाज हेतु 'दादी मां का बटुआ' भी तैयार किया है।

शिक्षा व्यवस्था :- दीनदयाल उपाध्याय कहते थे

— "शिक्षा निःशुल्क होनी चाहिए। किसी को पैसे नहीं हैं इसलिए शिक्षा से वंचित नहीं रहना पड़ना चाहिए। शिक्षा का आर्थिक दायित्व केवल इंसान का नहीं होता है।" शिक्षा समाज का दायित्व है... शिक्षा की व्यवस्थात्मक अधिकार वास्तव में तो शिक्षक का ही होना चाहिए।"(6) 
इस दृष्टि से चित्रकूट में सुरेन्द्र पाल ग्रामोदय विद्यालय 1100 छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है, रामनाथ आश्रमशाला 325 आदिवासी बच्चों के लिए आवासीय सह शिक्षा विद्यालय चलाता है, परमानंद आश्रम पद्धति विद्यालय गनीवन में 125 अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए एक आवासीय सह शिक्षा विद्यालय चलाता है।

     एक गुरुकुल है जिसमें 100 बच्चों को 10-10 बच्चों के समूह सेवानिवृत्त दम्पतियों के साथ रखकर बच्चों में मूल्यों का संचार किया जाता है।

नागपुर का बालजगत प्रकल्प :- नागपुर के लक्ष्मी नगर स्थित बालजगत प्रकल्प का उद्घाटन 11 फरवरी 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखरजी ने किया। यह नानाजी देशमुख के बाल विकास पर विचारों का मूर्त रूप है। यहाँ संगीत, ललित कला, व्यक्तित्व विकास, योग आदि क्षेत्रों में बच्चों की प्रतिभाओं को निखारने का एक अनौपचारिक केंद्र है। इस प्रकार, यह केंद्र उचित वातावरण और सुविधाएं प्रदान करके 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों की जन्मजात प्रतिभाओं को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चों में टीम भावना और भाईचारे को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जाता है। बच्चों की प्राकृतिक प्रतिभाओं को विकसित करने के लिए उपयुक्त वातावरण और आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित एक आधुनिक बाल उद्यान का निर्माण किया गया है। यह उद्यान सभी बच्चों के लिए खुला है, चाहे वे अमीर हों या गरीब, और अपनी अनूठी अवधारणा के कारण बच्चों के बीच बहुत लोकप्रिय है।(7)

चित्रकूट में समाज शिल्पी दम्पती का योगदान :-  

        शोध संस्थान द्वारा उच्चशिक्षित विवाहित दम्पतियों को समाज कार्य के लिए निमंत्रित किया जाता है। पति-पत्नी होने के कारण समाज के सभी घटकों तक उनकी पहुंच होती है। एक दंपती का 5 गांवों के समूह (cluster) का दायित्व कार्य के लिए सौंपा जाता है, उन्हें वहीं निवास करना पड़ता है, गांव के लोगों के पारस्परिक सहकारिता से वे अपना दायित्व पूरा करते हैं और लोगों को प्रेरित कर विकास कार्यों को आगे बढ़ाते हैं।

स्वावलंबन अभियान (Self Reliance Campaign) :-

         चित्रकूट में 2002 से आत्मनिर्भरता अभियान चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत 500 गांवों को दत्तक लिया गया। 2005 में 80 गांवों को स्वयंनिर्भर घोषित किया गया। इन देहातों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए निम्नलिखित विषयों पर कार्य किया गया।

1)बेरोजगारी निर्मूलन 

2)कृषि उत्पाद में वृद्धि 

3)निरक्षरता निर्मूलन 

4) साफ-सुथरा हरा-भरा  पर्यावरण 

5)मंगल स्वास्थ्य  

6)सार्वजनिक सुविधाएं 

7) बगैर न्यायालय बातों को सुलझाना 

8)सामाजिक चेतना आदि।

दीनदयाल उपाध्याय जी कहते थे

 "मानव केवल भौतिकवादी नहीं हो सकता, मानव की आध्यात्मिक आवश्यकताएं भी हैं तथा इन दोनों का विकास मानवता के लिए जरूरी है।"(8)

अर्थात मानव व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धी, आत्मा का संकलित रूप है। प्रत्येक अंग की जरूरत भिन्न होती है।

     इस दृष्टि से चित्रकूट में 'रामदर्शन' स्थापित किया गया। भगवान श्रीराम के आदर्शों, मानवीय मूल्यों और रामायण के संदेशों को कला के माध्यम से समाज में फैलाना और लोगों को नैतिक आचरण के लिए प्रेरित करना इसका उद्देश्य है। चित्रकूट यह भगवान श्रीराम की तपोभूमि रही। गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि जी की यादें भी इसी क्षेत्र से जुड़ी हैं। यह स्थान पर्यटकों को तथा दर्शनार्थियों को अपनी समृद्ध संस्कृति से जोड़ता है।

इस प्रकार दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा एकात्म मानवदर्शन को यथा कृतिरूप देने के प्रयास किए गये हैं।

केंद्र शासन के प्रयास

भारतीय जनता पार्टी के संविधान के अनुच्छेद तीन अनुसार एकात्म मानववाद भाजपा का मूलदर्शन है।(9) इसके ही प्रकाश में बीजेपी प्रणीत सरकारें विविध योजनाएं बनाती हैं और दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन प्रणीत विचारों को धरातल पर उतारने का प्रयास करती हैं।

       उपाध्याय कहते थे कि

 "अपनी सारी योजनाओं का लक्ष्य समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ती का विकास होना चाहिए। जो अंत्योदय कहलाता है। वह भूख और भय से मुक्त होना चाहिए।" इस दृष्टि से केंद्रशासन निम्नानुसार योजनाएं बनाईं

—

(1) अंत्योदय अन्न योजना :-

              समाज के अति गरीब से गरीब परिवारों को पहचान कर उन्हें सस्ते और रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना तथा अंत्योदय कार्ड धारकों को हर माह 35 किलो राशन दिया जाता है। निर्धन परिवार, दिव्यांग, निराश्रित वृद्ध इसके लिए पात्र हैं।

(2) दीनदयाल अंत्योदय योजना (DAY) :-

यह योजना गरिबी कम करने और आजीविका के साधन बढ़ाने के लिए है। इसके दो हिस्से हैं—

(अ) राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन : यह शहरी गरीबों को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है।

(ब) राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन : यह ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाती है।

           प्रधानमंत्री जनधन योजना द्वारा करोड़ों लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ दिया गया। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत पांच लाख तक आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त स्वास्थ्य बिमा देकर चिकित्सा सुरक्षा प्रदान की जाती है।

        पीएम किसान सम्मान निधि योजना के तहत वर्ष मे छः हजार किसानों के खाते में निश्चित राशि  जमा किया जाता है। पीएम आवास योजना द्वारा गरीबों को पक्के मकान कम कीमत में, जल जीवन मिशन द्वारा पाईप द्वारा शुद्ध पेयजल और पीएम स्वनिधि द्वारा छोटे व्यवसाय करनेवालों को वित्तीय सहायता दी जाती है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम, सुकन्या समृद्धी योजना है।(9)

          इ.स. 2000 में पंतप्रधान अटल बिहारी वाजपेयी इनके कार्यकाल प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना बनाई गयी ताकि देहातों को जोड़ा जाय और उन्हें आर्थिक उन्नति के मार्ग खोल दिये जाय। शिक्षा विभाग की प्रगति के लिए सर्व शिक्षा अभियान प्रारंभ किया। 'सब का साथ सब का विकास' इस घोषणा के पीछे दीनदयाल उपाध्याय की प्रेरणा है।

             समान नागरी कानून के लिए कई राज्य प्रयास कर रहे हैं। 'एक देश, एक जन, एक संस्कृति' इस विचार को यह पहल प्रकट करती। संविधान की धारा 370 को समाप्त कर कश्मीरियों की अलगाववादी प्रवृत्ति पर काबू पाया लद्दाख के विकास के रास्ते खुल गये हैं।

(2) आत्मनिर्भर भारत अभियान :- Vocal for local का नारा इसी स्वदेशी और स्वावलंबन के विचार से प्रेरित है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारतीयता का गौरव :-

इस दर्शन के अनुसार भारत का विकास पश्चिमी मॉडेल के अंधी नकल से नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जुड़कर ही हो सकता है। इसके तहत भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक परिसर का विकास, तीर्थ स्थलों को प्रधान रास्तों से जोड़ना, योग को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाना आदि कार्य सांस्कृतिक पुनरुत्थान और भारतीय पहचान को दर्शाते हैं।

(4) समग्र विकास :-

              एकात्म मानवदर्शन मनुष्य के केवल एकांगी विकास की बात नहीं करता, बल्कि शरीर, मन, बुद्धी और आत्मा के एकीकृत और संतुलित विकास पर वकालत करता है। सरकार की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 NEP इसी विचार पर आधारित है, जिसका उद्देश्य युवाओं को केवल पेशेवर विकास नहीं करना है बल्कि उन्हें नैतिक मूल्यों, अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़कर एक पूर्ण मानव बनाना है।

      - सुरक्षा नीति पर प्रभाव :-

(अ) आत्मनिर्भरता :- भारत की वर्तमान सुरक्षा नीति आत्मनिर्भर भारत पर आधारित है। रक्षा उपकरणों का स्वदेशी उत्पादन एकात्म मानव दर्शन की आर्थिक और सामाजिक स्वायत्तता की सोच से मेल खाता है।

(ब) विश्वशांति के लिए प्रयास :-

हम ने सारी पृथ्वि को एक परिवार माना है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' का पक्षधर है भारत। इसलिए भारत की सुरक्षा नीति आक्रामक नहीं बल्कि रक्षार्थ है, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की है। संपूर्ण मानवता का हित सर्वोपरी यही एकात्म मानव दर्शन का संदेश है।

अन्य गैरशासकीय संगठन, व्यक्तियों के इस दर्शन के क्रियान्वयन हेतु प्रयास :-

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : सेवा विभाग द्वारा प्रेरित ग्राम विकास (10)

समग्र ग्राम विकास की योजनाएं, रा०स्व० संघ के स्वयंसेवकों द्वारा संचालित और क्रियान्वित की जाती हैं। ग्राम विकास के पांच आयाम हैं —

(क) शिक्षा :- कोई निरक्षर ना हो, साक्षर गांव- शिक्षीत गाव

(ख) स्वास्थ्य :- सभी ग्रामवासी स्वस्थ हों। प्राथमिक चिकित्सा सुविधा गांव में ही उपलब्ध हो।

(ग) समरसता :- छुआछूत, भेदभाव, कुरितियां ना हों, भाईचारा हो।

(घ) संपन्नता :- कोई भूखा ना हो, सबको रोजगार उपलब्ध हो।

(ङ) सुरक्षा :- गांव विवादमुक्त तंटामुक्त हो। अंदर से और बाहर से समाजविघातक शक्ति से मुक्त हो, स्वसंरक्षित हो।

यह अभियान लेकर देश के लगभग सभी प्रांतों में ग्राम विकास कार्य शुरू है। एक दृष्टि से यह कार्यक्रम द्वारा एकात्म मानवदर्शन का हेतु प्रकट होता है ।

            सारांश में हम कह सकते हैं कि एकात्म मानव दर्शन की व्याप्ति व्यक्ति से लेकर विश्व तक है । सभी को सुखमय जीवन जीने का पथ प्रदर्शक है यह दर्शन । दीनदयाल कहते हैं

, "इस आधार पर हम चले तो भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के साथ राष्ट्रीयता, प्रजातंत्र, समता और विश्व एकता के आदर्शों को एक समन्वित रूप में रख सकेंगे ।"

             इस दर्शन के क्रियान्वयन अभी तक अल्पमात्रा में प्रयास किये गये। शेष कार्य पूर्ण करना सभी का दायित्व है। दीनदयाल जी के विचार व्यवहार्य तथा प्रासंगिक हैं ।

संदर्भ :-

1)                 दीनदयाल उपाध्याय 'पोलिटिकल डायरी' पृष्ठ क्र - 188

2)                 एकात्म मानववाद - तत्वमिमांसा, सिद्धान्त, विवेचन - पृ. 64

3)                 तत्रैव - पृष्ठ 65

4)                 दीनदयाल उपाध्याय का भाषण कालीकट (केरल) दि. 25 सप्टें 1967

5)                 डॉ. जितेन्द्र बजाज 'कृषिसंबंधी चिंतन' (एकात्म मानव दर्शन विचार संग्रह पृ. 122)

6)                 डॉ. इंदुमती काटदरे - एकात्म मानव दर्शन और शिक्षा पृष्ठ-71

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

आप जनरल कास्ट है!


एकेडमिक सुईसाईंड क्या होती है? मुझसे बेहतर कौन जान सकता है, बात २०१० की है इलाहाबाद उच्च न्यायालय का राम मंदिर मामले के ठीक कुछ महीनों पहले, मेरी रैगिंग ही एक महिला प्राध्यापक ने कराई थी, जो कि पुणे यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र विभाग में जेंडर स्टडीज पढ़ाती थी। मै उस समय पुणे यूनिवर्सिटी में हॉस्टल में रहकर समाजशास्त्र विभाग में पढ़ रहा था। फर्स्ट सेमिस्टर में टॉप करने के बाद द्वितीय सेमिस्टर से यह शुरुआत हुई थी। टॉपर रहने पर भी तीसरे सेमिस्टर में मुझे एडमिशन नहीं दिया गया था। उसके लिए कुलगुर के कार्यालय के चक्कर २ महीनों तक लगाने पड़े। उस समय समाजशास्त्र की विभाग प्रमुख स्वाती शिरवाडकर द्वारा मेरे पिताजी के नाम पत्र भेजा गया। जिसपर मेरे द्वारा किए जा रहे आंदोलन पर पिताजी द्वारा अंडरटेकिंग लिया जाना था। अन्याय के विरोध में किए गए मेरे द्वारा आंदोलन उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं आए जो व्यवस्था न्याय, समता बंधुता छात्रों को पाठ्यक्रम में सिखाती है। Institutional Injustice कहा जाता है जब संस्थान ही अन्याय करता है, बार बार अन्याय करता है। वह निरंकुश होता है। 

यह लिखने का प्रयोजन किसी की भूमिका का पक्षधर होना नहीं है। कोई सही हो सकता है तो कोई गलत भी हो सकता है। न मारनेवाले का पक्ष और न आत्महत्या करनेवाले का पक्ष मै ले सकता हूं । यह व्यवस्था में सुधार होगा ऐसी आशा की रत्ती भर गुंजाइश भी मुझे नहीं है। बताना भूल गया हूं मै जाति न मानने वाली जनरल कास्ट से हूं। भारतीय संविधान ने मुझे हिम्मत नहीं दे रखी है, कानून के पालनहारे भी इस पर मौन ही रहते है। इतना अपाहिज बना दिया है कि मै यहां अत्याचार पीड़ित की दास्ताँ लिखूं तो मुझपर वर्तमान में वंचित शोषित पीड़ित सशक्तिमान कोई व्यक्ति इस लिखने भर से आहत होकर मुझपर केस कर दे, कोई अन्य तो छोड़िए मेरे साथी जिन्हें मैं भारतमाता की संतान मानता हूं वे  भी पीछे न रहेंगे इतना मुझे उनपर विश्वास हो गया है। मेरे सहपाठी साथी जो कि उसी अनुसूचित जातियों से संबंधित है उस समय मुझपर हो रहे अन्यायपूर्ण अत्याचार की संवेदना भी उन्हे छू नहीं सकी।

रोहित वेमुला की आत्महत्या पर चिल्लाने वाली मीडिया से समझ सकते है कि वह केवल जातिगत आत्महत्याओं पर ही मुखर रही है। मेरिट की आत्महत्याएं मनोरंजन मात्र है। अब आईआईटी बॉम्बे में एक आत्महत्या हुई, प्रोफेसर पर एट्रोसिटी कानून अंतर्गत धाराएं लगाई गई, इसी डर से आईआईटी के निदेशक भी इस्तीफा दे रहे है। 

इस आत्महत्या की बात तो एक कॉपी (Cheating) करने से शुरू हुई थी, अब तो शिक्षा का स्तर खराब न हो इसके लिए ओपन बुक टेस्ट है। २१वी सदी में जन्मा हर एक व्यक्ति जो हस्ताक्षर करना जानता हो, सरकार की फाइलों में साक्षर है।

जब भी ऐसी विद्यार्थी की आत्महत्या होती है, मै यही सोच लेता हूं कि क्या मैं इसपर कुछ  कर सकता हूं, सिवाय राजनीति स्वार्थ के ? शिक्षा का व्यापारीकरण करवा कर उस महत्व को जीवन का सबसे बड़ा महत्व कॉर्पोरेट मार्केट फोर्सेज ने बना दिया है। उसके लिए लगने वाले श्रम, अर्थकारण और तरुण समय का अनन्य महत्व जनमानस के मस्तिष्क पर थोप दिया गया है और जनता ने इसे स्वीकार भी कर लिया है। 

शिक्षा का बोध होना आवश्यक है न कि रटकर, याद करके डिग्री धारी होना। 

खैर छोड़िए आदर्शों की बात, यह देखिए जो आत्महत्या हुई है उसमें क्या वास्तविक जातिगत प्रताड़ना हुई है ? 

रोहित वेमुला की आत्महत्या के उपरांत ऐसा स्वार्थ राजकरण हुआ, जिसमें अनेक संगठनो ने बहुजन समाज को दिग्भ्रमित किया।

जो भी हो सत्य देर सबेर ही सही जांच में सामने आएगा पर तब तक बहुसंख्य समाज का दिशाभूल किया जाएगा, इसमें ही वक्त गुजर जाएगा।

मृतक के साथ मेरी संवेदना है। परंतु इस विषय पर चिंतन आवश्यक है राजनीति नहीं।

मैने जनरल कास्ट होने का दुख सहा है, उस दुःख का सदा के लिए वरण भी किया है। संघर्ष किया परंतु आत्महत्या नहीं की। और न ही किसी के भरोसे से जिंदगी जिया है। किसी का उपकार कभी नहीं लिया। हां जब उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं हम, तो उसका त्याग करें, वे जातिवादी शक्तियां आपस में ही लड़कर मरेगी और मारेगी।

और इसप्रकार हमने शिक्षा के क्षेत्र से अपने आप को दूर कर लिया। अब वह शिक्षा का क्षेत्र कैंसर बन गया है, सड़ गया है, उसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है इसलिए इससे बचे और आनेवाली पीढ़ियों को बचाएं क्योंकि आप जनरल कास्ट है।

विश्वजीत सिंह

नागपुर

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

श्री फिरोज फरेदून जहाँगीर घान्दी ( Feroze Faredoon Jehangir Ghandy)

 


पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के पिता और श्रीमती इंदिरा गांधी जी के पारसी पति पूर्व सांसद श्री फिरोज फरेदून जहाँगीर घान्दी ( Feroze Faredoon Jehangir Ghandy) जी के स्मृति दिन विनम्र अभिवादन 🌺


टाटा TELCO, डालमिया LIC जैसे कॉर्पोरेट भ्रष्टाचारी नीतियों के विरोधी, नेहरू कैबिनेट का भ्रष्टाचार उजागर करनेवाले स्वतंत्रता सेनानी रहे, अखबार National Herald के कार्यकारी निदेशक  श्री फिरोज जहांगीर गांधी को सदैव सम्मान के साथ स्मरण किया जायेगा। 

इनके ही परिवार का मेनका गांधी और सोनिया गांधी में पेंशन, संपत्ति विवाद है।

प्रयागराज (इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश) स्थित पारसी कब्रिस्तान में यह कब्र का १९६६ के बाद रुस्तम गांधी ने बड़े संघर्ष के बाद जीर्णोद्धार किया।

प्रेस की स्वतंत्रता का कानून, लोकसभा राज्यसभा टीवी चैनल का श्रेय श्री फिरोज जहांगीर गांधी को ही जाता है।


विश्वजीत सिंह (नागपुर)


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दही हंडी में नृत्यांगनाएं, केवल भाजपा शिंदे ही बने मीडिया का निशाना


गौतमी पाटील व तत्सम अन्य नृत्यांगनाएं नृत्य कर रही है, अनेक नेताओं ने कृष्ण जन्माष्टमी दहीहंडी उत्सव के नाम पर ऐसे अभिनेत्री, कलाकार, नृत्यांगनाओं के नृत्य रखे, युवाओ एवं बुजुर्गों में आकर्षण मानकर चले, युवतियों ने भी दहीहंडी फोड़ने में बड़ी संख्या में सहभागिता करी।

दैनिक अखबार, प्रसार माध्यमों ने कुछ जगहों पर गौतमी पाटील जैसा नृत्य और भाजपा, शिव शिंदे सेना पर खुप खबरें बनाई, खूब फैलाई।

सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर पर संस्कार हनन का राग, संस्कृति विरोधी अलापने लगे।

इसमें ऐसी ही खबर जो छूट गई, या जिसपर मीडिया चर्चा नहीं करना चाहती, जिसे Selective Criticism कहा जाता है एक महाराष्ट्र राज्य विरोधी पक्ष कांग्रेसी नेता ने चंद्रपुर की ब्रह्मपुरी विधानसभा के सावली नगर में वही गौतमी पाटील का डांस रखा, साथ में इसे बहुजन नृत्यांगना कह जातिवाद से भी जोड़ दिया। इसपर मीडिया चुप है।

इससे पता चलता है कि मीडिया सिर्फ भाजपा शिंदे सेना के नेताओं को टारगेट कर निशाना बना रही है, बदनामी कर रही है।

सबसे मजे की बात यह है कि भाजपा शिंदे सेना के जिम्मेदार प्रवक्ता, मीडिया भी हिम्मत नहीं दिखा सकी है कि इस पर बोले। 

आप भी वह कार्यक्रम देख सकते है। साथ में यह कार्यक्रम का पोस्टर भी। कांग्रेस नेता के अधिकृत फेसबुक पेज पर Live 

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यह वीडियो नृत्यांगना गौतमी पाटील फैंस पेज पर है

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आखिर कोई तो बोला इस विषय पर, श्रीमती नेहा पेंडसे नामक भाजपा की नगरसेविका है, गौतमी पाटील के वीभत्स, अश्लिल नृत्य पर सवाल कर रही है।

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शनिवार, 5 सितंबर 2026

United in Oneness अमेरिका में संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत (मराठी)

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे सरसंघचालक मोहन भागवत यांचे अमेरिकेतील न्यूयॉर्क येथील भाषण


उपस्थित सर्व मान्यवर व्यक्ती, सज्जन माता-भगिनींना, रक्षाबंधन पर्वाच्या हार्दिक शुभेच्छा.


आपण येथे एकत्व साजरे करण्यासाठी एकत्र आलो आहोत. आपण न्यूयॉर्कमध्ये हे करण्यासाठी एकत्र आलो आहोत, ही अतिशय योग्य गोष्ट आहे. आणि आजचा आनंद आणि आजची भावना आपल्यासोबत वाटून घेण्यासाठी मी भारतातील नागपूरहून येथे आलो आहे.


जेव्हा आपण अमेरिका, युनायटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका म्हणतो, तेव्हा एका शब्दाची नेहमी वारंवार चर्चा होते, तो म्हणजे Pluralism — बहुवाद.


आणि जेव्हा आपण भारत म्हणतो, तेव्हा दुसरा शब्द किंवा दुसरे वाक्य नेहमी चर्चिले जाते — Unity in Diversity — विविधतेतील एकता.


भारतासाठी ही एकता आणि ही विविधता दोन्ही त्याच्या DNA मध्ये आहेत.


पाहा, राष्ट्रे केवळ भौगोलिक अस्तित्वे नसतात. या विश्वाच्या रचनेमध्ये राष्ट्रांना एक कर्तव्य पार पाडायचे असते.


स्वामी विवेकानंदांनी म्हटले होते, प्रत्येक राष्ट्राला जगाला देण्यासाठी एक संदेश असतो. प्रत्येक राष्ट्राला पूर्ण करण्यासाठी एक मिशन असते. प्रत्येक राष्ट्राला पूर्ण करण्यासाठी एक नियती असते.


भारताला कोणती नियती दिली आहे?


भारताचे कार्य आहे — या विविधतेतील एकतेची जाणीव करून घेणे आणि वेळोवेळी जगालाही या एकतेची जाणीव करून देणे.


आपण एक आहोत आणि या विविधतेमुळे त्या एकतेला सजविले जाते. त्यामुळे विविधतेचा उत्सव साजरा केला पाहिजे. तिचा आदर केला पाहिजे. तिला स्वीकारले पाहिजे. आणि त्याच वेळी आपण एकत्वाची ही भावना मनात ठेवली पाहिजे.


ही भावना अतिशय वास्तविक आहे.


अनेक वेळा आपण विचार करू शकतो की आपण एक आहोत असे कसे म्हणू शकतो? आपण तर वेगळे दिसतो. इतक्या राष्ट्रीयता, इतक्या भाषा, इतके धर्म, इतक्या जीवनपद्धती. आपण वेगळे दिसतो. आपण वेगळे आहोत.


वैज्ञानिकदृष्ट्याही आपण कसे वेगळे आहोत हे आपण शिकतो.


आपल्यापैकी प्रत्येकाला आपले भोजन स्वतंत्रपणे घ्यावे लागते. मला भूक लागली नाही याचा अर्थ तुम्हाला भूक लागलेली नाही असा होत नाही. माझी भूक भागली, मी माझे दुपारचे जेवण केले, याचा अर्थ तुम्ही तुमचे जेवण केले असा होत नाही.


तुम्हाला स्वतंत्रपणे जेवावे लागते. तुम्हाला स्वतंत्रपणे कमवावे लागते. तुम्हाला स्वतंत्रपणे खर्च करावा लागतो.


ठीक आहे, जगातील ही भौतिक वस्तुस्थिती आहे.


परंतु एक अंतर्निहित एकत्व आहे. म्हणूनच आपण एकमेकांसाठी भावना अनुभवतो.


तुम्ही एक साधा प्रयोग करू शकता. किंवा मी तुम्हाला हे करण्याचे आव्हान देऊ शकतो.


जेव्हा तुम्ही दुपारचे किंवा रात्रीचे जेवण घेत असाल, तेव्हा एका भुकेल्या माणसाला तुमच्यासमोर उभे राहू द्या आणि त्याने तुमच्या भरलेल्या ताटाकडे भुकेल्या नजरेने पाहू द्या. त्याची नजर टाळू नका आणि त्याला तेथून हाकलूनही देऊ नका. आणि त्याला अन्नाचा एक कणही न देता तुम्ही तुमचे जेवण करा.


तुम्ही हे करू शकत नाही.


तुम्ही प्रयत्न करू शकता, पण तुम्ही ते करणार नाही. कारण आपण मनुष्य आहोत. ही भावना आपल्यामध्ये आहे.


ही भावना प्राण्यांमध्येही असते. पण ते त्यावर कृती करू शकत नाहीत, कारण त्यांना तसे करण्याचे स्वातंत्र्य नसते. ते नैसर्गिक प्रवृत्ती आणि नैसर्गिक आवश्यकतांनी बांधलेले असतात.


त्यांना ते काय आहेत, त्यांचा जन्म का झाला, हे माहीत नसते. ते का मरतील हेही त्यांना माहीत नसते. त्यांना एवढेच माहीत असते की माझा जन्म झाला आहे, त्यामुळे मला माझ्या मृत्यूपर्यंत जगायचे आहे आणि जर मला जगायचे असेल तर मला भूक लागेल. म्हणून मला खावे लागेल. मला अनेक गोष्टी कराव्या लागतील, कारण निसर्ग मला त्यासाठी बाध्य करतो आणि मी निसर्गाला नकार देऊ शकत नाही.


तुम्ही पाहू शकता — एक गाय गवत चरत असते. तिचे पोट भरेपर्यंत ती गवत खाते. त्यानंतर ती त्या गवताची काळजी करत नाही.


ती खात असताना दुसरी गाय आली आणि तिचे पोट अजून भरलेले नसेल, तर ती दुसऱ्या गायीला ते गवत खाऊ देणार नाही.


पण आपण ते गवत गठ्ठा किंवा गाठोडे करून उद्यासाठी घेऊन जात नाही.


प्राणी असे करत नाहीत.


फक्त मनुष्य विचार करू शकतो.


मनुष्य विचार करू शकतो आणि हा एक गुण आहे, एक आशीर्वाद आहे, एक वरदान आहे.


पण त्याच्यासोबत आणखी एक अट आहे.


तुम्ही विचार करू शकता, पण तुम्ही कोणत्या पद्धतीने विचार करता, हे महत्त्वाचे आहे.


जर तुम्ही योग्य पद्धतीने विचार केला तर तुम्ही ईश्वराच्या जवळ जाता.


जर तुम्ही चुकीच्या पद्धतीने विचार केला तर तुम्ही प्राण्यांच्या जगाच्या जवळ जाता.


“नर करनी करे तो नरका नारायण बन जाए, उल्टी करनी करे तो क्या बन जाए? कुत्ता बिल्ली बन जाए या राक्षस बन जाए.”


म्हणून दिशा महत्त्वाची आहे.


जो मनुष्य योग्य दिशेनुसार आपले जीवन घडवतो, तो या ईश्वराच्या राज्याचा जबाबदार नागरिक बनतो.


आपल्या परंपरेमध्ये एक सुभाषित आहे —


“आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्य मेतत् पशुभिर्नराणाम्।”


खाणे, प्रजनन करणे, विश्रांती घेणे आणि आपल्या अस्तित्वाबद्दल चिंता करणे हे मनुष्य आणि प्राणी दोघांमध्येही समान आहे.


पण एक विशेषता आहे.


मनुष्याला विचार करण्याची क्षमता दिली आहे आणि इतरांविषयी संवेदनशीलताही दिली आहे. त्यामुळे जर त्यांनी योग्य विचार केला तर ते संपूर्ण जगाचे पालन करू शकतात.


मनुष्य जगासाठी जबाबदार आहे.


कारण त्याला विचार करण्याचा विशेष गुण दिला आहे. त्याला योग्य आणि अयोग्य यातील फरक समजण्याची क्षमताही दिली आहे. म्हणूनच तो विविधतेमध्येही एकत्वाची अनुभूती घेऊ शकतो.


पण मला प्रयत्न करावा लागेल.


आणि असे झाले की, प्रयत्न करताना जेव्हा इतर सर्वजण थकले आणि प्रयत्न करणे थांबवले, तेव्हा आपल्या प्राचीन पूर्वजांनी शोध घेणे सुरूच ठेवले.


प्रत्येक जण सुखाच्या शोधात असतो. Pursuit of happiness — सुखाचा शोध हा सर्वांसाठी समान आहे.


त्या काळी मानवसंख्या फारच कमी होती. त्यामुळे प्रत्येकाला प्रत्येकजण माहीत होता.


आणि प्रवृत्तीच्या आधारावर दोन प्रकारचे लोक होते.


एक प्रवृत्ती होती — जगा आणि जगू द्या.


दुसरी प्रवृत्ती होती — जगा आणि फक्त त्यांनाच जगू द्या जे आमचे म्हणणे मानतात.


जे म्हणतात की, तुम्ही आमचे ऐकाल तर आम्ही तुमचे रक्षण करू.


संस्कृतमध्ये, हिंदीमध्ये संरक्षणाला रक्षण म्हणतात.


म्हणून जे फक्त आज्ञा पाळणाऱ्यांचे रक्षण करतात ते राक्षस आहेत.


आणि जे म्हणतात — तुम्ही माझे ऐका किंवा ऐकू नका, माझे मत काय आहे याला तुम्ही सहमत आहात किंवा नाही, तुम्हाला माझ्याबद्दल काय वाटते, तुम्ही माझ्यासाठी किती उपयोगी आहात — या गोष्टी फार लहान आहेत.


मुख्य गोष्ट अशी आहे की आपण सर्व मनुष्य आहोत.


आपल्याला जग टिकवायचे आहे आणि म्हणून आपल्याला बंधुभावाने जगायचे आहे.


म्हणून मी तुमचा हात हातात घेईन.


तो देव आहे. देवप्रकृती, देव प्रकारचे मनुष्य.


त्यांचा राजा इंद्र होता.


आणि राक्षस प्रकारच्या प्रवृत्तीचा राजा विरोचन होता.


स्वाभाविकपणे ते सर्व सुखाच्या शोधात होते.


त्यांनी प्रयत्न केले, पुन्हा प्रयत्न केले आणि अनेक गौरवशाली गोष्टी केल्या. अनेक कठीण प्रयत्न त्यांनी यशस्वीपणे पूर्ण केले.


आणि दोन्ही प्रकारच्या समाजांमध्ये अशी अवस्था आली की त्यांच्याकडे सर्व काही होते. त्यांना जे काही हवे होते ते त्यांच्या सेवेसाठी तयार होते.


पण त्यांच्याकडे एक गोष्ट नव्हती — समाधान.


त्यांच्या सर्व इच्छा पूर्ण करण्यासाठी सर्व काही होते. पण ते सर्व काही उपभोगल्यानंतरही समाधान नव्हते.


कारण त्यांना जाणवले की, आपल्याकडे सर्व भौतिक सुखे आहेत, पण यामुळे आपल्याला कायमस्वरूपी समाधान मिळत नाही.


जर मला न्यूयॉर्कमधील डोनट्स आवडत असतील, तर मी डोनट्स खाईन.


एका वेळी मी किती डोनट्स खाऊ शकतो?


मला माहीत नाही. मी मधुमेही आहे.


पण एखादा मनुष्य एका वेळी जास्तीत जास्त पन्नास डोनट्स खाऊ शकतो.


त्यानंतर त्याला ते डोनट्स पाहण्याचीही इच्छा होणार नाही.


तो म्हणेल, नाही, ते दूर ठेवा.


डोनट तोच आहे.


काय बदलले?


आणि पन्नास डोनट्स खाल्ल्यानंतरही दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी पुन्हा पन्नास डोनट्स खाण्यास तयार असतो.


म्हणून भौतिक सुख क्षणिक आहे. ते समाधान देऊ शकत नाही.


आणि जर भौतिक सुखाची विपुलता असेल तर तेही कमी होऊ शकते.


म्हणून समाधान नाही, हे त्यांनी अनुभवातून शिकले.


आणि त्यानंतर ते आपापल्या गुरूंकडे गेले.


विरोचन, जो असुरांचा राजा होता, तो आपल्या गुरू शुक्राचार्यांकडे गेला.


आणि देवांचा राजा इंद्र आपल्या गुरू बृहस्पतींकडे गेला.


दोघांनीही आपल्या गुरूंना सांगितले —


“गुरुजी, आमच्याकडे सर्व काही आहे. पण आम्ही समाधानी नाही. सर्व काही असूनही दुसऱ्या दिवशी पुन्हा आम्हाला सर्व काही हवे असते.


आम्हाला कायमस्वरूपी समाधान कुठे मिळेल?


असे सुख कुठे मिळेल जे आम्हाला कायमचे समाधान देईल?


असे सुख जे एकदा प्राप्त झाले की कधीही कमी होणार नाही?”


दोन्ही गुरूंनी आपल्या दोन्ही शिष्यांना उत्तर दिले —


“जेव्हा तुम्हाला तुमच्या अंतर्मनातील अस्तित्वाची, म्हणजेच आत्म्याची किंवा आत्मन्‌ची अनुभूती होईल, तेव्हाच या सर्व गोष्टी पूर्ण होतील.”


आणि त्या आत्म्यापर्यंत कसे पोहोचायचे हे फक्त ब्रह्माजींनाच माहीत आहे.


तुम्ही ब्रह्माजींकडे जा आणि त्यांच्याकडून ही विद्या घ्या. त्यांच्याकडून हे शिक्षण घ्या.


म्हणून दोघेही त्या काळच्या परंपरेनुसार विद्यार्थ्याचा पोशाख परिधान करून, हातात समिधा इत्यादी गुरुदक्षिणा घेऊन ब्रह्माजींकडे गेले.


ब्रह्माजी ध्यानात होते.


त्यांनी नमस्कार केला, त्यांनी आणलेली दक्षिणा एका बाजूला ठेवली आणि ते त्यांच्या ध्यानातून बाहेर येण्याची वाट पाहत बसले.


काही वेळाने ब्रह्माजी आपल्या सामान्य अवस्थेत परत आले.


त्यांनी डोळे उघडले आणि पाहिले — “अरे, दोन्ही राजे येथे आहेत. आणि त्यांनी गुरूंना भेटण्यासाठी विद्यार्थी ज्या विशिष्ट पोशाखात असावे तो पोशाख घातला आहे.”


ते म्हणाले, “होय, तुम्हाला काही शिकायचे आहे असे दिसते. तुम्हाला काय शिकायचे आहे?”


दोघांनी उत्तर दिले —


“आम्हाला आत्मन्‌ प्राप्त करायचा आहे. तो आत्मन्‌ कसा पाहायचा? त्याच्यापर्यंत कसे पोहोचायचे?”


ब्रह्माजी म्हणाले —


“माझ्यासाठी हे अतिशय सोपे आहे.


तुम्ही कसे पाहता?”


ते म्हणाले, “आम्ही डोळ्यांनी पाहतो.”


“ठीक आहे, मग आत्मन्‌ पाहण्याचा प्रयत्न करा.”


ते म्हणाले, “तो कुठे पाहायचा?”


“तुम्ही डोळ्यांनी पाहता. पण तुम्ही प्रत्यक्षात डोळ्यांनी पाहत नाही.


डोळा हे एक यंत्र आहे.


एखादा मनुष्य मरण पावला आणि आपण त्याचे डोळे लगेच काढले, तर ते डोळे दुसऱ्या व्यक्तीला देता येतात.


म्हणून डोळा हे एक यंत्र आहे.


डोळा हे एक यंत्र आहे.


तुमच्या डोळ्याच्या आत कोणीतरी आहे जो पाहतो आणि मग तुम्हाला वाटते की तुम्ही पाहत आहात.


म्हणून तुमच्या डोळ्यातील त्या पाहणाऱ्याला पाहा.”


मग ते दोघे एकमेकांसमोर उभे राहिले आणि त्यांनी एकमेकांच्या डोळ्यांत पाहिले.


त्यांना स्वतःची सावली, स्वतःचे प्रतिबिंब दिसले.


त्यांनी ब्रह्माजींना विचारले —


“ब्रह्माजी, आम्ही हे दररोज आरशात पाहतो. आणि स्थिर पाण्यातही आपल्याला हे दिसते.


हा आत्मन्‌ आहे का?”


ब्रह्माजी शांत राहिले.


आणि पुन्हा ध्यानात गेले.


मग ते परत निघाले.


नदी पार करताना ते विचार करत होते.


ब्रह्माजींनी आम्हाला सांगितले की तुम्हीच आत्मन्‌ आहात. त्यांनी आमचे प्रतिबिंब दाखवले.


म्हणून मी आत्मन्‌ आहे आणि आत्मन्‌ अमर आहे. सर्वव्यापी आहे. एकच मानवी आत्मा आहे.


पण त्यांनी पाहिले की नदीच्या पाण्यात दिसणारे आत्मन्‌चे प्रतिबिंब नाव वल्हवताना नष्ट झाले.


वल्ह्यांच्या हालचालीमुळे ते प्रतिबिंब नष्ट झाले.


म्हणून इंद्र विरोचनला म्हणाला —


“काहीतरी आहे. काहीतरी कोडे आहे. आपल्याला परत जावे लागेल. हे योग्य नाही.”


विरोचन म्हणाला —


“नाही. आपण एकदा विचारले आणि त्यांनी अतिशय स्पष्ट उत्तर दिले.


त्यांनी आपल्याला एकमेकांच्या डोळ्यांत पाहायला सांगितले.


आपण एकमेकांचे प्रतिबिंब पाहिले.


म्हणून आपण हेच आहोत — मी आणि माझे.


हेच त्यांचे उत्तर आहे आणि आता मी पुरेसे शिकलो आहे.


मी परत जाईन आणि प्रत्येकजण स्वतःचा, स्वतःचा आणि स्वतःच्या गोष्टींचा विचार करेल आणि आपण त्या पद्धतीने पुढे जाऊ.”


पण इंद्र परत आला आणि त्याने पुन्हा ब्रह्माजींना विचारले.


“हा आत्मन्‌ नाही. मग आत्मन्‌ काय आहे?”


ब्रह्माजींनी पुन्हा अनेक वेळा त्याची परीक्षा घेतली, त्याला अनेक प्रश्न विचारले.


आणि शेवटी त्याला मानवी आत्म्याचे ज्ञान प्राप्त झाले.


ही श्रुती सत्य आहे की नाही, हे मला माहीत नाही.


पण एका फार प्राचीन काळात आपल्या पूर्वजांना हे अंतर्गत तत्त्व समजले होते, ही एक वेगळी ऐतिहासिक गोष्ट आहे.


त्यांनी त्याला आत्मन्‌ म्हटले.


भारतीय परंपरांमध्ये त्याला अनेक नावे आहेत.


पण सत्य हे आहे की, वेगवेगळी शरीरे, वेगवेगळे पोशाख, वेगवेगळ्या उपासना, सर्व काही वेगळे असूनही जे आपल्याला जोडते ते हेच तत्त्व आहे.


जसे मण्यांच्या माळेत एकच धागा सर्व मण्यांना जोडतो, त्याप्रमाणे हा आत्मन्‌ आपल्या सर्वांमध्ये आहे आणि तो आपणा सर्वांना जोडतो.


आणि तोच कायमस्वरूपी, न संपणाऱ्या आनंदाचा स्रोत आहे.


त्याच वेळी तो आपल्याला आणखी एक गोष्ट सांगतो —


तुम्ही वेगळे दिसता, पण तुम्ही वेगळे नाही.


कारण हे सर्व भेद नष्ट होतील. ते नाहीसे होतील.


तुम्ही मराल. तुमचे शरीर मरेल.


पण काहीतरी कायमस्वरूपी राहते.


काहींचा विश्वास आहे की ते Judgment Day — अंतिम न्यायाच्या दिवसापर्यंत राहते.


काहींचा विश्वास आहे की ते अनेक जन्मांच्या चक्रातून जाते.


पण आपल्या आत काहीतरी आहे जे निघून जाते, जे कायमचे आहे, जे नष्ट होत नाही.


आणि म्हणून जे काही आपल्या जगात अस्तित्वात आहे, ते आपण जगत असताना वेगवेगळ्या अस्तित्वांचा समूह म्हणून पाहतो, अनुभवतो.


पण त्यांच्यामध्येही मी आहे आणि माझ्यामध्येही ते आहेत.


आपण एकमेकांचे आहोत.


आणि मग त्यांनी तार्किकपणे विचार केला —


जर असे असेल, तर आपल्याला एक नवीन ज्ञान मिळाले आहे, जे मानवजातीसाठी अत्यंत उपयुक्त आहे.


आणि संपूर्ण जगातील मानवजात आपलीच आहे.


म्हणून हे ज्ञान जगाला दिले पाहिजे.


हे ज्ञान देण्याचे कार्य एखाद्या व्यक्तीमार्फत होऊ शकत नाही.


त्यासाठी एक योग्य आणि मोठी व्यवस्था असणे आवश्यक आहे.


म्हणून हिमालयाच्या दक्षिणेकडून समुद्रापर्यंत राहणाऱ्या लोकांना एका राष्ट्राच्या रूपात संघटित करण्यात आले.


आणि त्यांना एक कार्य, एक कर्तव्य देण्यात आले —


तुम्हाला हे ज्ञान जगाला द्यायचे आहे.


म्हणून भारतात ही संकल्पना आहे की तुम्हाला जीवन मिळाले आहे ते त्याचा उपयोग करण्यासाठी.


“आत्मनो मोक्षार्थम्” — आत्म्याच्या मुक्तीसाठी.


पण एवढेच नाही.


तुम्हाला हे तत्त्व स्वतःमध्ये पाहायचे आहे आणि त्याच वेळी हे तत्त्व जगातील प्रत्येक वस्तूमध्ये आणि प्रत्येक व्यक्तीमध्ये पाहायचे आहे आणि त्यांच्या कल्याणासाठी कार्य करायचे आहे.


“आत्मनो मोक्षार्थम् जगत् हिताय च.”


स्वतःच्या मोक्षासाठी आणि जगाच्या कल्याणासाठी.


हाच मानवी जीवनाचा उद्देश आहे.


मानवी जीवन निरर्थक नाही.


ते अर्थहीन नाही.


तो साधा योगायोग नाही.


मानवी जीवन हे प्रत्येकाला हे ज्ञान देण्यासाठी आणि स्वतःच्या मुक्तीसाठी तसेच जगाच्या कल्याणासाठी हे ज्ञान आचरणात आणण्यासाठी दिले आहे.


हीच मिशन आहे.


भारताने हे पूर्ण करायचे आहे.


जगभरातील भारतीयांनी स्वतःच्या उदाहरणातून हा संदेश द्यायचा आहे.


उपदेश करून नव्हे, तर आचरणातून.


हीच भारताची नियती आहे.


योगी अरविंदांनी भाकीत केले होते की आता भारताचा उदय निश्चित आहे, कारण जगाला या संतुलन निर्माण करणाऱ्या, जोडणाऱ्या तत्त्वाची आवश्यकता आहे.


हे टिकवून ठेवणारे तत्त्व म्हणजे आपण ज्याला धर्म म्हणतो.


धर्म म्हणजे Religion नाही.


धर्म म्हणजे उपासना नाही.


तो या सर्वांच्या पलीकडे आहे.


हे असे नियम आहे ज्याद्वारे विश्व टिकून राहते.


हा तो नियम आहे ज्याद्वारे मनुष्य जीवनातील द्वैतांचे व्यवस्थापन करू शकतो.


हा तो समतोल आहे जो एकाच वेळी सर्वकाही टिकवून ठेवतो आणि प्रत्येकाला एकाच वेळी प्रगती करण्याची संधी देतो.


असे नाही की व्यक्तींना दडपले गेले तरच समाजाची प्रगती होईल.


नाही.


असेही नाही की व्यक्ती यशस्वी होण्यासाठी समाजाला दडपावे लागेल.


नाही.


व्यक्ती, समाज आणि पर्यावरण यांनी एकत्र पुढे गेले पाहिजे. एकत्र प्रगती केली पाहिजे.


तुमचे शरीर, तुमचे मन आणि तुमची बुद्धी यांनीही एकत्र पुढे गेले पाहिजे. एकत्र प्रगती केली पाहिजे.


जे तत्त्व सर्वांना जोडते, सर्वांना धारण करते, जे फूट निर्माण करत नाही, ज्यामुळे कोणताही संघर्ष निर्माण होत नाही आणि जे सर्वांमध्ये संतुलन निर्माण करते — जो मध्यम मार्ग आहे — तो धर्म आहे.


हे जगाला देणे ही आपली नियती आहे.


आणि ज्या ठोस पायावर हा धर्म समजला जातो, तो म्हणजे अस्तित्वाचे एकत्व, एकात्मता.


हेच आपले सत्य आहे.


आज आपण अशा देशात बसलो आहोत जिथे चर्चेचा विषय Pluralism — बहुवाद आहे.


मी त्या देशातून आलो आहे आणि तुमच्यापैकी अनेकांची जन्मभूमी तो देश आहे, जिथे आपण विविधतेतील एकत्वाचा अनुभव घेतला आहे.


आपण त्या विविधतेचा उत्सव साजरा करतो, कारण ती एकत्वाची सजावट आहे.


त्या देशात आपण वनस्पतींची पूजा करतो.


का पूजा करतो?


दररोज नाही.


एक दिवस एक पूजा असते, दुसऱ्या दिवशी दुसरी पूजा असते.


आजकाल आपण Father's Day, Mother's Day वगैरे साजरे करतो.


का?


कारण आपण त्यांच्याप्रती असलेल्या आपल्या कर्तव्याची आठवण ठेवतो.


त्याचप्रमाणे आपण पर्यावरणाप्रती असलेल्या आपल्या कर्तव्याची आठवण ठेवतो.


केवळ पूजा करून काही होत नाही.


आपल्याला ते कर्तव्य समजून घेतले पाहिजे आणि ते पूर्ण केले पाहिजे.


म्हणून जगाकडे सर्वकाही असूनही एक म्हणून पाहणे ही आपली दृष्टी आहे.


आपल्या संतांनी प्रार्थना केली आहे.


ते दुष्ट व्यक्ती, पापी, शत्रू इत्यादींबद्दल काय म्हणतात?


ते म्हणतात — ठीक आहे, असे लोक आहेत.


ही भौतिक जीवनाची वस्तुस्थिती आहे.


पण ते त्यांच्या विनाशासाठी प्रार्थना करत नाहीत.


ते म्हणतात —


त्यांची वाईट बुद्धी नष्ट होऊ दे.


“शत्रुबुद्धी विनाशाय”


त्यांच्यातील शत्रुत्वाची भावना नष्ट झाली पाहिजे.


कारण आपल्याला माहीत आहे की आपले शत्रू आणि आपणही एकच आहोत.


आणि ही शत्रुत्वाची भावना कायमस्वरूपी नाही.


ती मनुष्याने निर्माण केलेली आहे किंवा जगातील वेगवेगळ्या परिस्थितींचा परिणाम आहे.


म्हणून आपण खरे शत्रू नाही.


आपल्याला त्रास देणारी गोष्ट म्हणजे त्यांची दुष्टता.


म्हणून ती दूर झाली पाहिजे.


ही आपल्या पूर्वजांनी आपल्याला दिलेली अत्यंत विशाल हृदयाची दृष्टी आहे.


आणि आज रक्षाबंधनाचा दिवस साजरा करताना आपल्याला हे लक्षात ठेवले पाहिजे की आपण राखी बांधतो, हे बंधन बांधतो.


हे बंधन काय आहे?


ते तुम्हाला मर्यादित करत नाही.


जेव्हा तुम्ही इतरांची जबाबदारी स्वीकारता, तेव्हा ते तुम्हाला मुक्त करते.


आपल्या एका गीतामध्ये म्हटले आहे —


“बंधनकारी पाश नहीं यह, अरे मुक्ति का है बंधन यह.”


हे एखादे कठोर बंधन नाही.


हे असे बंधन आहे जे तुम्हाला इतरांच्या काळजीशी जोडते आणि त्यामुळे तुम्ही मुक्त होता.


तुम्हाला जाणवते की तुम्ही केवळ तुमच्या शरीरात जगत नाही, तर तुम्ही सर्वत्र जगत आहात.


आणि हे केवळ एक व्याख्यान नाही.


याची अनुभूती आपल्या ऋषींनी घेतली आहे.


मी तुम्हाला रामकृष्ण परमहंसांबद्दल सांगितले.


ते एका झाडाच्या सावलीत बसले होते. गंगेकडे पाहत होते आणि जवळजवळ ध्यानावस्थेत होते.


ते आजूबाजूच्या वातावरणाशी एकरूप झाले होते.


आणि एक गाय आली आणि गंगेच्या काठावरील हिरवळीवर चरत होती.


ते ओरडले —


“अरे देवा! मला तुडवले जात आहे. मला तुडवले जात आहे.”


लोक धावत आले आणि त्यांनी पाहिले की त्यांच्या छातीवर गायीच्या पायांच्या दाबाच्या खुणा होत्या.


ही काही मिथक कथा नाही.


हे नोंदवले गेले आहे.


कारण रामकृष्ण परमहंस हे १९व्या शतकात होते.


त्यामुळे त्या सर्व घटना नोंदवल्या गेल्या आहेत.


अशा प्रकारचे एकत्व प्राप्त करणे हा जीवनाचा उद्देश आहे.


आणि म्हणून आपण रक्षाबंधन करतो.


मग आपले कर्तव्य काय आहे?


आपण अमेरिकेत आहोत.


आपण अमेरिकेत राहतो.


आपण अमेरिकेत कमावतो.


म्हणून आपण अमेरिकेचे आहोत.


आणि आपण अमेरिकेशी प्रामाणिक राहून वागले पाहिजे.


भारतीय डायस्पोराचे, म्हणजेच परदेशातील भारतीयांचे, त्यांच्या कर्मभूमीप्रती प्रत्येक कर्तव्य आहे.


त्यांनी ते कर्तव्य पूर्ण केले पाहिजे.


भारत त्यांची जन्मभूमी आहे.


त्यांना भारतासाठी काही करायची इच्छा असेल आणि ते ते करू शकत असतील, तर आपल्या कर्मभूमीप्रतीचे कर्तव्य पूर्ण केल्यानंतर ते ते करू शकतात.


त्याला मनाई नाही.


पण ते बंधनकारक नाही.


तुमच्या जन्मभूमीला तुमच्याकडून अपेक्षा आहे की तिने तुम्हाला दिलेली मूल्ये तुम्ही पुढे घेऊन जावीत.


आणि हेच मूल्य आहे.


हेच मूल्य आहे — एकत्व.


आपण मनुष्यांशी एक आहोत.


आपण निसर्गाशी एक आहोत.


आपण जे काही करतो ते केवळ आपलेच अस्तित्व टिकवणारे नसावे, तर जे काही आवश्यक आहे ते सर्व टिकवणारे असावे.


पाहा, जग अनेक समस्यांना सामोरे जात आहे.


विकासामुळे पर्यावरणाचा नाश होतो.


पर्यावरणाचे संरक्षण करायचे म्हणजे विकास थांबवावा लागतो.


मग मार्ग काय?


आपल्याला तो मार्ग जगाला द्यायचा आहे.


आणि आपल्या पूर्वजांनी हा मार्ग त्यांच्या स्वतःच्या त्यागातून, त्यांच्या स्वतःच्या संयमातून दिला आहे.


आपल्या पुराणांमध्ये एक कथा आहे.


एक राजपुत्र होता — जिमूतवाहन.


पक्षी आणि साप हे एकमेकांचे शत्रू होते.


आजही ते निसर्गात तसेच आहेत.


बहिरी ससाणा, गरुड आणि साप — ते एकमेकांचे शत्रू आहेत.


आणि काही प्रकारे गरुडांचे वर्चस्व झाले.


मग एक करार झाला —


“ठीक आहे, तुम्ही येऊन आम्हाला नष्ट करू नका. आम्ही तुम्हाला दररोज एक साप देऊ.


तुम्ही येथे या.


या खडकावर तो साप बसलेला असेल.


तुम्ही त्याला घेऊन जा आणि इतरांना सोडा.”


हा जिमूतवाहन एक मनुष्य होता.


त्याला या गोष्टीची माहिती मिळाली आणि त्याला वाईट वाटले.


“स्वतःला वाचवण्यासाठी त्यांना अशा प्रकारे बलिदान का द्यावे लागते?”


तो त्या खडकावर गेला आणि गरुडाला म्हणाला —


“तू मला घेऊन जा. सापाला मारू नकोस.


मला समजते की तो तुझा शिकार आहे आणि तुला मांस खावे लागते.


पण तुला सापाचे मांस खाण्याची गरज नाही.


तू माझे मांस घेऊ शकतोस.”


अशा प्रकारे आपण या सर्वांचे संरक्षण केले आहे.


“जगाने माझ्यासाठी काय केले?” असे विचारू नका.


“माझ्या जन्मभूमीने माझ्यासाठी काय केले?” असे विचारू नका.


“माझ्या कर्मभूमीने माझ्यासाठी काय केले?” असेही विचारू नका.


मुद्दा असा आहे की तुम्हाला हे शरीर आणि हे जीवन या सर्वांची सेवा करण्यासाठी मिळाले आहे.


आपण सर्व जीवनाच्या या टप्प्यावर आलो आहोत.


आपण मोठे झालो आहोत.


आपण कमावत आहोत.


आपण शिकत आहोत.


आणि आपण प्रगती करू.


पण आपल्याला ही क्षमता कोणी दिली?


आपल्याला हे शरीर कोणी दिले?


आपले आई-वडील.


तुम्ही जे अन्न खाता, त्यामागे जगात कुठेतरी शेती आहे.


म्हणूनच तुम्ही खाऊ शकता.


जर शेतकऱ्यांनी शेती करणे थांबवले तर तुम्ही काय खाल?


तुम्ही जे कपडे घालता कारण गिरण्यांमध्ये लोक काम करत आहेत.


कापूस पिकवणारे शेतकरी अजूनही आहेत.


आपण प्रत्येक गोष्टीचे कोणातरी ऋणी आहोत.


आपण जगाकडून घेतो.


म्हणून आपल्याला परत द्यावे लागेल.


आपण किती कमावतो हे महत्त्वाचे नाही.


आपण किती वाटून देतो हे महत्त्वाचे आहे.


तुम्ही करिअरचा विचार करता.


करिअर म्हणजे फक्त पैसा आहे का?


करिअर म्हणजे फक्त भौतिक सुख आहे का?


असे नाही.


चार पुरुषार्थांमध्ये अर्थ आणि काम हे भौतिक जीवनाशी संबंधित दोन महत्त्वाचे पुरुषार्थ आहेत.


आपल्या उपनिषदांमध्येही सांगितले आहे की केवळ मोक्षाच्या मागे जाऊ नका.


तुम्हाला भौतिक यशही प्राप्त करायचे आहे.


जग चालू ठेवायचे असेल तर जन्मानंतर लगेच संन्यास घेता येत नाही.


प्रथम ब्रह्मचर्य, त्यानंतर गृहस्थ, त्यानंतर वानप्रस्थ आणि मग संन्यास.


म्हणून तुम्हाला शिकायचे आहे.


तुम्हाला जीवन टिकवायचे आहे.


आणि तुमचा अनुभव पुढील पिढीला द्यायचा आहे.


त्यानंतरच तुम्ही आत्म्याच्या शोधाकडे जाऊ शकता.


ही आपली व्यवस्था आहे.


म्हणून कमाई करणे नाकारलेले नाही.


तुम्हाला तुमचे शरीर तंदुरुस्त ठेवायचे आहे.


तुम्हाला तुमच्या क्षमता तंदुरुस्त ठेवायच्या आहेत.


तुम्ही आवश्यक तेवढे उपभोगले पाहिजे.


आणि त्यासाठी तुम्ही विद्या आणि अविद्या दोन्ही शिकल्या पाहिजेत.


पण उद्देश काय?


“आत्मनो मोक्षार्थम् जगद्धिताय च.”


मला परत द्यायचे आहे.


ही आपली परंपरा आहे.


आणि भारतात राहणाऱ्या भारतीयांकडून ही अपेक्षा आहे.


ते भारतासाठी प्रयत्न करतील.


ते परदेशात राहणाऱ्या आपल्या बांधवांचीही काळजी घेतील.


जे अमेरिकेत किंवा इतर देशांमध्ये राहतात, म्हणजेच डायस्पोरा, ते आपल्या कर्मभूमीसाठी काम करतील.


त्यांना वेळ मिळाला, साधन मिळाले तर ते भारताचीही काळजी घेऊ शकतात.


पण भारत त्यांच्याकडून अशी अपेक्षा करत नाही.


भारताची अपेक्षा आहे की तुम्ही जगा.


भारताने तुम्हाला जीवन जगण्याची जी कल्पना दिली आहे, त्यानुसार जगा.


कारण हे मानवाच्या शाश्वत जीवनाचे मॉडेल आहे.


अन्यथा, Sapiens मध्ये आपण वाचतो की अन्नसाखळीमध्ये मनुष्य फार उशिरा आला आणि सुरुवातीला तो खालच्या स्तरावर होता.


पण ३००० वर्षांच्या आत तो मध्यभागी आला आणि ७००० वर्षांत तो शीर्षस्थानी पोहोचला.


त्याने ८००० वनस्पतींच्या प्रजाती आणि सुमारे ५००० प्राण्यांच्या प्रजाती नष्ट केल्या.


प्राणी पळू शकत होते.


म्हणून त्यांनी स्वतःला वाचवले.


वनस्पती पळू शकत नव्हत्या.


म्हणून त्या वाचू शकल्या नाहीत.


ही मानवाच्या जीवनाची पद्धत नाही.


मनुष्य सर्वात बुद्धिमान आहे.


आणि “मी या सृष्टीचा स्वामी आहे” या अहंकारासह तो जगतो.


स्वामी असाल तर सर्वांची काळजी घ्याल.


पण ठीक आहे, तुम्ही सर्वात बुद्धिमान आहात.


तुम्ही निसर्गाच्या मर्यादा ओलांडल्या आहेत.


आणि तुम्ही चांगले जीवन जगत आहात.


पण ते टिकवून ठेवणे हे तुमचे कर्तव्य आहे.


आपल्याला एकमेकांची काळजी घ्यावी लागेल.


अशा प्रकारे काळजी घ्यावी लागेल की माझे जीवन इतरांचे जीवन टिकवणारे जीवन असेल.


मी इतरांना टिकवून ठेवीन.


मी केवळ स्वतः जगेन आणि इतरांना जगू देईन असे नाही.


तर इतरांना जगवीन.


हा संदेश आहे.


आणि याच सूत्राद्वारे आपण या स्वप्नाची पूर्तता करू शकतो.


शाश्वत सत्याची अनुभूती घेण्याचे हे स्वप्न आहे.


आपल्याला त्याची माहिती असो वा नसो, सत्य अस्तित्वात आहे.


ते टिकून राहील आणि त्याचा परिणाम होईल.


पण जर आपण या जगाला अशा पद्धतीने टिकवून ठेवले तर त्या सत्याचा लाभ आपल्यालाही होईल आणि सर्वांनाही होईल.


म्हणून आज आपल्या जीवनात आपल्याला एक संकल्प करायचा आहे.


“ठीक आहे, आतापर्यंत जे काही झाले ते झाले.


आता यापुढे तरी मी माझ्या जीवनाचा विचार करीन.


एका वेळी एक छोटी गोष्ट.


एका वेळी एक छोटे पाऊल.


आणि मी माझ्या जीवनाला असे जीवन बनवीन जे टिकवून ठेवणारे जीवन असेल.”


मी येथे बसलो असताना तुम्हाला माहीत आहे की आपला एक कार्यक्रम आहे — पंच परिवर्तन.


आणि आपण तो समाजात घेऊन जात आहोत.


सर्वप्रथम या गोष्टी आपल्याला स्वतःच्या जीवनात आणायच्या आहेत आणि नंतर त्या समाजात घेऊन जायच्या आहेत.


त्या कोणत्या आहेत?


त्या अशा गोष्टी आहेत ज्या अशी जीवनपद्धती निर्माण करतात की ज्यामध्ये मनुष्य स्वतःचे जीवन समाधानाने जगतो, त्याला कोणत्याही गोष्टीची कमतरता भासत नाही.


तो स्वतः जगतो.


आणि त्याच वेळी तो इतरांनाही त्याच पद्धतीने जगवतो.


तो मानवतेला टिकवतो.


तो पर्यावरणाला टिकवतो.


तो सृष्टीला टिकवतो.


तो अस्तित्वाला टिकवतो.


हेच ध्येय आहे.


हेच आपल्या प्राचीन ऋषींनी पाहिलेले आदर्श मानवी जीवन आहे.


त्यांनी त्यासाठी एक संपूर्ण राष्ट्र निर्माण केले.


“मधुरं इच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः तपोऽधिकं शमुपासेदुरग्रे ततो राष्ट्रं बलमोजसा दधाम.”


जगाच्या कल्याणाची भावना असलेल्या त्या सद्भावी ऋषींनी कठीण तपस्या केली आणि त्यातून आपल्या राष्ट्राची निर्मिती झाली.


कोणतेही राष्ट्र म्हणजे केवळ भौगोलिक भूमीचा तुकडा नाही.


सर्व राष्ट्रांना पूर्ण करण्यासाठी एक नियती असते.


ही भारताची नियती आहे.


चला, आपण भारतीय म्हणून या नियतीसाठी जागे होऊया आणि आपल्या कर्मभूमीप्रती तसेच जन्मभूमीप्रती आपली कर्तव्ये पूर्ण करूया.


जर आपण असे केले, तर अनेक समस्यांशी संघर्ष करणाऱ्या आणि प्रत्येक पावलावर अडखळणाऱ्या जगासाठी ते एक वरदान ठरेल.


आपल्याला जगाला टिकवून ठेवणे आवश्यक आहे.


आपल्याला या जगाला काही प्रकारचा आधार द्यायचा आहे.


आपल्याला या मार्गाने जायचे आहे.


आणि म्हणूनच आपण येथे आलो आहोत.


आपण रक्षाबंधनाची आठवण केली आहे.


आपण राखी बांधली आहे.


आणि आपण म्हणत आहोत —


“United in Oneness and Decorated by the Diversity.”


एकत्वामध्ये एकत्रित आणि विविधतेने सजलेले.


कारण विविधता नैसर्गिक आहे आणि एकता हे सत्य आहे.


हे आपण समजून घेतले पाहिजे.


आणि त्यानुसार आपले जीवन घडवले पाहिजे.


म्हणूनच तुम्हा सर्वांना येथे मोठ्या उत्साहाने पाहिल्यावर मला विचार करायला सुरुवात झाली.


आणि माझ्या मनात जे काही विचार आले, ते मी तुमच्यासमोर तुमच्या चिंतनासाठी मांडले.


आणि जर तुम्हाला ते योग्य वाटले, तर ते स्वतःच्या आचरणाचा भाग बनवा.


आपले मनःपूर्वक धन्यवाद.

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सोमवार, 28 सितंबर 2026

विश्व के कल्याण का सदैव क्रियान्वयन करनेवाली भारतीय संस्कृति का एकात्म मानव दर्शन

 20वीं सदी के महान विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘एकात्म मानव दर्शन’ का विचार हमारे सामने रखा। उनका जीवनकाल 1916 से 1968 तक रहा।  वर्ष 1937 में अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक बने। 1951 में जनसंघ इस राजनैतिक दल के कार्यकर्ता बने। जीवन के अंतिम क्षण 1968 तक जनसंघ के समर्पित पदाधिकारी रहे। उनके कार्यकाल में ही जनसंघ ने अखिल भारतीय स्वरूप प्राप्त किया। 1980 में इसका रूपांतरण भारतीय जनता पक्ष में हुआ, जो आज केंद्र व कई राज्यों से सत्ता में है।

           पार्टी  में वे एक कुशल संगठक, मार्गदर्शक, दार्शनिक थे। वे कहते थे, “

भिन्न-भिन्न राजनीतिक पार्टियों का अपने लिए एक दर्शन, सिद्धांत या आदर्श या क्रमिक विकास करने का प्रयत्न करना चाहिए। उन्हें कुछ स्वार्थों की पूर्ति के लिए एकत्र होने वाले लोगों का समुच्चय मात्र नहीं बनना चाहिए। उनका रूप किसी व्यापारिक प्रतिष्ठान या जॉइंट स्टॉक कंपनी से अलग होना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि पार्टी का दर्शन केवल पार्टी के घोषणा पत्र के पृष्ठों तक ही सीमित न रह जाए। सदस्यों को उन्हें समझना चाहिए और उन्हें कार्यरूप में परिणाम करने के लिए निष्ठापूर्वक जुड़ जाना चाहिए।’’ (1) 
 अर्थात वे केवल सिद्धांत पर निर्भर न रहते हुए उसे धरातल पर उतारने वाले कर्मयोगी थे।

 

   एकात्म मानवदर्शन क्यो'?        

   23-24 जनवरी 1965 में जनसंघ के विजयवाड़ा में आयोजित अखिल भारतीय अधिवेशन में सिद्धांत और नीति प्रलेख, जो उन्होंने तैयार किया था, उसे अंतिम रूप दिया गया। इसी प्रलेख ने एकात्म मानव दर्शन  को जनसंघ दल का आधिकारिक विचार घोषित किया। इस दर्शन का दीनदयाल जी ने मुंबई में अपने चार-चार भाषणों में 22 से 25 अप्रैल 1965 पहली बार सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत किया । एकात्म मानव दर्शन एक विचारधारा है, जिसमें मानव जाति के आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अंगों को दिशादर्शन करने की निश्चित रूप से क्षमता है।

       भारत को स्वतंत्रता मिलने के पश्चात इस पर विवाद चला कि अपने देश ने पूंजीवाद स्वीकारना चाहिए या समाजवाद, जो दोनों विचार यूरोप की भूमि का उपजे थे। भारत का उनसे कोई नाता नहीं था । वहाँ की परिस्थिति अनुरूप इन विचारधाराओं का जन्म हुआ था। दीनदयाल इस विचार को नकारते हुए कहते थे, ये दोनों विचार भौतिकवादी हैं। दोनों ही आचार आध्यात्मिकता का निषेध करते हैं।(2) ये विचारधारा मानव को व्यक्ति और समाज में बांटती है। व्यक्ति जीवन का विचार खंडित रूप से नही हो सकता, क्योंकि वह परिवार, समाज, सृष्टि और परमेष्ठी का संकलीत रूप है। इस शृंखला को तोड़कर सर्वांगीं विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। अर्थात ये सभी इकाइयां  परस्पर संबंधित और परस्परावलंबी हैं। इसलिए उन्होंने परस्पर पूरक रहना आवश्यक है।

    भारतीय परंपरा के अनुसार मानव एकात्म है, एकात्म यानी, जिस को बांटा नहीं जा सकता। न बांटे जाने वाली को इकाई को एकात्म कहते हैं। समाज और व्यक्ति इस प्रकार जुड़े हुए हैं, उन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता। मानव व्यक्ति के रूप में समाज का अभिन्न अंग है।(3) अर्थात मानव विकास की कल्पना टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं, अपितु  समग्रता से करना चाहिए। यही आधार है एकात्म मानव दर्शन का। यह दर्शन हिंदू जीवन की वैश्विक दृष्टि को दर्शाता है। एकात्म मानव दर्शन  के मूलभूत सूत्र निम्नानुसार हैं वैश्विक एकात्मता, वैयक्तिक आत्मीयता से वैश्विक आत्मीयता तक उन्नयन, त्रिगुणात्मक, चतुर्विध मानवी व्यक्तित्व, पुरुषार्थ चतुष्टय, आदि.

 एकात्म मानव दर्शन के केंद्रभूत विचार इस तरह है।

 (अ) यह दर्शन भारतीय चिंतन का युगानुकूल रूप है।

(ब) यह विचारव्यूह (Ideology) नहीं है बल्कि विचार प्रवाह है जो परिवर्तनीय है। क्रियान्वयन हेतु इसे पारिस्थितानुकूल ढाला जा सकता है। भारत में जन्मीं सभी विचारधाराएं इसका अंग हो सकती हैं।

(क) इस दर्शन को प्रत्यक्ष रूप देने के लिए चिंतक, परिष्कृत लोकमत, समाजमाध्यम, साहित्य परिचर्चा व विविध कलाएं साहाय्यभूत हो सकती हैं।

व्याप्ति : इस दर्शन का लक्ष्य क्या है? दीनदयाल कहते हैं— "

हमने किसी संप्रदाय या वर्ग की सेवा का नहीं बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की सेवा का व्रत लिया है। सभी देशवासी हमारे बांधव हैं। जब तक हम सभी बंधुओं को भारत माता के सपूत होने का सच्चा गौरव प्रदान नहीं करा देंगे, हम चुप नहीं बैठेंगे। हम भारत माता को सही अर्थों में सुजलाम्, सुफलाम् बनाकर रहेंगे। वह दश प्रहरण धारिणी दुर्गा बनकर असुरों का संहार करेगी, लक्ष्मी बनकर जन-जन को समृद्ध करेगी और सरस्वती बनकर अज्ञानांधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलायेगी.... जब तक देश में एकरसता, कर्मठता, समानता, संपन्नता, ज्ञानवता सुख और शांति की सप्तजाह्नवी का पुण्यप्रवाह नहीं ला पाते, हमारा भगीरथ तप पूरा नहीं होगा........ विजय का विश्वास है, तपस्या का निश्चय लेकर चलें!"(4)    
दीनदयाल जी इस दर्शन द्वारा मानवी जीवन से लेकर सृष्टि तक सभी विषयों को स्पर्श करते हैं और लक्ष्य प्राप्ती हेतु साधना का आग्रह करते हैं। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश, राष्ट्रसुरक्षा, आर्थिक संपन्नता, शिक्षा ये इन सारे विषयों पर अपना मंतव्य देते हैं। उनका जीवन एक श्रेष्ठ, कर्मठ, त्यागी, राष्ट्रभक्त का जीवन था। उनके विचार केवल कल्पनाजगत में नहीं अपितु प्रत्यक्ष रूप देने के लिए थे।

एकात्म मानवदर्शन – क्रियान्वयन के प्रयास

दीनदयालजी के सहकारी स्व. भारतरत्न नानाजी देशमुख ने 1968 में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना कर एकात्म मानवदर्शन को कृतिरूप देने का प्रयास किया।

1972 में मध्य प्रदेश के सतना जिले में पवित्र चित्रकूट क्षेत्र को इस प्रयोगार्थ चुना गया और कृषि, उद्योग, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि विषयों पर जनसहभागिता की मदद से कार्य प्रारंभ किया।

उसी प्रकार उत्तर प्रदेश का गोंडा जिल्हा और महाराष्ट्र का बीड जिल्हा भी कार्य हेतु लिया गया।

(अ) कृषि विकास :- इस संदर्भ में डॉ. जितेन्द्र बजाज कहते हैं 

– "दीनदयाल उपाध्याय केवल कृषि को प्रथम प्राथमिकता देने और कृषि की पैदावार बढ़ाने की बात नहीं करते; एकात्म अर्थनीति में वे इसके लिए उपयुक्त उपायों पर भी विचार करते हैं। उन्नत बीजों की आवश्यकता पर बल देते हैं, अच्छे औजारों की उपलब्धी की बात करते हैं, रासायनिक उर्वरक और जैविक खाद के सम्यक, संतुलित उपयोग की बात करते हैं... कृषि को अदेवमातृका बनाने की चर्चा करते हैं।"(5)

इन विचारों के क्रियान्वयन की दृष्टि से चित्रकूट इलाके में गनीवा और मझगवां में दो बड़े कृषि विज्ञान केन्द्र और मॉडल फार्म हैं, जहां किसानों को कम लागत में अधिक पैदावार और जलवायु के अनुसार खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।

महाराष्ट्र के बीड जिले में ग्रामीण विकास संस्था 1992 में प्रारंभ हुई। अंबाजोगाई में कृषि विज्ञान केन्द्र के माध्यम से आधुनिक खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है।

उत्तर प्रदेश राज्य के गोंडा में 2,50,000 एकड़ खेती सिंचित हुई, 95,000 किसान लाभान्वित हुए और 2008 गांव को फायदा हुआ। 27000 ट्यूबवेल्स तैयार की गयीं केवल दो वर्षों में। बीड जिले में श्रम साधना शिविर आयोजित कर 4 लाख क्युबिक मीटर गाद (Silt) जलाशयों से निकाला गया। उसे खेतों में डाला गया, जिससे जमीन अधिक उपजाऊ बनी, जल स्तर बढ़ा।

(2) रोजगार और उद्यमिता :-

(अ) उद्यमिता विद्यापीठ : चित्रकूट में उद्यमिता विद्यापीठ की स्थापना की गयी, यहां ग्रामीण युवाओं और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रशिक्षण दिया जाता है। कुटीर उद्योग जैसे खाद्य प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, अगरबत्ती निर्माण का प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है।

(ब) औद्योगिक प्रशिक्षण केन्द्र (ITI) :- युवकों को तकनीकी कौशल सिखाने के लिए संस्थान ITI केन्द्र भी संचालित करता है। गोंडा में जनशिक्षण संस्थान सन 2000 से सैकड़ों ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित कर रहा है।

(3) स्वास्थ्य और चिकित्सा :-  यहां 53 एकड़ में फैला एक विशाल आयुर्वेदिक एवं प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र है। दंत चिकित्सा की भी व्यवस्था है, इसे 'आरोग्यधाम' कहते हैं।

चित्रकूट रसशाला में शुद्ध और प्रामाणिक आयुर्वेदिक दवाओं का निर्माण किया जाता है।

एक ऑपरेशन थिएटर, प्रसुती एवं बालचिकित्सा केन्द्र, आयुर्वेद अनुसंधान पुस्तकालय, जड़ी-बूटी बगिया, ग्रामीण लोगों के लिए मौसमी बीमारियों के इलाज हेतु 'दादी मां का बटुआ' भी तैयार किया है।

शिक्षा व्यवस्था :- दीनदयाल उपाध्याय कहते थे

— "शिक्षा निःशुल्क होनी चाहिए। किसी को पैसे नहीं हैं इसलिए शिक्षा से वंचित नहीं रहना पड़ना चाहिए। शिक्षा का आर्थिक दायित्व केवल इंसान का नहीं होता है।" शिक्षा समाज का दायित्व है... शिक्षा की व्यवस्थात्मक अधिकार वास्तव में तो शिक्षक का ही होना चाहिए।"(6) 
इस दृष्टि से चित्रकूट में सुरेन्द्र पाल ग्रामोदय विद्यालय 1100 छात्रों को शिक्षा प्रदान करता है, रामनाथ आश्रमशाला 325 आदिवासी बच्चों के लिए आवासीय सह शिक्षा विद्यालय चलाता है, परमानंद आश्रम पद्धति विद्यालय गनीवन में 125 अनुसूचित जाति के बच्चों के लिए एक आवासीय सह शिक्षा विद्यालय चलाता है।

     एक गुरुकुल है जिसमें 100 बच्चों को 10-10 बच्चों के समूह सेवानिवृत्त दम्पतियों के साथ रखकर बच्चों में मूल्यों का संचार किया जाता है।

नागपुर का बालजगत प्रकल्प :- नागपुर के लक्ष्मी नगर स्थित बालजगत प्रकल्प का उद्घाटन 11 फरवरी 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखरजी ने किया। यह नानाजी देशमुख के बाल विकास पर विचारों का मूर्त रूप है। यहाँ संगीत, ललित कला, व्यक्तित्व विकास, योग आदि क्षेत्रों में बच्चों की प्रतिभाओं को निखारने का एक अनौपचारिक केंद्र है। इस प्रकार, यह केंद्र उचित वातावरण और सुविधाएं प्रदान करके 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों की जन्मजात प्रतिभाओं को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चों में टीम भावना और भाईचारे को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया जाता है। बच्चों की प्राकृतिक प्रतिभाओं को विकसित करने के लिए उपयुक्त वातावरण और आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित एक आधुनिक बाल उद्यान का निर्माण किया गया है। यह उद्यान सभी बच्चों के लिए खुला है, चाहे वे अमीर हों या गरीब, और अपनी अनूठी अवधारणा के कारण बच्चों के बीच बहुत लोकप्रिय है।(7)

चित्रकूट में समाज शिल्पी दम्पती का योगदान :-  

        शोध संस्थान द्वारा उच्चशिक्षित विवाहित दम्पतियों को समाज कार्य के लिए निमंत्रित किया जाता है। पति-पत्नी होने के कारण समाज के सभी घटकों तक उनकी पहुंच होती है। एक दंपती का 5 गांवों के समूह (cluster) का दायित्व कार्य के लिए सौंपा जाता है, उन्हें वहीं निवास करना पड़ता है, गांव के लोगों के पारस्परिक सहकारिता से वे अपना दायित्व पूरा करते हैं और लोगों को प्रेरित कर विकास कार्यों को आगे बढ़ाते हैं।

स्वावलंबन अभियान (Self Reliance Campaign) :-

         चित्रकूट में 2002 से आत्मनिर्भरता अभियान चलाया जा रहा है। इसके अंतर्गत 500 गांवों को दत्तक लिया गया। 2005 में 80 गांवों को स्वयंनिर्भर घोषित किया गया। इन देहातों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए निम्नलिखित विषयों पर कार्य किया गया।

1)बेरोजगारी निर्मूलन 

2)कृषि उत्पाद में वृद्धि 

3)निरक्षरता निर्मूलन 

4) साफ-सुथरा हरा-भरा  पर्यावरण 

5)मंगल स्वास्थ्य  

6)सार्वजनिक सुविधाएं 

7) बगैर न्यायालय बातों को सुलझाना 

8)सामाजिक चेतना आदि।

दीनदयाल उपाध्याय जी कहते थे

 "मानव केवल भौतिकवादी नहीं हो सकता, मानव की आध्यात्मिक आवश्यकताएं भी हैं तथा इन दोनों का विकास मानवता के लिए जरूरी है।"(8)

अर्थात मानव व्यक्ति शरीर, मन, बुद्धी, आत्मा का संकलित रूप है। प्रत्येक अंग की जरूरत भिन्न होती है।

     इस दृष्टि से चित्रकूट में 'रामदर्शन' स्थापित किया गया। भगवान श्रीराम के आदर्शों, मानवीय मूल्यों और रामायण के संदेशों को कला के माध्यम से समाज में फैलाना और लोगों को नैतिक आचरण के लिए प्रेरित करना इसका उद्देश्य है। चित्रकूट यह भगवान श्रीराम की तपोभूमि रही। गोस्वामी तुलसीदास और महर्षि वाल्मीकि जी की यादें भी इसी क्षेत्र से जुड़ी हैं। यह स्थान पर्यटकों को तथा दर्शनार्थियों को अपनी समृद्ध संस्कृति से जोड़ता है।

इस प्रकार दीनदयाल शोध संस्थान द्वारा एकात्म मानवदर्शन को यथा कृतिरूप देने के प्रयास किए गये हैं।

केंद्र शासन के प्रयास

भारतीय जनता पार्टी के संविधान के अनुच्छेद तीन अनुसार एकात्म मानववाद भाजपा का मूलदर्शन है।(9) इसके ही प्रकाश में बीजेपी प्रणीत सरकारें विविध योजनाएं बनाती हैं और दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवदर्शन प्रणीत विचारों को धरातल पर उतारने का प्रयास करती हैं।

       उपाध्याय कहते थे कि

 "अपनी सारी योजनाओं का लक्ष्य समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ती का विकास होना चाहिए। जो अंत्योदय कहलाता है। वह भूख और भय से मुक्त होना चाहिए।" इस दृष्टि से केंद्रशासन निम्नानुसार योजनाएं बनाईं

—

(1) अंत्योदय अन्न योजना :-

              समाज के अति गरीब से गरीब परिवारों को पहचान कर उन्हें सस्ते और रियायती दरों पर खाद्यान्न उपलब्ध कराना तथा अंत्योदय कार्ड धारकों को हर माह 35 किलो राशन दिया जाता है। निर्धन परिवार, दिव्यांग, निराश्रित वृद्ध इसके लिए पात्र हैं।

(2) दीनदयाल अंत्योदय योजना (DAY) :-

यह योजना गरिबी कम करने और आजीविका के साधन बढ़ाने के लिए है। इसके दो हिस्से हैं—

(अ) राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन : यह शहरी गरीबों को कौशल प्रशिक्षण देकर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती है।

(ब) राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन : यह ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाती है।

           प्रधानमंत्री जनधन योजना द्वारा करोड़ों लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ दिया गया। आयुष्मान भारत योजना के अंतर्गत पांच लाख तक आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुफ्त स्वास्थ्य बिमा देकर चिकित्सा सुरक्षा प्रदान की जाती है।

        पीएम किसान सम्मान निधि योजना के तहत वर्ष मे छः हजार किसानों के खाते में निश्चित राशि  जमा किया जाता है। पीएम आवास योजना द्वारा गरीबों को पक्के मकान कम कीमत में, जल जीवन मिशन द्वारा पाईप द्वारा शुद्ध पेयजल और पीएम स्वनिधि द्वारा छोटे व्यवसाय करनेवालों को वित्तीय सहायता दी जाती है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए नारी शक्ति वंदन अधिनियम, सुकन्या समृद्धी योजना है।(9)

          इ.स. 2000 में पंतप्रधान अटल बिहारी वाजपेयी इनके कार्यकाल प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना बनाई गयी ताकि देहातों को जोड़ा जाय और उन्हें आर्थिक उन्नति के मार्ग खोल दिये जाय। शिक्षा विभाग की प्रगति के लिए सर्व शिक्षा अभियान प्रारंभ किया। 'सब का साथ सब का विकास' इस घोषणा के पीछे दीनदयाल उपाध्याय की प्रेरणा है।

             समान नागरी कानून के लिए कई राज्य प्रयास कर रहे हैं। 'एक देश, एक जन, एक संस्कृति' इस विचार को यह पहल प्रकट करती। संविधान की धारा 370 को समाप्त कर कश्मीरियों की अलगाववादी प्रवृत्ति पर काबू पाया लद्दाख के विकास के रास्ते खुल गये हैं।

(2) आत्मनिर्भर भारत अभियान :- Vocal for local का नारा इसी स्वदेशी और स्वावलंबन के विचार से प्रेरित है।

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और भारतीयता का गौरव :-

इस दर्शन के अनुसार भारत का विकास पश्चिमी मॉडेल के अंधी नकल से नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और परंपराओं से जुड़कर ही हो सकता है। इसके तहत भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक परिसर का विकास, तीर्थ स्थलों को प्रधान रास्तों से जोड़ना, योग को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाना आदि कार्य सांस्कृतिक पुनरुत्थान और भारतीय पहचान को दर्शाते हैं।

(4) समग्र विकास :-

              एकात्म मानवदर्शन मनुष्य के केवल एकांगी विकास की बात नहीं करता, बल्कि शरीर, मन, बुद्धी और आत्मा के एकीकृत और संतुलित विकास पर वकालत करता है। सरकार की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 NEP इसी विचार पर आधारित है, जिसका उद्देश्य युवाओं को केवल पेशेवर विकास नहीं करना है बल्कि उन्हें नैतिक मूल्यों, अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़कर एक पूर्ण मानव बनाना है।

      - सुरक्षा नीति पर प्रभाव :-

(अ) आत्मनिर्भरता :- भारत की वर्तमान सुरक्षा नीति आत्मनिर्भर भारत पर आधारित है। रक्षा उपकरणों का स्वदेशी उत्पादन एकात्म मानव दर्शन की आर्थिक और सामाजिक स्वायत्तता की सोच से मेल खाता है।

(ब) विश्वशांति के लिए प्रयास :-

हम ने सारी पृथ्वि को एक परिवार माना है। 'वसुधैव कुटुंबकम्' का पक्षधर है भारत। इसलिए भारत की सुरक्षा नीति आक्रामक नहीं बल्कि रक्षार्थ है, शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की है। संपूर्ण मानवता का हित सर्वोपरी यही एकात्म मानव दर्शन का संदेश है।

अन्य गैरशासकीय संगठन, व्यक्तियों के इस दर्शन के क्रियान्वयन हेतु प्रयास :-

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : सेवा विभाग द्वारा प्रेरित ग्राम विकास (10)

समग्र ग्राम विकास की योजनाएं, रा०स्व० संघ के स्वयंसेवकों द्वारा संचालित और क्रियान्वित की जाती हैं। ग्राम विकास के पांच आयाम हैं —

(क) शिक्षा :- कोई निरक्षर ना हो, साक्षर गांव- शिक्षीत गाव

(ख) स्वास्थ्य :- सभी ग्रामवासी स्वस्थ हों। प्राथमिक चिकित्सा सुविधा गांव में ही उपलब्ध हो।

(ग) समरसता :- छुआछूत, भेदभाव, कुरितियां ना हों, भाईचारा हो।

(घ) संपन्नता :- कोई भूखा ना हो, सबको रोजगार उपलब्ध हो।

(ङ) सुरक्षा :- गांव विवादमुक्त तंटामुक्त हो। अंदर से और बाहर से समाजविघातक शक्ति से मुक्त हो, स्वसंरक्षित हो।

यह अभियान लेकर देश के लगभग सभी प्रांतों में ग्राम विकास कार्य शुरू है। एक दृष्टि से यह कार्यक्रम द्वारा एकात्म मानवदर्शन का हेतु प्रकट होता है ।

            सारांश में हम कह सकते हैं कि एकात्म मानव दर्शन की व्याप्ति व्यक्ति से लेकर विश्व तक है । सभी को सुखमय जीवन जीने का पथ प्रदर्शक है यह दर्शन । दीनदयाल कहते हैं

, "इस आधार पर हम चले तो भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों के साथ राष्ट्रीयता, प्रजातंत्र, समता और विश्व एकता के आदर्शों को एक समन्वित रूप में रख सकेंगे ।"

             इस दर्शन के क्रियान्वयन अभी तक अल्पमात्रा में प्रयास किये गये। शेष कार्य पूर्ण करना सभी का दायित्व है। दीनदयाल जी के विचार व्यवहार्य तथा प्रासंगिक हैं ।

संदर्भ :-

1)                 दीनदयाल उपाध्याय 'पोलिटिकल डायरी' पृष्ठ क्र - 188

2)                 एकात्म मानववाद - तत्वमिमांसा, सिद्धान्त, विवेचन - पृ. 64

3)                 तत्रैव - पृष्ठ 65

4)                 दीनदयाल उपाध्याय का भाषण कालीकट (केरल) दि. 25 सप्टें 1967

5)                 डॉ. जितेन्द्र बजाज 'कृषिसंबंधी चिंतन' (एकात्म मानव दर्शन विचार संग्रह पृ. 122)

6)                 डॉ. इंदुमती काटदरे - एकात्म मानव दर्शन और शिक्षा पृष्ठ-71

मंगलवार, 22 सितंबर 2026

आप जनरल कास्ट है!


एकेडमिक सुईसाईंड क्या होती है? मुझसे बेहतर कौन जान सकता है, बात २०१० की है इलाहाबाद उच्च न्यायालय का राम मंदिर मामले के ठीक कुछ महीनों पहले, मेरी रैगिंग ही एक महिला प्राध्यापक ने कराई थी, जो कि पुणे यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र विभाग में जेंडर स्टडीज पढ़ाती थी। मै उस समय पुणे यूनिवर्सिटी में हॉस्टल में रहकर समाजशास्त्र विभाग में पढ़ रहा था। फर्स्ट सेमिस्टर में टॉप करने के बाद द्वितीय सेमिस्टर से यह शुरुआत हुई थी। टॉपर रहने पर भी तीसरे सेमिस्टर में मुझे एडमिशन नहीं दिया गया था। उसके लिए कुलगुर के कार्यालय के चक्कर २ महीनों तक लगाने पड़े। उस समय समाजशास्त्र की विभाग प्रमुख स्वाती शिरवाडकर द्वारा मेरे पिताजी के नाम पत्र भेजा गया। जिसपर मेरे द्वारा किए जा रहे आंदोलन पर पिताजी द्वारा अंडरटेकिंग लिया जाना था। अन्याय के विरोध में किए गए मेरे द्वारा आंदोलन उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं आए जो व्यवस्था न्याय, समता बंधुता छात्रों को पाठ्यक्रम में सिखाती है। Institutional Injustice कहा जाता है जब संस्थान ही अन्याय करता है, बार बार अन्याय करता है। वह निरंकुश होता है। 

यह लिखने का प्रयोजन किसी की भूमिका का पक्षधर होना नहीं है। कोई सही हो सकता है तो कोई गलत भी हो सकता है। न मारनेवाले का पक्ष और न आत्महत्या करनेवाले का पक्ष मै ले सकता हूं । यह व्यवस्था में सुधार होगा ऐसी आशा की रत्ती भर गुंजाइश भी मुझे नहीं है। बताना भूल गया हूं मै जाति न मानने वाली जनरल कास्ट से हूं। भारतीय संविधान ने मुझे हिम्मत नहीं दे रखी है, कानून के पालनहारे भी इस पर मौन ही रहते है। इतना अपाहिज बना दिया है कि मै यहां अत्याचार पीड़ित की दास्ताँ लिखूं तो मुझपर वर्तमान में वंचित शोषित पीड़ित सशक्तिमान कोई व्यक्ति इस लिखने भर से आहत होकर मुझपर केस कर दे, कोई अन्य तो छोड़िए मेरे साथी जिन्हें मैं भारतमाता की संतान मानता हूं वे  भी पीछे न रहेंगे इतना मुझे उनपर विश्वास हो गया है। मेरे सहपाठी साथी जो कि उसी अनुसूचित जातियों से संबंधित है उस समय मुझपर हो रहे अन्यायपूर्ण अत्याचार की संवेदना भी उन्हे छू नहीं सकी।

रोहित वेमुला की आत्महत्या पर चिल्लाने वाली मीडिया से समझ सकते है कि वह केवल जातिगत आत्महत्याओं पर ही मुखर रही है। मेरिट की आत्महत्याएं मनोरंजन मात्र है। अब आईआईटी बॉम्बे में एक आत्महत्या हुई, प्रोफेसर पर एट्रोसिटी कानून अंतर्गत धाराएं लगाई गई, इसी डर से आईआईटी के निदेशक भी इस्तीफा दे रहे है। 

इस आत्महत्या की बात तो एक कॉपी (Cheating) करने से शुरू हुई थी, अब तो शिक्षा का स्तर खराब न हो इसके लिए ओपन बुक टेस्ट है। २१वी सदी में जन्मा हर एक व्यक्ति जो हस्ताक्षर करना जानता हो, सरकार की फाइलों में साक्षर है।

जब भी ऐसी विद्यार्थी की आत्महत्या होती है, मै यही सोच लेता हूं कि क्या मैं इसपर कुछ  कर सकता हूं, सिवाय राजनीति स्वार्थ के ? शिक्षा का व्यापारीकरण करवा कर उस महत्व को जीवन का सबसे बड़ा महत्व कॉर्पोरेट मार्केट फोर्सेज ने बना दिया है। उसके लिए लगने वाले श्रम, अर्थकारण और तरुण समय का अनन्य महत्व जनमानस के मस्तिष्क पर थोप दिया गया है और जनता ने इसे स्वीकार भी कर लिया है। 

शिक्षा का बोध होना आवश्यक है न कि रटकर, याद करके डिग्री धारी होना। 

खैर छोड़िए आदर्शों की बात, यह देखिए जो आत्महत्या हुई है उसमें क्या वास्तविक जातिगत प्रताड़ना हुई है ? 

रोहित वेमुला की आत्महत्या के उपरांत ऐसा स्वार्थ राजकरण हुआ, जिसमें अनेक संगठनो ने बहुजन समाज को दिग्भ्रमित किया।

जो भी हो सत्य देर सबेर ही सही जांच में सामने आएगा पर तब तक बहुसंख्य समाज का दिशाभूल किया जाएगा, इसमें ही वक्त गुजर जाएगा।

मृतक के साथ मेरी संवेदना है। परंतु इस विषय पर चिंतन आवश्यक है राजनीति नहीं।

मैने जनरल कास्ट होने का दुख सहा है, उस दुःख का सदा के लिए वरण भी किया है। संघर्ष किया परंतु आत्महत्या नहीं की। और न ही किसी के भरोसे से जिंदगी जिया है। किसी का उपकार कभी नहीं लिया। हां जब उस व्यवस्था को ही पसंद नहीं हम, तो उसका त्याग करें, वे जातिवादी शक्तियां आपस में ही लड़कर मरेगी और मारेगी।

और इसप्रकार हमने शिक्षा के क्षेत्र से अपने आप को दूर कर लिया। अब वह शिक्षा का क्षेत्र कैंसर बन गया है, सड़ गया है, उसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है इसलिए इससे बचे और आनेवाली पीढ़ियों को बचाएं क्योंकि आप जनरल कास्ट है।

विश्वजीत सिंह

नागपुर

मंगलवार, 8 सितंबर 2026

श्री फिरोज फरेदून जहाँगीर घान्दी ( Feroze Faredoon Jehangir Ghandy)

 


पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी के पिता और श्रीमती इंदिरा गांधी जी के पारसी पति पूर्व सांसद श्री फिरोज फरेदून जहाँगीर घान्दी ( Feroze Faredoon Jehangir Ghandy) जी के स्मृति दिन विनम्र अभिवादन 🌺


टाटा TELCO, डालमिया LIC जैसे कॉर्पोरेट भ्रष्टाचारी नीतियों के विरोधी, नेहरू कैबिनेट का भ्रष्टाचार उजागर करनेवाले स्वतंत्रता सेनानी रहे, अखबार National Herald के कार्यकारी निदेशक  श्री फिरोज जहांगीर गांधी को सदैव सम्मान के साथ स्मरण किया जायेगा। 

इनके ही परिवार का मेनका गांधी और सोनिया गांधी में पेंशन, संपत्ति विवाद है।

प्रयागराज (इलाहाबाद, उत्तरप्रदेश) स्थित पारसी कब्रिस्तान में यह कब्र का १९६६ के बाद रुस्तम गांधी ने बड़े संघर्ष के बाद जीर्णोद्धार किया।

प्रेस की स्वतंत्रता का कानून, लोकसभा राज्यसभा टीवी चैनल का श्रेय श्री फिरोज जहांगीर गांधी को ही जाता है।


विश्वजीत सिंह (नागपुर)


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दही हंडी में नृत्यांगनाएं, केवल भाजपा शिंदे ही बने मीडिया का निशाना


गौतमी पाटील व तत्सम अन्य नृत्यांगनाएं नृत्य कर रही है, अनेक नेताओं ने कृष्ण जन्माष्टमी दहीहंडी उत्सव के नाम पर ऐसे अभिनेत्री, कलाकार, नृत्यांगनाओं के नृत्य रखे, युवाओ एवं बुजुर्गों में आकर्षण मानकर चले, युवतियों ने भी दहीहंडी फोड़ने में बड़ी संख्या में सहभागिता करी।

दैनिक अखबार, प्रसार माध्यमों ने कुछ जगहों पर गौतमी पाटील जैसा नृत्य और भाजपा, शिव शिंदे सेना पर खुप खबरें बनाई, खूब फैलाई।

सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, ट्विटर पर संस्कार हनन का राग, संस्कृति विरोधी अलापने लगे।

इसमें ऐसी ही खबर जो छूट गई, या जिसपर मीडिया चर्चा नहीं करना चाहती, जिसे Selective Criticism कहा जाता है एक महाराष्ट्र राज्य विरोधी पक्ष कांग्रेसी नेता ने चंद्रपुर की ब्रह्मपुरी विधानसभा के सावली नगर में वही गौतमी पाटील का डांस रखा, साथ में इसे बहुजन नृत्यांगना कह जातिवाद से भी जोड़ दिया। इसपर मीडिया चुप है।

इससे पता चलता है कि मीडिया सिर्फ भाजपा शिंदे सेना के नेताओं को टारगेट कर निशाना बना रही है, बदनामी कर रही है।

सबसे मजे की बात यह है कि भाजपा शिंदे सेना के जिम्मेदार प्रवक्ता, मीडिया भी हिम्मत नहीं दिखा सकी है कि इस पर बोले। 

आप भी वह कार्यक्रम देख सकते है। साथ में यह कार्यक्रम का पोस्टर भी। कांग्रेस नेता के अधिकृत फेसबुक पेज पर Live 

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यह वीडियो नृत्यांगना गौतमी पाटील फैंस पेज पर है

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आखिर कोई तो बोला इस विषय पर, श्रीमती नेहा पेंडसे नामक भाजपा की नगरसेविका है, गौतमी पाटील के वीभत्स, अश्लिल नृत्य पर सवाल कर रही है।

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शनिवार, 5 सितंबर 2026

United in Oneness अमेरिका में संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत (मराठी)

 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाचे सरसंघचालक मोहन भागवत यांचे अमेरिकेतील न्यूयॉर्क येथील भाषण


उपस्थित सर्व मान्यवर व्यक्ती, सज्जन माता-भगिनींना, रक्षाबंधन पर्वाच्या हार्दिक शुभेच्छा.


आपण येथे एकत्व साजरे करण्यासाठी एकत्र आलो आहोत. आपण न्यूयॉर्कमध्ये हे करण्यासाठी एकत्र आलो आहोत, ही अतिशय योग्य गोष्ट आहे. आणि आजचा आनंद आणि आजची भावना आपल्यासोबत वाटून घेण्यासाठी मी भारतातील नागपूरहून येथे आलो आहे.


जेव्हा आपण अमेरिका, युनायटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका म्हणतो, तेव्हा एका शब्दाची नेहमी वारंवार चर्चा होते, तो म्हणजे Pluralism — बहुवाद.


आणि जेव्हा आपण भारत म्हणतो, तेव्हा दुसरा शब्द किंवा दुसरे वाक्य नेहमी चर्चिले जाते — Unity in Diversity — विविधतेतील एकता.


भारतासाठी ही एकता आणि ही विविधता दोन्ही त्याच्या DNA मध्ये आहेत.


पाहा, राष्ट्रे केवळ भौगोलिक अस्तित्वे नसतात. या विश्वाच्या रचनेमध्ये राष्ट्रांना एक कर्तव्य पार पाडायचे असते.


स्वामी विवेकानंदांनी म्हटले होते, प्रत्येक राष्ट्राला जगाला देण्यासाठी एक संदेश असतो. प्रत्येक राष्ट्राला पूर्ण करण्यासाठी एक मिशन असते. प्रत्येक राष्ट्राला पूर्ण करण्यासाठी एक नियती असते.


भारताला कोणती नियती दिली आहे?


भारताचे कार्य आहे — या विविधतेतील एकतेची जाणीव करून घेणे आणि वेळोवेळी जगालाही या एकतेची जाणीव करून देणे.


आपण एक आहोत आणि या विविधतेमुळे त्या एकतेला सजविले जाते. त्यामुळे विविधतेचा उत्सव साजरा केला पाहिजे. तिचा आदर केला पाहिजे. तिला स्वीकारले पाहिजे. आणि त्याच वेळी आपण एकत्वाची ही भावना मनात ठेवली पाहिजे.


ही भावना अतिशय वास्तविक आहे.


अनेक वेळा आपण विचार करू शकतो की आपण एक आहोत असे कसे म्हणू शकतो? आपण तर वेगळे दिसतो. इतक्या राष्ट्रीयता, इतक्या भाषा, इतके धर्म, इतक्या जीवनपद्धती. आपण वेगळे दिसतो. आपण वेगळे आहोत.


वैज्ञानिकदृष्ट्याही आपण कसे वेगळे आहोत हे आपण शिकतो.


आपल्यापैकी प्रत्येकाला आपले भोजन स्वतंत्रपणे घ्यावे लागते. मला भूक लागली नाही याचा अर्थ तुम्हाला भूक लागलेली नाही असा होत नाही. माझी भूक भागली, मी माझे दुपारचे जेवण केले, याचा अर्थ तुम्ही तुमचे जेवण केले असा होत नाही.


तुम्हाला स्वतंत्रपणे जेवावे लागते. तुम्हाला स्वतंत्रपणे कमवावे लागते. तुम्हाला स्वतंत्रपणे खर्च करावा लागतो.


ठीक आहे, जगातील ही भौतिक वस्तुस्थिती आहे.


परंतु एक अंतर्निहित एकत्व आहे. म्हणूनच आपण एकमेकांसाठी भावना अनुभवतो.


तुम्ही एक साधा प्रयोग करू शकता. किंवा मी तुम्हाला हे करण्याचे आव्हान देऊ शकतो.


जेव्हा तुम्ही दुपारचे किंवा रात्रीचे जेवण घेत असाल, तेव्हा एका भुकेल्या माणसाला तुमच्यासमोर उभे राहू द्या आणि त्याने तुमच्या भरलेल्या ताटाकडे भुकेल्या नजरेने पाहू द्या. त्याची नजर टाळू नका आणि त्याला तेथून हाकलूनही देऊ नका. आणि त्याला अन्नाचा एक कणही न देता तुम्ही तुमचे जेवण करा.


तुम्ही हे करू शकत नाही.


तुम्ही प्रयत्न करू शकता, पण तुम्ही ते करणार नाही. कारण आपण मनुष्य आहोत. ही भावना आपल्यामध्ये आहे.


ही भावना प्राण्यांमध्येही असते. पण ते त्यावर कृती करू शकत नाहीत, कारण त्यांना तसे करण्याचे स्वातंत्र्य नसते. ते नैसर्गिक प्रवृत्ती आणि नैसर्गिक आवश्यकतांनी बांधलेले असतात.


त्यांना ते काय आहेत, त्यांचा जन्म का झाला, हे माहीत नसते. ते का मरतील हेही त्यांना माहीत नसते. त्यांना एवढेच माहीत असते की माझा जन्म झाला आहे, त्यामुळे मला माझ्या मृत्यूपर्यंत जगायचे आहे आणि जर मला जगायचे असेल तर मला भूक लागेल. म्हणून मला खावे लागेल. मला अनेक गोष्टी कराव्या लागतील, कारण निसर्ग मला त्यासाठी बाध्य करतो आणि मी निसर्गाला नकार देऊ शकत नाही.


तुम्ही पाहू शकता — एक गाय गवत चरत असते. तिचे पोट भरेपर्यंत ती गवत खाते. त्यानंतर ती त्या गवताची काळजी करत नाही.


ती खात असताना दुसरी गाय आली आणि तिचे पोट अजून भरलेले नसेल, तर ती दुसऱ्या गायीला ते गवत खाऊ देणार नाही.


पण आपण ते गवत गठ्ठा किंवा गाठोडे करून उद्यासाठी घेऊन जात नाही.


प्राणी असे करत नाहीत.


फक्त मनुष्य विचार करू शकतो.


मनुष्य विचार करू शकतो आणि हा एक गुण आहे, एक आशीर्वाद आहे, एक वरदान आहे.


पण त्याच्यासोबत आणखी एक अट आहे.


तुम्ही विचार करू शकता, पण तुम्ही कोणत्या पद्धतीने विचार करता, हे महत्त्वाचे आहे.


जर तुम्ही योग्य पद्धतीने विचार केला तर तुम्ही ईश्वराच्या जवळ जाता.


जर तुम्ही चुकीच्या पद्धतीने विचार केला तर तुम्ही प्राण्यांच्या जगाच्या जवळ जाता.


“नर करनी करे तो नरका नारायण बन जाए, उल्टी करनी करे तो क्या बन जाए? कुत्ता बिल्ली बन जाए या राक्षस बन जाए.”


म्हणून दिशा महत्त्वाची आहे.


जो मनुष्य योग्य दिशेनुसार आपले जीवन घडवतो, तो या ईश्वराच्या राज्याचा जबाबदार नागरिक बनतो.


आपल्या परंपरेमध्ये एक सुभाषित आहे —


“आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्य मेतत् पशुभिर्नराणाम्।”


खाणे, प्रजनन करणे, विश्रांती घेणे आणि आपल्या अस्तित्वाबद्दल चिंता करणे हे मनुष्य आणि प्राणी दोघांमध्येही समान आहे.


पण एक विशेषता आहे.


मनुष्याला विचार करण्याची क्षमता दिली आहे आणि इतरांविषयी संवेदनशीलताही दिली आहे. त्यामुळे जर त्यांनी योग्य विचार केला तर ते संपूर्ण जगाचे पालन करू शकतात.


मनुष्य जगासाठी जबाबदार आहे.


कारण त्याला विचार करण्याचा विशेष गुण दिला आहे. त्याला योग्य आणि अयोग्य यातील फरक समजण्याची क्षमताही दिली आहे. म्हणूनच तो विविधतेमध्येही एकत्वाची अनुभूती घेऊ शकतो.


पण मला प्रयत्न करावा लागेल.


आणि असे झाले की, प्रयत्न करताना जेव्हा इतर सर्वजण थकले आणि प्रयत्न करणे थांबवले, तेव्हा आपल्या प्राचीन पूर्वजांनी शोध घेणे सुरूच ठेवले.


प्रत्येक जण सुखाच्या शोधात असतो. Pursuit of happiness — सुखाचा शोध हा सर्वांसाठी समान आहे.


त्या काळी मानवसंख्या फारच कमी होती. त्यामुळे प्रत्येकाला प्रत्येकजण माहीत होता.


आणि प्रवृत्तीच्या आधारावर दोन प्रकारचे लोक होते.


एक प्रवृत्ती होती — जगा आणि जगू द्या.


दुसरी प्रवृत्ती होती — जगा आणि फक्त त्यांनाच जगू द्या जे आमचे म्हणणे मानतात.


जे म्हणतात की, तुम्ही आमचे ऐकाल तर आम्ही तुमचे रक्षण करू.


संस्कृतमध्ये, हिंदीमध्ये संरक्षणाला रक्षण म्हणतात.


म्हणून जे फक्त आज्ञा पाळणाऱ्यांचे रक्षण करतात ते राक्षस आहेत.


आणि जे म्हणतात — तुम्ही माझे ऐका किंवा ऐकू नका, माझे मत काय आहे याला तुम्ही सहमत आहात किंवा नाही, तुम्हाला माझ्याबद्दल काय वाटते, तुम्ही माझ्यासाठी किती उपयोगी आहात — या गोष्टी फार लहान आहेत.


मुख्य गोष्ट अशी आहे की आपण सर्व मनुष्य आहोत.


आपल्याला जग टिकवायचे आहे आणि म्हणून आपल्याला बंधुभावाने जगायचे आहे.


म्हणून मी तुमचा हात हातात घेईन.


तो देव आहे. देवप्रकृती, देव प्रकारचे मनुष्य.


त्यांचा राजा इंद्र होता.


आणि राक्षस प्रकारच्या प्रवृत्तीचा राजा विरोचन होता.


स्वाभाविकपणे ते सर्व सुखाच्या शोधात होते.


त्यांनी प्रयत्न केले, पुन्हा प्रयत्न केले आणि अनेक गौरवशाली गोष्टी केल्या. अनेक कठीण प्रयत्न त्यांनी यशस्वीपणे पूर्ण केले.


आणि दोन्ही प्रकारच्या समाजांमध्ये अशी अवस्था आली की त्यांच्याकडे सर्व काही होते. त्यांना जे काही हवे होते ते त्यांच्या सेवेसाठी तयार होते.


पण त्यांच्याकडे एक गोष्ट नव्हती — समाधान.


त्यांच्या सर्व इच्छा पूर्ण करण्यासाठी सर्व काही होते. पण ते सर्व काही उपभोगल्यानंतरही समाधान नव्हते.


कारण त्यांना जाणवले की, आपल्याकडे सर्व भौतिक सुखे आहेत, पण यामुळे आपल्याला कायमस्वरूपी समाधान मिळत नाही.


जर मला न्यूयॉर्कमधील डोनट्स आवडत असतील, तर मी डोनट्स खाईन.


एका वेळी मी किती डोनट्स खाऊ शकतो?


मला माहीत नाही. मी मधुमेही आहे.


पण एखादा मनुष्य एका वेळी जास्तीत जास्त पन्नास डोनट्स खाऊ शकतो.


त्यानंतर त्याला ते डोनट्स पाहण्याचीही इच्छा होणार नाही.


तो म्हणेल, नाही, ते दूर ठेवा.


डोनट तोच आहे.


काय बदलले?


आणि पन्नास डोनट्स खाल्ल्यानंतरही दुसऱ्या दिवशी सकाळी मी पुन्हा पन्नास डोनट्स खाण्यास तयार असतो.


म्हणून भौतिक सुख क्षणिक आहे. ते समाधान देऊ शकत नाही.


आणि जर भौतिक सुखाची विपुलता असेल तर तेही कमी होऊ शकते.


म्हणून समाधान नाही, हे त्यांनी अनुभवातून शिकले.


आणि त्यानंतर ते आपापल्या गुरूंकडे गेले.


विरोचन, जो असुरांचा राजा होता, तो आपल्या गुरू शुक्राचार्यांकडे गेला.


आणि देवांचा राजा इंद्र आपल्या गुरू बृहस्पतींकडे गेला.


दोघांनीही आपल्या गुरूंना सांगितले —


“गुरुजी, आमच्याकडे सर्व काही आहे. पण आम्ही समाधानी नाही. सर्व काही असूनही दुसऱ्या दिवशी पुन्हा आम्हाला सर्व काही हवे असते.


आम्हाला कायमस्वरूपी समाधान कुठे मिळेल?


असे सुख कुठे मिळेल जे आम्हाला कायमचे समाधान देईल?


असे सुख जे एकदा प्राप्त झाले की कधीही कमी होणार नाही?”


दोन्ही गुरूंनी आपल्या दोन्ही शिष्यांना उत्तर दिले —


“जेव्हा तुम्हाला तुमच्या अंतर्मनातील अस्तित्वाची, म्हणजेच आत्म्याची किंवा आत्मन्‌ची अनुभूती होईल, तेव्हाच या सर्व गोष्टी पूर्ण होतील.”


आणि त्या आत्म्यापर्यंत कसे पोहोचायचे हे फक्त ब्रह्माजींनाच माहीत आहे.


तुम्ही ब्रह्माजींकडे जा आणि त्यांच्याकडून ही विद्या घ्या. त्यांच्याकडून हे शिक्षण घ्या.


म्हणून दोघेही त्या काळच्या परंपरेनुसार विद्यार्थ्याचा पोशाख परिधान करून, हातात समिधा इत्यादी गुरुदक्षिणा घेऊन ब्रह्माजींकडे गेले.


ब्रह्माजी ध्यानात होते.


त्यांनी नमस्कार केला, त्यांनी आणलेली दक्षिणा एका बाजूला ठेवली आणि ते त्यांच्या ध्यानातून बाहेर येण्याची वाट पाहत बसले.


काही वेळाने ब्रह्माजी आपल्या सामान्य अवस्थेत परत आले.


त्यांनी डोळे उघडले आणि पाहिले — “अरे, दोन्ही राजे येथे आहेत. आणि त्यांनी गुरूंना भेटण्यासाठी विद्यार्थी ज्या विशिष्ट पोशाखात असावे तो पोशाख घातला आहे.”


ते म्हणाले, “होय, तुम्हाला काही शिकायचे आहे असे दिसते. तुम्हाला काय शिकायचे आहे?”


दोघांनी उत्तर दिले —


“आम्हाला आत्मन्‌ प्राप्त करायचा आहे. तो आत्मन्‌ कसा पाहायचा? त्याच्यापर्यंत कसे पोहोचायचे?”


ब्रह्माजी म्हणाले —


“माझ्यासाठी हे अतिशय सोपे आहे.


तुम्ही कसे पाहता?”


ते म्हणाले, “आम्ही डोळ्यांनी पाहतो.”


“ठीक आहे, मग आत्मन्‌ पाहण्याचा प्रयत्न करा.”


ते म्हणाले, “तो कुठे पाहायचा?”


“तुम्ही डोळ्यांनी पाहता. पण तुम्ही प्रत्यक्षात डोळ्यांनी पाहत नाही.


डोळा हे एक यंत्र आहे.


एखादा मनुष्य मरण पावला आणि आपण त्याचे डोळे लगेच काढले, तर ते डोळे दुसऱ्या व्यक्तीला देता येतात.


म्हणून डोळा हे एक यंत्र आहे.


डोळा हे एक यंत्र आहे.


तुमच्या डोळ्याच्या आत कोणीतरी आहे जो पाहतो आणि मग तुम्हाला वाटते की तुम्ही पाहत आहात.


म्हणून तुमच्या डोळ्यातील त्या पाहणाऱ्याला पाहा.”


मग ते दोघे एकमेकांसमोर उभे राहिले आणि त्यांनी एकमेकांच्या डोळ्यांत पाहिले.


त्यांना स्वतःची सावली, स्वतःचे प्रतिबिंब दिसले.


त्यांनी ब्रह्माजींना विचारले —


“ब्रह्माजी, आम्ही हे दररोज आरशात पाहतो. आणि स्थिर पाण्यातही आपल्याला हे दिसते.


हा आत्मन्‌ आहे का?”


ब्रह्माजी शांत राहिले.


आणि पुन्हा ध्यानात गेले.


मग ते परत निघाले.


नदी पार करताना ते विचार करत होते.


ब्रह्माजींनी आम्हाला सांगितले की तुम्हीच आत्मन्‌ आहात. त्यांनी आमचे प्रतिबिंब दाखवले.


म्हणून मी आत्मन्‌ आहे आणि आत्मन्‌ अमर आहे. सर्वव्यापी आहे. एकच मानवी आत्मा आहे.


पण त्यांनी पाहिले की नदीच्या पाण्यात दिसणारे आत्मन्‌चे प्रतिबिंब नाव वल्हवताना नष्ट झाले.


वल्ह्यांच्या हालचालीमुळे ते प्रतिबिंब नष्ट झाले.


म्हणून इंद्र विरोचनला म्हणाला —


“काहीतरी आहे. काहीतरी कोडे आहे. आपल्याला परत जावे लागेल. हे योग्य नाही.”


विरोचन म्हणाला —


“नाही. आपण एकदा विचारले आणि त्यांनी अतिशय स्पष्ट उत्तर दिले.


त्यांनी आपल्याला एकमेकांच्या डोळ्यांत पाहायला सांगितले.


आपण एकमेकांचे प्रतिबिंब पाहिले.


म्हणून आपण हेच आहोत — मी आणि माझे.


हेच त्यांचे उत्तर आहे आणि आता मी पुरेसे शिकलो आहे.


मी परत जाईन आणि प्रत्येकजण स्वतःचा, स्वतःचा आणि स्वतःच्या गोष्टींचा विचार करेल आणि आपण त्या पद्धतीने पुढे जाऊ.”


पण इंद्र परत आला आणि त्याने पुन्हा ब्रह्माजींना विचारले.


“हा आत्मन्‌ नाही. मग आत्मन्‌ काय आहे?”


ब्रह्माजींनी पुन्हा अनेक वेळा त्याची परीक्षा घेतली, त्याला अनेक प्रश्न विचारले.


आणि शेवटी त्याला मानवी आत्म्याचे ज्ञान प्राप्त झाले.


ही श्रुती सत्य आहे की नाही, हे मला माहीत नाही.


पण एका फार प्राचीन काळात आपल्या पूर्वजांना हे अंतर्गत तत्त्व समजले होते, ही एक वेगळी ऐतिहासिक गोष्ट आहे.


त्यांनी त्याला आत्मन्‌ म्हटले.


भारतीय परंपरांमध्ये त्याला अनेक नावे आहेत.


पण सत्य हे आहे की, वेगवेगळी शरीरे, वेगवेगळे पोशाख, वेगवेगळ्या उपासना, सर्व काही वेगळे असूनही जे आपल्याला जोडते ते हेच तत्त्व आहे.


जसे मण्यांच्या माळेत एकच धागा सर्व मण्यांना जोडतो, त्याप्रमाणे हा आत्मन्‌ आपल्या सर्वांमध्ये आहे आणि तो आपणा सर्वांना जोडतो.


आणि तोच कायमस्वरूपी, न संपणाऱ्या आनंदाचा स्रोत आहे.


त्याच वेळी तो आपल्याला आणखी एक गोष्ट सांगतो —


तुम्ही वेगळे दिसता, पण तुम्ही वेगळे नाही.


कारण हे सर्व भेद नष्ट होतील. ते नाहीसे होतील.


तुम्ही मराल. तुमचे शरीर मरेल.


पण काहीतरी कायमस्वरूपी राहते.


काहींचा विश्वास आहे की ते Judgment Day — अंतिम न्यायाच्या दिवसापर्यंत राहते.


काहींचा विश्वास आहे की ते अनेक जन्मांच्या चक्रातून जाते.


पण आपल्या आत काहीतरी आहे जे निघून जाते, जे कायमचे आहे, जे नष्ट होत नाही.


आणि म्हणून जे काही आपल्या जगात अस्तित्वात आहे, ते आपण जगत असताना वेगवेगळ्या अस्तित्वांचा समूह म्हणून पाहतो, अनुभवतो.


पण त्यांच्यामध्येही मी आहे आणि माझ्यामध्येही ते आहेत.


आपण एकमेकांचे आहोत.


आणि मग त्यांनी तार्किकपणे विचार केला —


जर असे असेल, तर आपल्याला एक नवीन ज्ञान मिळाले आहे, जे मानवजातीसाठी अत्यंत उपयुक्त आहे.


आणि संपूर्ण जगातील मानवजात आपलीच आहे.


म्हणून हे ज्ञान जगाला दिले पाहिजे.


हे ज्ञान देण्याचे कार्य एखाद्या व्यक्तीमार्फत होऊ शकत नाही.


त्यासाठी एक योग्य आणि मोठी व्यवस्था असणे आवश्यक आहे.


म्हणून हिमालयाच्या दक्षिणेकडून समुद्रापर्यंत राहणाऱ्या लोकांना एका राष्ट्राच्या रूपात संघटित करण्यात आले.


आणि त्यांना एक कार्य, एक कर्तव्य देण्यात आले —


तुम्हाला हे ज्ञान जगाला द्यायचे आहे.


म्हणून भारतात ही संकल्पना आहे की तुम्हाला जीवन मिळाले आहे ते त्याचा उपयोग करण्यासाठी.


“आत्मनो मोक्षार्थम्” — आत्म्याच्या मुक्तीसाठी.


पण एवढेच नाही.


तुम्हाला हे तत्त्व स्वतःमध्ये पाहायचे आहे आणि त्याच वेळी हे तत्त्व जगातील प्रत्येक वस्तूमध्ये आणि प्रत्येक व्यक्तीमध्ये पाहायचे आहे आणि त्यांच्या कल्याणासाठी कार्य करायचे आहे.


“आत्मनो मोक्षार्थम् जगत् हिताय च.”


स्वतःच्या मोक्षासाठी आणि जगाच्या कल्याणासाठी.


हाच मानवी जीवनाचा उद्देश आहे.


मानवी जीवन निरर्थक नाही.


ते अर्थहीन नाही.


तो साधा योगायोग नाही.


मानवी जीवन हे प्रत्येकाला हे ज्ञान देण्यासाठी आणि स्वतःच्या मुक्तीसाठी तसेच जगाच्या कल्याणासाठी हे ज्ञान आचरणात आणण्यासाठी दिले आहे.


हीच मिशन आहे.


भारताने हे पूर्ण करायचे आहे.


जगभरातील भारतीयांनी स्वतःच्या उदाहरणातून हा संदेश द्यायचा आहे.


उपदेश करून नव्हे, तर आचरणातून.


हीच भारताची नियती आहे.


योगी अरविंदांनी भाकीत केले होते की आता भारताचा उदय निश्चित आहे, कारण जगाला या संतुलन निर्माण करणाऱ्या, जोडणाऱ्या तत्त्वाची आवश्यकता आहे.


हे टिकवून ठेवणारे तत्त्व म्हणजे आपण ज्याला धर्म म्हणतो.


धर्म म्हणजे Religion नाही.


धर्म म्हणजे उपासना नाही.


तो या सर्वांच्या पलीकडे आहे.


हे असे नियम आहे ज्याद्वारे विश्व टिकून राहते.


हा तो नियम आहे ज्याद्वारे मनुष्य जीवनातील द्वैतांचे व्यवस्थापन करू शकतो.


हा तो समतोल आहे जो एकाच वेळी सर्वकाही टिकवून ठेवतो आणि प्रत्येकाला एकाच वेळी प्रगती करण्याची संधी देतो.


असे नाही की व्यक्तींना दडपले गेले तरच समाजाची प्रगती होईल.


नाही.


असेही नाही की व्यक्ती यशस्वी होण्यासाठी समाजाला दडपावे लागेल.


नाही.


व्यक्ती, समाज आणि पर्यावरण यांनी एकत्र पुढे गेले पाहिजे. एकत्र प्रगती केली पाहिजे.


तुमचे शरीर, तुमचे मन आणि तुमची बुद्धी यांनीही एकत्र पुढे गेले पाहिजे. एकत्र प्रगती केली पाहिजे.


जे तत्त्व सर्वांना जोडते, सर्वांना धारण करते, जे फूट निर्माण करत नाही, ज्यामुळे कोणताही संघर्ष निर्माण होत नाही आणि जे सर्वांमध्ये संतुलन निर्माण करते — जो मध्यम मार्ग आहे — तो धर्म आहे.


हे जगाला देणे ही आपली नियती आहे.


आणि ज्या ठोस पायावर हा धर्म समजला जातो, तो म्हणजे अस्तित्वाचे एकत्व, एकात्मता.


हेच आपले सत्य आहे.


आज आपण अशा देशात बसलो आहोत जिथे चर्चेचा विषय Pluralism — बहुवाद आहे.


मी त्या देशातून आलो आहे आणि तुमच्यापैकी अनेकांची जन्मभूमी तो देश आहे, जिथे आपण विविधतेतील एकत्वाचा अनुभव घेतला आहे.


आपण त्या विविधतेचा उत्सव साजरा करतो, कारण ती एकत्वाची सजावट आहे.


त्या देशात आपण वनस्पतींची पूजा करतो.


का पूजा करतो?


दररोज नाही.


एक दिवस एक पूजा असते, दुसऱ्या दिवशी दुसरी पूजा असते.


आजकाल आपण Father's Day, Mother's Day वगैरे साजरे करतो.


का?


कारण आपण त्यांच्याप्रती असलेल्या आपल्या कर्तव्याची आठवण ठेवतो.


त्याचप्रमाणे आपण पर्यावरणाप्रती असलेल्या आपल्या कर्तव्याची आठवण ठेवतो.


केवळ पूजा करून काही होत नाही.


आपल्याला ते कर्तव्य समजून घेतले पाहिजे आणि ते पूर्ण केले पाहिजे.


म्हणून जगाकडे सर्वकाही असूनही एक म्हणून पाहणे ही आपली दृष्टी आहे.


आपल्या संतांनी प्रार्थना केली आहे.


ते दुष्ट व्यक्ती, पापी, शत्रू इत्यादींबद्दल काय म्हणतात?


ते म्हणतात — ठीक आहे, असे लोक आहेत.


ही भौतिक जीवनाची वस्तुस्थिती आहे.


पण ते त्यांच्या विनाशासाठी प्रार्थना करत नाहीत.


ते म्हणतात —


त्यांची वाईट बुद्धी नष्ट होऊ दे.


“शत्रुबुद्धी विनाशाय”


त्यांच्यातील शत्रुत्वाची भावना नष्ट झाली पाहिजे.


कारण आपल्याला माहीत आहे की आपले शत्रू आणि आपणही एकच आहोत.


आणि ही शत्रुत्वाची भावना कायमस्वरूपी नाही.


ती मनुष्याने निर्माण केलेली आहे किंवा जगातील वेगवेगळ्या परिस्थितींचा परिणाम आहे.


म्हणून आपण खरे शत्रू नाही.


आपल्याला त्रास देणारी गोष्ट म्हणजे त्यांची दुष्टता.


म्हणून ती दूर झाली पाहिजे.


ही आपल्या पूर्वजांनी आपल्याला दिलेली अत्यंत विशाल हृदयाची दृष्टी आहे.


आणि आज रक्षाबंधनाचा दिवस साजरा करताना आपल्याला हे लक्षात ठेवले पाहिजे की आपण राखी बांधतो, हे बंधन बांधतो.


हे बंधन काय आहे?


ते तुम्हाला मर्यादित करत नाही.


जेव्हा तुम्ही इतरांची जबाबदारी स्वीकारता, तेव्हा ते तुम्हाला मुक्त करते.


आपल्या एका गीतामध्ये म्हटले आहे —


“बंधनकारी पाश नहीं यह, अरे मुक्ति का है बंधन यह.”


हे एखादे कठोर बंधन नाही.


हे असे बंधन आहे जे तुम्हाला इतरांच्या काळजीशी जोडते आणि त्यामुळे तुम्ही मुक्त होता.


तुम्हाला जाणवते की तुम्ही केवळ तुमच्या शरीरात जगत नाही, तर तुम्ही सर्वत्र जगत आहात.


आणि हे केवळ एक व्याख्यान नाही.


याची अनुभूती आपल्या ऋषींनी घेतली आहे.


मी तुम्हाला रामकृष्ण परमहंसांबद्दल सांगितले.


ते एका झाडाच्या सावलीत बसले होते. गंगेकडे पाहत होते आणि जवळजवळ ध्यानावस्थेत होते.


ते आजूबाजूच्या वातावरणाशी एकरूप झाले होते.


आणि एक गाय आली आणि गंगेच्या काठावरील हिरवळीवर चरत होती.


ते ओरडले —


“अरे देवा! मला तुडवले जात आहे. मला तुडवले जात आहे.”


लोक धावत आले आणि त्यांनी पाहिले की त्यांच्या छातीवर गायीच्या पायांच्या दाबाच्या खुणा होत्या.


ही काही मिथक कथा नाही.


हे नोंदवले गेले आहे.


कारण रामकृष्ण परमहंस हे १९व्या शतकात होते.


त्यामुळे त्या सर्व घटना नोंदवल्या गेल्या आहेत.


अशा प्रकारचे एकत्व प्राप्त करणे हा जीवनाचा उद्देश आहे.


आणि म्हणून आपण रक्षाबंधन करतो.


मग आपले कर्तव्य काय आहे?


आपण अमेरिकेत आहोत.


आपण अमेरिकेत राहतो.


आपण अमेरिकेत कमावतो.


म्हणून आपण अमेरिकेचे आहोत.


आणि आपण अमेरिकेशी प्रामाणिक राहून वागले पाहिजे.


भारतीय डायस्पोराचे, म्हणजेच परदेशातील भारतीयांचे, त्यांच्या कर्मभूमीप्रती प्रत्येक कर्तव्य आहे.


त्यांनी ते कर्तव्य पूर्ण केले पाहिजे.


भारत त्यांची जन्मभूमी आहे.


त्यांना भारतासाठी काही करायची इच्छा असेल आणि ते ते करू शकत असतील, तर आपल्या कर्मभूमीप्रतीचे कर्तव्य पूर्ण केल्यानंतर ते ते करू शकतात.


त्याला मनाई नाही.


पण ते बंधनकारक नाही.


तुमच्या जन्मभूमीला तुमच्याकडून अपेक्षा आहे की तिने तुम्हाला दिलेली मूल्ये तुम्ही पुढे घेऊन जावीत.


आणि हेच मूल्य आहे.


हेच मूल्य आहे — एकत्व.


आपण मनुष्यांशी एक आहोत.


आपण निसर्गाशी एक आहोत.


आपण जे काही करतो ते केवळ आपलेच अस्तित्व टिकवणारे नसावे, तर जे काही आवश्यक आहे ते सर्व टिकवणारे असावे.


पाहा, जग अनेक समस्यांना सामोरे जात आहे.


विकासामुळे पर्यावरणाचा नाश होतो.


पर्यावरणाचे संरक्षण करायचे म्हणजे विकास थांबवावा लागतो.


मग मार्ग काय?


आपल्याला तो मार्ग जगाला द्यायचा आहे.


आणि आपल्या पूर्वजांनी हा मार्ग त्यांच्या स्वतःच्या त्यागातून, त्यांच्या स्वतःच्या संयमातून दिला आहे.


आपल्या पुराणांमध्ये एक कथा आहे.


एक राजपुत्र होता — जिमूतवाहन.


पक्षी आणि साप हे एकमेकांचे शत्रू होते.


आजही ते निसर्गात तसेच आहेत.


बहिरी ससाणा, गरुड आणि साप — ते एकमेकांचे शत्रू आहेत.


आणि काही प्रकारे गरुडांचे वर्चस्व झाले.


मग एक करार झाला —


“ठीक आहे, तुम्ही येऊन आम्हाला नष्ट करू नका. आम्ही तुम्हाला दररोज एक साप देऊ.


तुम्ही येथे या.


या खडकावर तो साप बसलेला असेल.


तुम्ही त्याला घेऊन जा आणि इतरांना सोडा.”


हा जिमूतवाहन एक मनुष्य होता.


त्याला या गोष्टीची माहिती मिळाली आणि त्याला वाईट वाटले.


“स्वतःला वाचवण्यासाठी त्यांना अशा प्रकारे बलिदान का द्यावे लागते?”


तो त्या खडकावर गेला आणि गरुडाला म्हणाला —


“तू मला घेऊन जा. सापाला मारू नकोस.


मला समजते की तो तुझा शिकार आहे आणि तुला मांस खावे लागते.


पण तुला सापाचे मांस खाण्याची गरज नाही.


तू माझे मांस घेऊ शकतोस.”


अशा प्रकारे आपण या सर्वांचे संरक्षण केले आहे.


“जगाने माझ्यासाठी काय केले?” असे विचारू नका.


“माझ्या जन्मभूमीने माझ्यासाठी काय केले?” असे विचारू नका.


“माझ्या कर्मभूमीने माझ्यासाठी काय केले?” असेही विचारू नका.


मुद्दा असा आहे की तुम्हाला हे शरीर आणि हे जीवन या सर्वांची सेवा करण्यासाठी मिळाले आहे.


आपण सर्व जीवनाच्या या टप्प्यावर आलो आहोत.


आपण मोठे झालो आहोत.


आपण कमावत आहोत.


आपण शिकत आहोत.


आणि आपण प्रगती करू.


पण आपल्याला ही क्षमता कोणी दिली?


आपल्याला हे शरीर कोणी दिले?


आपले आई-वडील.


तुम्ही जे अन्न खाता, त्यामागे जगात कुठेतरी शेती आहे.


म्हणूनच तुम्ही खाऊ शकता.


जर शेतकऱ्यांनी शेती करणे थांबवले तर तुम्ही काय खाल?


तुम्ही जे कपडे घालता कारण गिरण्यांमध्ये लोक काम करत आहेत.


कापूस पिकवणारे शेतकरी अजूनही आहेत.


आपण प्रत्येक गोष्टीचे कोणातरी ऋणी आहोत.


आपण जगाकडून घेतो.


म्हणून आपल्याला परत द्यावे लागेल.


आपण किती कमावतो हे महत्त्वाचे नाही.


आपण किती वाटून देतो हे महत्त्वाचे आहे.


तुम्ही करिअरचा विचार करता.


करिअर म्हणजे फक्त पैसा आहे का?


करिअर म्हणजे फक्त भौतिक सुख आहे का?


असे नाही.


चार पुरुषार्थांमध्ये अर्थ आणि काम हे भौतिक जीवनाशी संबंधित दोन महत्त्वाचे पुरुषार्थ आहेत.


आपल्या उपनिषदांमध्येही सांगितले आहे की केवळ मोक्षाच्या मागे जाऊ नका.


तुम्हाला भौतिक यशही प्राप्त करायचे आहे.


जग चालू ठेवायचे असेल तर जन्मानंतर लगेच संन्यास घेता येत नाही.


प्रथम ब्रह्मचर्य, त्यानंतर गृहस्थ, त्यानंतर वानप्रस्थ आणि मग संन्यास.


म्हणून तुम्हाला शिकायचे आहे.


तुम्हाला जीवन टिकवायचे आहे.


आणि तुमचा अनुभव पुढील पिढीला द्यायचा आहे.


त्यानंतरच तुम्ही आत्म्याच्या शोधाकडे जाऊ शकता.


ही आपली व्यवस्था आहे.


म्हणून कमाई करणे नाकारलेले नाही.


तुम्हाला तुमचे शरीर तंदुरुस्त ठेवायचे आहे.


तुम्हाला तुमच्या क्षमता तंदुरुस्त ठेवायच्या आहेत.


तुम्ही आवश्यक तेवढे उपभोगले पाहिजे.


आणि त्यासाठी तुम्ही विद्या आणि अविद्या दोन्ही शिकल्या पाहिजेत.


पण उद्देश काय?


“आत्मनो मोक्षार्थम् जगद्धिताय च.”


मला परत द्यायचे आहे.


ही आपली परंपरा आहे.


आणि भारतात राहणाऱ्या भारतीयांकडून ही अपेक्षा आहे.


ते भारतासाठी प्रयत्न करतील.


ते परदेशात राहणाऱ्या आपल्या बांधवांचीही काळजी घेतील.


जे अमेरिकेत किंवा इतर देशांमध्ये राहतात, म्हणजेच डायस्पोरा, ते आपल्या कर्मभूमीसाठी काम करतील.


त्यांना वेळ मिळाला, साधन मिळाले तर ते भारताचीही काळजी घेऊ शकतात.


पण भारत त्यांच्याकडून अशी अपेक्षा करत नाही.


भारताची अपेक्षा आहे की तुम्ही जगा.


भारताने तुम्हाला जीवन जगण्याची जी कल्पना दिली आहे, त्यानुसार जगा.


कारण हे मानवाच्या शाश्वत जीवनाचे मॉडेल आहे.


अन्यथा, Sapiens मध्ये आपण वाचतो की अन्नसाखळीमध्ये मनुष्य फार उशिरा आला आणि सुरुवातीला तो खालच्या स्तरावर होता.


पण ३००० वर्षांच्या आत तो मध्यभागी आला आणि ७००० वर्षांत तो शीर्षस्थानी पोहोचला.


त्याने ८००० वनस्पतींच्या प्रजाती आणि सुमारे ५००० प्राण्यांच्या प्रजाती नष्ट केल्या.


प्राणी पळू शकत होते.


म्हणून त्यांनी स्वतःला वाचवले.


वनस्पती पळू शकत नव्हत्या.


म्हणून त्या वाचू शकल्या नाहीत.


ही मानवाच्या जीवनाची पद्धत नाही.


मनुष्य सर्वात बुद्धिमान आहे.


आणि “मी या सृष्टीचा स्वामी आहे” या अहंकारासह तो जगतो.


स्वामी असाल तर सर्वांची काळजी घ्याल.


पण ठीक आहे, तुम्ही सर्वात बुद्धिमान आहात.


तुम्ही निसर्गाच्या मर्यादा ओलांडल्या आहेत.


आणि तुम्ही चांगले जीवन जगत आहात.


पण ते टिकवून ठेवणे हे तुमचे कर्तव्य आहे.


आपल्याला एकमेकांची काळजी घ्यावी लागेल.


अशा प्रकारे काळजी घ्यावी लागेल की माझे जीवन इतरांचे जीवन टिकवणारे जीवन असेल.


मी इतरांना टिकवून ठेवीन.


मी केवळ स्वतः जगेन आणि इतरांना जगू देईन असे नाही.


तर इतरांना जगवीन.


हा संदेश आहे.


आणि याच सूत्राद्वारे आपण या स्वप्नाची पूर्तता करू शकतो.


शाश्वत सत्याची अनुभूती घेण्याचे हे स्वप्न आहे.


आपल्याला त्याची माहिती असो वा नसो, सत्य अस्तित्वात आहे.


ते टिकून राहील आणि त्याचा परिणाम होईल.


पण जर आपण या जगाला अशा पद्धतीने टिकवून ठेवले तर त्या सत्याचा लाभ आपल्यालाही होईल आणि सर्वांनाही होईल.


म्हणून आज आपल्या जीवनात आपल्याला एक संकल्प करायचा आहे.


“ठीक आहे, आतापर्यंत जे काही झाले ते झाले.


आता यापुढे तरी मी माझ्या जीवनाचा विचार करीन.


एका वेळी एक छोटी गोष्ट.


एका वेळी एक छोटे पाऊल.


आणि मी माझ्या जीवनाला असे जीवन बनवीन जे टिकवून ठेवणारे जीवन असेल.”


मी येथे बसलो असताना तुम्हाला माहीत आहे की आपला एक कार्यक्रम आहे — पंच परिवर्तन.


आणि आपण तो समाजात घेऊन जात आहोत.


सर्वप्रथम या गोष्टी आपल्याला स्वतःच्या जीवनात आणायच्या आहेत आणि नंतर त्या समाजात घेऊन जायच्या आहेत.


त्या कोणत्या आहेत?


त्या अशा गोष्टी आहेत ज्या अशी जीवनपद्धती निर्माण करतात की ज्यामध्ये मनुष्य स्वतःचे जीवन समाधानाने जगतो, त्याला कोणत्याही गोष्टीची कमतरता भासत नाही.


तो स्वतः जगतो.


आणि त्याच वेळी तो इतरांनाही त्याच पद्धतीने जगवतो.


तो मानवतेला टिकवतो.


तो पर्यावरणाला टिकवतो.


तो सृष्टीला टिकवतो.


तो अस्तित्वाला टिकवतो.


हेच ध्येय आहे.


हेच आपल्या प्राचीन ऋषींनी पाहिलेले आदर्श मानवी जीवन आहे.


त्यांनी त्यासाठी एक संपूर्ण राष्ट्र निर्माण केले.


“मधुरं इच्छन्त ऋषयः स्वर्विदः तपोऽधिकं शमुपासेदुरग्रे ततो राष्ट्रं बलमोजसा दधाम.”


जगाच्या कल्याणाची भावना असलेल्या त्या सद्भावी ऋषींनी कठीण तपस्या केली आणि त्यातून आपल्या राष्ट्राची निर्मिती झाली.


कोणतेही राष्ट्र म्हणजे केवळ भौगोलिक भूमीचा तुकडा नाही.


सर्व राष्ट्रांना पूर्ण करण्यासाठी एक नियती असते.


ही भारताची नियती आहे.


चला, आपण भारतीय म्हणून या नियतीसाठी जागे होऊया आणि आपल्या कर्मभूमीप्रती तसेच जन्मभूमीप्रती आपली कर्तव्ये पूर्ण करूया.


जर आपण असे केले, तर अनेक समस्यांशी संघर्ष करणाऱ्या आणि प्रत्येक पावलावर अडखळणाऱ्या जगासाठी ते एक वरदान ठरेल.


आपल्याला जगाला टिकवून ठेवणे आवश्यक आहे.


आपल्याला या जगाला काही प्रकारचा आधार द्यायचा आहे.


आपल्याला या मार्गाने जायचे आहे.


आणि म्हणूनच आपण येथे आलो आहोत.


आपण रक्षाबंधनाची आठवण केली आहे.


आपण राखी बांधली आहे.


आणि आपण म्हणत आहोत —


“United in Oneness and Decorated by the Diversity.”


एकत्वामध्ये एकत्रित आणि विविधतेने सजलेले.


कारण विविधता नैसर्गिक आहे आणि एकता हे सत्य आहे.


हे आपण समजून घेतले पाहिजे.


आणि त्यानुसार आपले जीवन घडवले पाहिजे.


म्हणूनच तुम्हा सर्वांना येथे मोठ्या उत्साहाने पाहिल्यावर मला विचार करायला सुरुवात झाली.


आणि माझ्या मनात जे काही विचार आले, ते मी तुमच्यासमोर तुमच्या चिंतनासाठी मांडले.


आणि जर तुम्हाला ते योग्य वाटले, तर ते स्वतःच्या आचरणाचा भाग बनवा.


आपले मनःपूर्वक धन्यवाद.